zinadgi khak na thi... khak udaate gujri....

तमस हटा प्रकाश कर,
ख़्वाहिशों को तू आकाश कर..
गिरा ही है अभी मिटा नहीं,
संकट अभी टला नहीं..
उठ संभल संकल्प दृढ़ कर..
नियति के विरुद्ध युद्ध कर..
भाग्य अभी बना नहीं,
किस्मत अभी लिखी नहीं..
ठोकरों से सबक सीख,
कर्म कर, तू भविष्य लिख..
#युद्ध

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कहनी है तुमसे बहुत सारी दिल की बाते,
पर क्या तुम सुन सकोगे दिल से ही..
कहकर, कहना अब मुमकिन नही तुमसे,
मेरी ख़ामोशियां सुन सकोगे क्या दिल से ही..

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हर रोज़ मैं अपनी छत की मुंडेर से,
दूर तक फैली ज़िन्दगी को देखा करती..
हर सुबह एक नई सुबह के इंतज़ार में
हर शाम वही पुरानी शाम ढला करती..
यहां बैठे बैठे ही..
मेरी निगाहें नाप सकती हैं मिलों की दूरी..
जो तुम कभी मिलों का सफर तय कर भी ना नाप पाए हों..
मेरा दिल महसूस कर सकता है हर वो एहसास जो,
तुम पास होकर भी नहीं समझ पाते..
हां इसी छोर से मैंने हर रोज़ चाँद को ढलते देखा है..
हां इसी छोर से मैंने हर रोज़ सूरज को पिघलते देखा है..
कभी कभी मन करता है मिटा दूँ खुद को इसी छोर से,
पर ठहर जाती हूँ ये सोचकर..
हर शाम एक चाँद मेरे इंतज़ार में निकलता है..
औऱ शायद वो सूरज भी मुझे ढलते नही देख सकता..
और फिर में बेख़ौफ़ सी बेपरवाह यूँही बैठी रहती हूं,
अपनी ही धुन में...

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वक्त गुज़रता ही नहीं इनके बग़ैर,
कुछ लोग आदत बन जाते हैं..
खुशबू से हवाओं में महकते हैं,
कुछ लोग दिल में बसकर,
सांस बन जाते हैं..

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Sarita Sharma लिखित कहानी "सिर्फ तुम.. - 4" मातृभारती पर पढ़ें
https://www.matrubharti.com/book/19895140/sirf-tum-4

मैं बेवकूफ़ सी बेपरवाह सी यूँही रहती हूं,
अपनी ही धुन में...
क्या फर्क पड़ता कुछ बाक़ी रह भी गया तो..
एक ना एक दिन तो सबकुछ रह ही जाना है..
क़यामत के दिन तो हम होंगे ही सबसे आगे,
और ज़माने ने हमारे पीछे ही आना है..
मैं इन किताबों का इतिहास नहीं बनना चाहती..
या मेरे बाद कोई मुझे याद रक्खे..
जिन्होंने खुद एक ना एक दिन मिट ही जाना है..
मैं वो पहली बारिश की सोंधी सी खुसबू होना चाहती हूं..
जिसे महसूस कर कोई मिट्टी खाने को तरस जाए..
मैं वो चंदन हो जाना चाहती हूं..
जिसकी महक हमेशा के लिए ज़हन में बस जाए..
मैं वो मिट्टी हो जाना चाहती हूं,
जहाँ मेरे महादेव बसते हों...

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जब अपना वजूद फिजूल लगने लग जाता है,
तब जाकर खुद को मिटाने का ख़्याल आता है..
पर जाने कितनी बार दिल हारा होगा,
जाने कितनी बार हिम्मत टूटी होगी,
खुद के अंदर यूँ दम तोड़ती ज़िन्दगी को,
जाने कितनी बार सम्भाला भी होगा.
पर जब थक जाते हैं तन्हा रातों को सुलाते सुलाते,
यूँही दिल को रुलाते रुलाते,
जब थक जाते हैं किसी अपने को बुलाते बुलाते..
तब मुश्किल लगता है हर वक़्त का यूँ पल पल में गुजरना..
तब आसान सा लगता है यूँ ज़िन्दगी को आसान करना..
तब आसान लगता है खुद को यूं बेनिशाँ करना..
तब आसान लगता है एक चैन की नींद सो जाना..
नहीं ये मृत्यु किसी एक ज़िन्दगी की नही होती..
ये मृत्यु है उस विस्वास की, ये मृत्यु है उस उम्मीद की,
ये मृत्यु है प्रेम की, झुठे अपनेपन की,
दिखावे के रिश्तों की,
जो देख ना पाए उन बैचैन नजरों को,
जो सुन ना पाए उन बिलखती खामोशियों को..
जो दिल बार बार चीख रहा था,
जिसे तुम समझ ही ना पाए
#आत्महत्या ...
#विश्वास

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