i am a book lover

#Myself

हमारी पूरी जिंदगी एक रंगमंच जैसी है। रंगमंच के किरदारो की तरह हम जिंदगी में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। हम जो भी कमॅ करते है, उसका प्रतिफल हमेशा मिलता है। वो प्रतिफल हमारे कमॅ के अनुसार अच्छा या बूरा हो सकता है। जब तक हम खुद ऋणानुबंध से जूडे़ रहेंगे, तब तक हम कमॅ से मुँह नहीं मोड सकते।

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#Luck

तुटके बिखरा हूं दर पे तेरे,

फिर भी तूम बैठी हो,

खामोशी का लिबास पहने,

अनकहे जजबातो को बया करदे,

वो नजर है मेरे पास,

जिन नजरो में रोज,

दिखती थी तस्वीर मेरी,

वो आज हमसे नजरे चूरा रही है,

जिन गली में अक्सर हम भटके थे,

वो गलीयाँ आज भूलभुलैया बनी है,

समुंदर जैसी गहरी यादें,

आज मृगजल सी लगती है,

अब इसे में तकदीर समझु या,

अपनो ने दिखाया हुआ छलावा।

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#diamond

ऐसे ही नहीं बिकते हीरे बाजार में,

पहले उभरते है कोयले के बीच से,

फिर आते है तराशने वाले हाथों के पास,

फिर करते है जौहरी परख उसकी,

फिर लगती है किंमत उसकी,

तब कहीं मिलती है असली पहचान,

इस पहचान को खोजने के बाद भी,

ढूंढने पडते है उसके कदरदान,

अगर सही कदरदान मिल गया,

तो सफल हुआ आपका सफर।

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#Light

अगर ददॅ मुझे होगा,

तो जख्म तुझे भी मिलेंगे,

अगर जख्म मुझे मिले,

तो खून तेरा भी बहेगा,

मेरी रातों की नींद उ़डेगी,

तो तू भी कहाँ चैन से सो पायेगा,

वक्त के साथ नासूर बन चुके जख्म,

दुबारा कुरेदने से क्या फर्क पडेगा?

अंधेरे में चलाया हुआ तीर,

अगर सही निशाने पे भी लगा,

तो हमारे दुःख कम होंगे,

उस बात का क्या वजूद?

जैसे अंधेरा छटने पर,

सही रास्ता रुबरु होता है,

जिंदगी में उम्मीद का उजाला आता है,

वैसे ही काल का पेहरा हटने पर,

हमारे इन नासूर जख्म पे,

मलहम भी बेशक लगेगा।

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#Keep

खेलने- कूदने की उम्र में,

थमा दी नन्हें हाथों में खिताब,

पाठशाला में पढाते मास्तर ,

विषय तराह तराह के,

एक को समझो तो दूजा भूलाए,

दूजे को समझो तो सिर चकराए,

उपर से मास्तर पूछता है ढेरो सवाल,

जवाब ना आए तो पडते है डंडे,

मास्तर तो फिर भी ठीक है,

पर ये ब्लेक बोडॅ पल्ले नी पडता,

घर में भी रोज रोज यही रामायण,

पढाई के नाम पे होती कितनी ही बहस,

थक हार के रोज पूछते है एक सवाल,

पढोगे नहीं तो क्या करोगे आगे ?

जिंदगी का मजा हो गया किरकीरा,

पढाई ना होके बन गया फंदा,

फिर भी लोग हमसे रखते है उम्मीदे,

कहते है बडा करेगा खानदान का नाम।

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#Knight

ઘરના દરેક સભ્યોની જરૂરીયાત,ઈચ્છાઓ કે પછી સપના સાકાર કરવા મથતા દરેક પુરૂષ શૂરવીર છે.

પોતાના સંતાનોને અગવડ ન પડે માટે તેમની અંગત ઈચ્છાઓનું બલિદાન આપી, સંતાનોનું હિત વિચારનાર પિતા પણ શૂરવીર જ છે.

સંતાનો માટે સમય આવ્યે પોતાના ઘરેણાં સુધ્ધા ગિરવે મૂકી તેમનું ભવિષ્ય આબાદ થાય તેવું ઈચ્છતી માતા પણ શૂરવીર છે.

બિમારીમાં સપડાયેલા હોવાને લીધે જે પિતા કોઈ કામ કરવા સક્ષમ નથી, ત્યારે પરિવારના સભ્યોને નાણાકીય તંગીનો સામનો ન કરવો પડે તે માટે ભણતરને નેવે મૂકી નોકરી કરતો દીકરો પણ શૂરવીર છે.

જે સંતાને ઘડપણમાં માતાપિતાનો સહારો બનવાની જગ્યાએ તેમને વૃધ્ધાશ્રમમાં જવા મજબૂર કયૉ હોય, તેમની અેક હાકે મદદ કરવા દોડી આવતી દીકરી પણ શૂરવીર છે.

પતિ-પત્ની, ભાઈ-બહેન, દાદા-દાદી, પરિવારના સભ્યો,મિત્રો, આડોશ-પડોશના લોકો જે મુશ્કેલીના સમયે નિસ્વાર્થ ભાવે મદદ કરવા તત્પર હોય છે તે શૂરવીર જ છે.

ઘણા બધા લોકો માત્ર ફિલ્મ કે પુસ્તકોમાં જ શૂરવીર શોધે છે, પણ સાચા શૂરવીરો આપણી આસપાસ જ હોય છે, ફરક માત્ર અેટલો જ કે આપણે તેમને ઓળખી શકતા નથી.

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