One can experiences direct experience like suspense, thriller, action, romance, murder mystery in short story, long story and red it in my written book most of the stories, novels, social, spiritual, inspirational, creative, imaginative, Psychological, etihasic, technological, love emotional, Buddha, I have written books on all these topics and write Poetry, well thought out and creative quotes.. There are occupations and passions that flow in my blood like a veil Always... by--- Shekhar Kharadi

माँ ममता का सागर है,
पहाड़-सा विश्वास है ।

माँ बरसती बारिश सी
बूंद-बूंद में मीठा जल है ।

माँ रिमझिम फुव्वारे सी
स्नेह है, करुणा है, धैर्य है ।

माँ निस्वार्थ बहती-सी,
नदी है, झरना है, झील है ।

माँ पुष्प पुष्प में खिली सी
श्वास है, हवा है, इत्र है ।

माँ मृदु डांट-थपकी सी
चुंबन है, आलिंगन है, स्पर्श है ।

माँ उचित-अनुचित सी
खदान है, संस्कार है, गुरु है ।

माँ अपार श्रद्धा सी
कावा है, काशी है, कैलाश है ।

माँ नित्य प्रेरणा सी
बल है, उमंग है, साहस है ।

माँ ऋतु रक्षित सी
छांव है, छाता है, कबलं है ।

माँ सर्व यात्रा धाम सी
व्रत है, उपवास है, पूजा है ।

माँ हृदय पुकार सी
राम है, रब है, अल्लाह है ।

-© शेखर खराड़ी
तिथि-११/५/२०२२, मई

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विषय- हास्य-व्यंग्य काव्य / बेवकूफ गधे

हम तेरे प्यार में बेवकूफ गधे
रेंक..रेंक..कर दिन भूनेंगे
झूक.. झूककर सलाम भरेंगे
मर मरकर सांस निकालेंगे
जी जीकर पूंछ मुंडवाएंगें
हंस हंसकर जी हजूरी पढ़ेंगें ।

हम तेरे प्यार में बेवकूफ गधे
रखकर हुक्म सर बालों पर
दिहाड़ी मजदूरी से गंजे बनेंगे
खून-पसीने से नंगें चलेंगे
लात-घूंसे-झापड़ से बिमार पड़ेंगे
हट्टे-कट्टे डन्डे भी बदन से तोड़ेंगे ।

हम तेरे प्यार में बेवकूफ गधे
शौक़ शौरहत से बारात में कूदेंगे
गली-मुहल्ले से महारानी चुराएंगे
पीठ पर बिठाकर शेर कराएंगें
अल्हड़-उज्जड़ ताने-बाने खायेंगे
ठाठ-बाट से हंसेंगे-रोएंगे-नाचेंगे ।

हम तेरे प्यार में बेवकूफ गधे
घिस घिसकर बर्तन गंदा करेंगे
आटा गूंथ-गूंथकर रोटी जलाएंगे
सांझ सवेरे खूब कपड़े फाड़ेंगे
झाड़ू-पोछा से मकान बिगाड़ेंगे
मेकअप से चेहरा भूत बनाएंगे ।

-© शेखर खराड़ी
तिथि-२/५/२०२२, मई

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उत्तर-पूर्व-पश्विम-पूरब

तपते ताप सा कहर ,

प्रचंड-उष्ण हवा लहर

गर्म लू सा मंद-मंद पहर ,

रौद्र रूप ऊर्जावान प्रकोप

उड़ती धूल-बंवडर से ,

वन-पहाड़-बगीयां जलें

व्यथित-उदास राहें रुठें

दुपहरी धूप के प्रहार से

दौड़ता जनजीवन ठप

शहर-शहर सड़कें पिघलें

अंग-अंग से बहें पसीना

पग-पग से उठें ज्वार ,

सारे पंछी हुए मूर्छित

सर्वत्र त्राहि-त्राहि पुकारें..

करुणामय श्वासे चलें

मृदु ऋतु के सख्त सन्नाटे से

मुरझाए सृष्टि का यौवन....

