I AM A HOUSEMAKER, REIKI N COLOUR THERAPIST, SOCIAL WORKER N WRITER समाज में घटित ऐसी घटनाएँ जो मेरे अन्तर्मन को छू जाती हैं, वही मेरे लिए एक सीख , समस्या या उनके निदान के रूप में पन्नों पर उतरती हैं। देशभक्ति, देशभक्त और जवान मेरे लिए विशेष सम्मानिए एवं Role Model हैं। कमजोर और लाचार का दर्द मुझे छूता है

नमस्कार दोस्तों !
       हमारे देश में लाखों ऐसे बच्चे हैं जो पढ़ना चाहते हैं मगर उनके पास किताबें ही नहीं हैं।  हम सभी का एक छोटा सा प्रयास, उन्हें किताबें उपलब्ध करा सकता है। बस हमें दो काम करने हैं - पहला हमें अपने बच्चों की किताबों को रद्दी वालों को नहीं बेचना है और दूसरा CIVIL BEINGS ORGANISATION  के इस VIDEO को ध्यान से सुनना है। यह वीडियो मुझसे किसी ने share किया था। बिना पैसा खर्च किए और बिना कहीं जाए हुए मात्र एक online form भरकर हम कैसे जरूरतमंद बच्चों तक किताबें पहुँचा सकते हैं,  यही इस video में बताया गया है। 
      एक विचार मेरे मन में भी आया है कि मात्र पुरानी किताबें ही क्यों ? हम नई किताबें, copy , pen , pencil, rubber , Geometry box, scale , school bags आदि चीजें हैं जो हम इस संस्था के द्वारा भिजवा सकते हैं। बहुत लोगों के साथ ऐसा होता है कि चाहते हुए भी वह सही पात्र, सही जगह नहीं चुन पाते या समयाभाव के कारण कुछ नहीं कर पाते और उनके विचार बस उनके मन में ही रह जाते हैं, तो ऐसे लोगों के लिए यह organization मददगार साबित हो सकती है क्योंकि इनका पूरा procedure  शीशे की तरह साफ प्रतीत हो रहा है। हमारा दिया सामान किसके पास पहुँचा है, ये भी हमें जानकारी मिल जाएगी। इसीलिए मात्र video share ना करके मैंने भी एक प्रयास किया है अपने विचारों को आप सब तक पहुँचा कर।
        दोस्तों! हाथ बढ़ाइए शिक्षा से जुड़ी चीजों को जरूरतमंद बच्चों तक पहुँचाइए।  इस video के साथ इसे copy paste  करके शेयर ही नहीं करना है बल्कि एक form हमें भी भरना है। मैंने तो भर दिया है अब आपकी बारी है।
                                                    धन्यवाद
                                                नीलिमा कुमार

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काश कि इस आकंठ प्रेम में डूबी प्रकृति और आकाश सा विशाल हृदय संपूर्ण मानव आत्मसात कर पाता। अतिशयोक्ति ही सही पर मासूम सा प्यारा ख्वाब ही तो हमें जीने की प्रेरणा देता है।

नीलिमा कुमार

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" बारिशें " 🌧🌧

यूँ बरसात का आना
किसी त्योहार से कम कहाँ होता था।

माटी की सौंधी खुशबू और दरख़्तों के हरे पत्ते
गरजते चमकते बादलों और हवाओं के झोंके से
बरसात की आहट मिलती थी।

मौसम की पहली बारिश
स्कूल की छुट्टी से मालूम देती थी।

सर्दी लग जाएगी, मीठी डाँट के बाद भी
आँगन के भरे पानी में नहाने से मालूम देती थी।

पतले, मोटे रेंग कर घर में घुसते अनचाहे मेहमान
उन मासूम केचुओं से मालूम देती थी।

इनसे बचते-बचाते, डर कर या डरा कर चीखते हुए
फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाने से मालूम देती थी।

झमाझम गिरते पानी में कभी छतरी के साथ
तो कभी बेवजह भीग जाने पर मालूम देती थी।

गीली छतरी के कोरों से टपकती बूंदों से
सूखे फर्श पर बन आई जलधारों संग मालूम देती थी।

सुबह माँ के उठाने पर " रेनी डे है " बोल
मुँह तकिए में छुपा लेने से मालूम देती थी।

किवाड़ों को खटखटाती वो प्यारी सी बारिश
पकौड़ी और गर्म चाय से मालूम देती थी।

और तब भी मालूम देती थी
जब माँ की आवाज कानों संग खेलती थी -
" बच्चे तो सो रहे हैं पकौड़ियाँ हम ही खतम कर देते हैं। "
और बहाने से आँखें मूंद सोते हुए हम
एक पल में खटिया से नीचे कूद जाते थे।

हाँ ! बरसात का आना
एक त्योहार ही तो है।
                                         नीलिमा कुमार
                                    ( मौलिक एवं स्वरचित )

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congratulations to all winners of kavyotsav 2.0⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘⚘

" रेलवे प्लेटफार्म "

गर्मी की तपती साँझ -
एक रेलवे प्लेटफार्म
और उस का मुख्य द्वार।
अपने परिचित का
इन्तज़ार करती मैं,
आते हर मुसाफिर का चेहरा पढ़ रही थी।

