zinadgi khak na thi... khak udaate gujri....

बाक़ी है अब भी कुछ ग़मों को समेटना,
कुछ ख़्वाहिशों का मरना बाक़ी है अब भी..
ज़िन्दगी की कश्ती आसुंओं का दरिया,
कुछ यादों का सफ़ऱ बाक़ी है अब भी..

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ज़माने की आज़माइशों में ख़ाक होती ज़िन्दगी,
कुछ तेरी यादों को दिल से भुलाते भी गुजरी..

अदभुत प्रेम की अदभुत महिमा
शब्दों में न वर्णित हो,
तीनों लोकों में चारों धाम में
सर्वश्रेष्ठ शिव पार्वती..
ऐसे ही प्रेमी हों पृथ्वी पर
जैसे शिव पार्वती...?..

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इंसाफ मांग रहे है जो हमदर्द जिसका,
बता दो फिर कोई बराबर की सजा,
है कोई सजा उस डर के बराबर,
जिसे महसूस किया है लौ ने बुझने से पहले..
बताओ सजा उस उम्मीद के बदले,
जो आखिरी सांसो तक तकती रही निगाहें.
रहम को तरसती हर आह के बदले,
हर सजा कम है उस गुनाह के बदले..
नहीं है सजा कोई उस दर्द के बदले ,
नहीं है सजा कोई उस वक्त के बदले,
जिसे महसूस किया किया है लौ ने बुझने से पहले..
बस इतना सा रहम तू कर दे खुदा,
इंसानियत जरूरी करदे तू सांसो के बदले,
घुटने लगे दम इंसा का तभी,
कम होने लगे रूह से जब इंसानियत कभी..
हर जुर्म की अब हद हो रही है,
लोगो से इंसानियत खो रही है..

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बिछड़े जो शाख से पत्ते,
तो धरा ने कहा अजनबी हो तुम..
उड़े जो हवाओ के साथ आसमाँ में,
तो ज़माने ने कहा गन्दगी हो तुम..

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ओढ़कर लबादे बन्द महलों की खिड़कियों से,
झाँक रही थी अमीरी सर्दी के ख़ौफ़ से..
उधर चौराहे पर दो मुट्ठी ठंड लिए,
गरीबी बेख़ौफ घूम रही थी...

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दम तोड़ रहा रिश्ता हमारा..अहम की आड़ में..
पर ख़ामोश हम भी बैठे थे औऱ तुम भी..
सिसक रहा था रह रहकर दिल की जुबान से.
पर सुनना हम भी नहीं चाहते थे औऱ तुम भी..

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बादल जब बरसते तो ख़ुशी से नाचते..
और दूर जब इंद्रधनुष दिखता,
तो लगता था कि पकड़ लेंगे इसको..
बारिश में चलती हमारी कागज की नाव,
जब अक़्सर डूब जाती थी..
हवाओं के साथ भागती हमारी फ़िरकी,
जब अक़्सर रुक जाती थी..
और हमेशा जमीन पर रेंगती हमारी पतंगे,
अक़्सर हमें कितना रुलाती थी..
हंस पड़ती हूँ आज भी सोचकर..
बचपन कितना मासूम था.
सोचकर ही ये बातें हमें अब कितना हंसाती है..
पर सचमुच कितनी सच्ची लगती है..
कितनी अच्छी लगती है..

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यूँ दौड़ते भागते लापरवाह से हम,
किसे पता था मुश्किलें क्या होती है..
हां चोट लगने पर दर्द तब भी होता था,
पर दोस्तो के साथ खेल में याद किसे रहता था..
मुश्किलों को ठोकरों में उड़ाना तो बचपन में था,
ग़मों को दिल से लगाना तो अब सीखे है..
नाराज़गी में वो हप्पा/कुट्टा की समझदारी,
तो केवल बचपन में थी,
गुस्से में दुश्मनी निभाना तो अब सीखे हैं..

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बिखरा तो हूँ अब भी तेरे जाने के बाद से,
फिर भी तेरी निगाहों में मरने को जी चाहता है.
हां टुकड़े ही है पर समेटे हूँ अब भी इस दिल को,
पर फिर भी तेरे इश्क़ में डूब जाने को जी चाहता है..

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