देख सिकुड़-सिकुड़ कर ,

जल का बूंद-बूंद मिटें

धरा-व्योम आंसू बहाएं ।

-© शेखर खराड़ी
तिथि- ९/६/२०२२, मई

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हां,कवि हूं

क्षण-क्षण में

तलाशता हूं, कविता

टेढ़े-मेढ़े शब्द टटोलकर ,

छैनी, हथोड़ी से

ठिठ पाषाण शब्द तोड़कर ,

जीर्णोद्धार करता हूं

मन-मस्तिष्क की गहराई से

शब्द-शब्द गढ़ता हूं

प्रत्येक्ष-परोक्ष रूप से

सत्य-असत्य देखता हूं

भावनाओं का रस पीकर ,

कल्पनाओं के शहर दौड़ता हूं

लय, गति, अवधि में चलता हूं

ठाट-बाट से शृंगार पहनाकर ,

पाठकों के समक्ष दर्शाता हूं

अद्भुत, अप्रतिम काव्य रचना ।

-© शेखर खराड़ी
तिथि-२८/३/२०२२, मार्च

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#HappyHoli


रंग-बिरंगी त्यौहारों का पैग़ाम आया
तंग-वंग गलियों में तुझे यूं देखा नहीं ।

चढ़ा है तेरी प्रीत का ऐसा गाढ़ा रंग
दुजा कोई रंग मुझे अबतक भाया नहीं ।

सबने लगाये रंग पर, तेरा रंग गया नहीं
तन-मन ऐसा मल दिया, कभी भूला नहीं ।

दिल पर लाल रंगने ऐसा कहर ढाया की
घाट घाट में धो..धो..कर, अब थका नहीं ।

लहू से गहरा, पलाश से पक्का ये रंग
इश्क़ की हसीन वादियों में धुला नहीं ।

क्या खूब मिलाकर तूने ऐसा लगाया की
अल्हड़ छोरा बावरा बनकर अब डूबा नहीं ।

-© शेखर खराड़ी
तिथि-१८/३/२०२२, मार्च

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स्त्री का
त्याग, समर्पण
किसने देखा,
किसने पूछा ?
उत्सुकता, सांत्वना से
गहराई पूर्वक समझकर ,
अनेक उपकारों की
विपुल धनी है वो
हृदय देती है प्रेमी को ,
देह सौंपती है पति को
सारा वक़्त खर्च किया
संतानों के लिए ।

क्षणभर...
फुर्सत कहां मिलीं ?
दहलीज के अंदर
व्यस्त है रात-दिन
गृहस्थ...
कार्यभार संभालने
दुःख, पीड़ा पीकर ,
सुंदर सपनें जलाकर
भावना देती है संबंधों को ,
विश्वास देती है अपनों को
जिल्लत भरे व्यवहारों में
रोज मरती है, रोज जीती है
कर्तव्य निष्ठ..,
घर की दीवारों में रह जाता
सारा जीवन सिमटकर ।

-© शेखर खराड़ी
तिथि- ८/३/२०२२, मार्च

" विश्व महिला दिवस " पर सभी महिलाओं के अदम्य साहस, पराक्रम, सम्मान, सुरक्षा, संघर्ष, सहभागिता और सशक्तिकरण, आत्मनिर्भर के साथ असंख्य दुःख, तकलीफों को हृदय से सलाम या सेल्यूट करता हूं ।💐💐🙏🙏

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🦕 डायनासोर 🦖 , हास्य-व्यंग्य😁😂 - लघुकथा

हमने दुकान वालें से उत्सुकता से पूछा - " भैया एक जिंदा डायनोसोर देना ? "

वो हैरानी से बोला- " अरे.. बुड़बक.., का..बें पगला गये हो
या मुवी-वुवी में जिंदा डायनोसोर देखकर, बहकी-बहकी बातें बताने लगे हो, कही हमारा दो रुपए का धंधा चोपट करने का तो इरादा नहीं है ।"

" नाही..भैया ऐसा नहीं है.., हमें तो सचमुच वाला वो आग
उगलने वाला डायनोसोर चाहिए ? "
वो जोर से बोला- " काहे.., सुबह सुबह बच्चों जैसी जिंद लेकर बैठें हो ? अपने घर की एलसीडी तोड़कर तुरन्त निकाल दों !,
"भैया.. हमें ने तो एलसीडी भी तोड़ दि, पर साला वो जानकर निकला ही नहीं, उल्टा मम्मी के धोबी पछाड़ फटके खाने पड़े ,
पर, आप कुछ भी करो हमें तो आपसे ही वो डायनोसोर चाहिए,
जो बड़े बड़े पोस्टर में बाहर दीवारों पर चिपकाया हैं ? "

वो गुस्से में बोला- " अबें..का, डायनोसोर को लाने हम आसमां फोड़े, या पाताल खोदें ।"

भैया.. आप तो खिलौनों की दुकान में सबकुछ रखते हो तनिक आज वो मुवी वाला डायनोसोर दिलवा दिजिओ ताकि हम ठाठ-बाट से उपर बैठकर घर जाएंगे ? "

इतने में एक भाई साब बोले- " अरे..छोरे जुरासिक पार्क वाले स्टीवेन स्पीलबर्ग से पूछनो पडेगो वो बडीयों जिंदों डायनासोर रखतो हे ।"
अब तो रहनो दो भाया- " विदेश कोणी जाणो विजो टिकिट घणों मंहगो हो गयो, ओर उपर से मन्नें इंग्लिश की फूटी कौड़ी न पल्लें पड़े ? "
छोरा.. चिंतो मती करियो एजेंट मिल जाऐगो, वो तन्नें अमेरिका ले जाऐगो ।"

" ना..,ना..भाया.. वो मन्नें पक्कों लूट लेगों, फोरेन में नंगों भिख मंगाऐगों ।

अब छोरा.. विदेश जाणे को सपणो रहने दें ।"

अब भाया क्या करें..? माटि को मुर्दों खिलोनों कदि भायो नाहि..!"
छोरा..., इक काम करियों बकरी को ताजो-ताजो दूध पीकर सो जाणो थारे वास्ते सपणे म्हें बढों डायनोसोर का भूत मिलेगो, वो तन्नें पीठ पर बिठाकर फोरेन ले जाऐगो ।
ऐसा हे.. तो ठिक है भाया..!
अब तो बकरी को ताजो ताजो दूध पीकर डायनोसोर को लंबो सपणो देखनो पडेगो ।

-© शेखर खराड़ी
तिथि ४/३/२०२२, मार्च

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