zinadgi khak na thi... khak udaate gujri....

दूसरों के वास्ते तू सदैवे है जिया,
माँगा कुछ कभी नहीं तूने सिर्फ है दिया,
तेरे नाम की जोत ने सारा हर लिया तमस मेरा.
भोलेनाथ शंकरा..
हे शिवाय शंकरा..

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पुरानी मंजिलों का शौक अब है किसको,
अब है नई मंजिले जिसका है दिल को अरमान..
बना लेना नई मंजिल तो है नहीं मुश्किल
मगर नए रास्ते बनाने में अभी कुछ दिन लगेंगे..

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हां माना कि दिलों में बसी है बेबसी,
चलो ये भी माना कि अपनों से बेहतर है अजनबी..
यहाँ रास्ते दुस्वार हैं और मंजिले उस पार हैं..
फिर भी ऐ-ज़िन्दगी तुझे ज़ीने को दिल तैयार है..

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कुछ भावनाएं जो लफ्जों में बयां नहीं हो सकती.
उन्हें कागजों में बिखेरने की कोशिश करती हूं.
वो उदासी जो मेरी हंसी से छलक जाती है..
उन्हें इन अल्फाजों में समेटने की कोशिश करती हूं..

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चन्द दिनों में जो भूल जाये,
वो यादें ही क्या..
बार बार ना आये जिनमे ज़िक्र यार का,
वो बातें ही क्या...

तुम ज़िन्दगी में शामिल ना भी हो, तो क्या फर्क है..
इश्क़ बेपनाह तो था ही, अब बेपरवाह भी हो गया..

पिरोकर कुछ लफ्ज़ों में मन का शोर,
शायरी में अपनी ख़ामोशी लिखती हूँ..
कुछ अनकहे दर्द, कुछ अनदेखी खुशियां,
ख़्वाहिशें जो दिल में नाकाम रखती हूं..

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बात चली है राम बनने की पर सच तो ये है साहब,
उस दौर के हम रावण भी नही बन सकते...

विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं..

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बहुत कुछ पढ़ लेती हूं, खामोशियां भी उसकी..
कभी कभी सब कहा गया, सबकुछ नही होता..

बिना उसकी झलक के, शायरी भी कहां आसां होती है,
कभी ख्वाब कभी ख्याल, याद कहां बेनिशां होती है...