कुछ मुस्कुराते,
कुछ बदहाल,
कुछ ढूंढते चेहरे,
कुछ गाड़ी छूट जाने के डर से भागते
परेशान चेहरे,
और कुछ
विलम्ब की सूचना पढ़- पढ़कर
झुंझलाए क्रोधित चेहरे,
कुछ रेल से उतरते स्वजनों का
हर्षित मन स्वागत करते चेहरे,
और कुछ
घंटों इन्तज़ार के बाद
पसीने से लथपथ
चुपके-चुपके ऑफिस फोन कर
ठंडी आह भर
स्वागत करते चेहरे।

कुछ सोचने को मजबूर कर गए -

क्या ऐसे ही उतार-चढ़ाव
नहीं दिखते
जीवन रूपी प्लेटफार्म पर ?

अगर हाँ -
तो क्यों मानव
दुखों की गठरी ढ़ोता है ?
क्यों विष पीता है ?
जीवन अन्त कर लेता है।
क्यों नहीं बन सकता उस मुसाफ़िर जैसा
जो अपनी मंजिल पाने पर
रेलवे प्लेटफार्म छोड़ देता है,
सारी तपिश वहीं भूल
अपनों को साथ ले
प्लेटफार्म से बाहर निकल आता है,
और
इंद्रधनुषी रंगों से बुनी,
अपनी प्यारी दुनिया में
एक बार फिर खो जाता है।
एक बार फिर खो जाता है।

                       नीलिमा कुमार
                 ( स्वरचित मौलिक रचना )

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Hello friends...मेरी यात्रा से जुड़ी कहानी प्रकाशित हो चुकी है। आप सभी से अनुरोध है कि अपने कीमती समय में से थोड़ा सा वक्त निकाल कर download करके अवश्य पढ़ें। आपको पसन्द आएगी। रेटिंग एवं समीक्षा द्वारा अपना स्नेहाशीष ज़रूर दें। धन्यवाद।
हाय, मातृभारती पर इस कहानी 'चूका बीच - ख़ूबसूरत पर्यटन स्थल' पढ़ें
https://www.matrubharti.com/book/19868179/chuka-beech-khoobsurat-paryatan-sthal

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नमस्कार दोस्तों ! सर्वप्रथम मैं अपने सभी followers का और जो follower नहीं हैं लेकिन मेरी रचनाओं को पढ़ने के लिए समय निकालते हैं, उन सभी का तहेदिल से आभार व्यक्त करती हूँ।
मेरी नयी रचना " चूका बीच - खूबसूरत पर्यटन स्थल"
29 मई को प्रकाशित हो रही है। आप सभी से अनुरोध है कि मेरी इस रचना को भी अवश्य पढ़ें और रेटिंग एवं समीक्षा द्वारा अपना स्नेहाशीष ज़रूर दें। कृपया त्रुटियों को अवश्य ही इंगित करें। उचित समीक्षा मुझे और अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करती है। धन्यवाद।

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#काव्योत्सव -2

श्रेणी : अध्यात्म

" जीवन सार "

जन्म और मृत्यु के मध्य
जीवन का सार है
गंगा-जमुना-सरस्वती का संगम
पावन स्थल - प्रयाग।

चारों धाम की परिक्रमा में
सिमटा पुण्य।

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा,
शाश्वत सत्य का प्रतिरूप।

हिमालय की ऊँचाई और
सागर सी गहराई स्वरूपा
निज जीवन यात्रा।

तो क्यूँ ना इस जीवन के ही
समस्त सार को समेट लें ?

जितना पाया, जिस रूप में पाया
अनमोल है,
उसे ही जीवन में उतार लें।
उसे ही जीवन में उतार लें।
नीलिमा कुमार

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#काव्योत्सव -2

श्रेणी : प्रेम

" बेजुबान भाषा "

बात करने में तल्लीन
हम माँ बेटी
गाय और उसका बछड़ा
बछड़े को ढूंढती उसकी माँ
मां की पीड़ा को
समझने वाली उसकी बच्ची
देखती है -

गाय मीलों चली गई
बछड़ा नहीं मिला।
किसी को चिंता नहीं है
इसीलिए
कि इस माँ की भाषा को
कोई नहीं समझता।

ना यह माँ, न उसकी बेटी
और न ही वो पुलिस वाला
जो आदमी का बच्चा ढूंढता है,
आकाश पाताल एक कर के
पड़ोसी भी अपनी सहानुभूति जताता है
और कुछ परेशान भी दिखता है।

गाय का बछड़ा खो गया
किस से कहे ?
कहाँ दुहाई दे ?
किस पुलिस वाले को पकड़े ?
वो बेचारी मूक गाय !

माँ की ममता को कौन जाने ?
कांजी हाउस वाला तो एक मुंशी है।
पशुओं को पकड़ता है
उसी का हिसाब रखता है,
किंतु उस बेजुबान की
ममता भरी चित्कार
वो भी नहीं समझता है।
नीलिमा कुमार

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#काव्योत्सव2

श्रेणी : भावनाप्रधान

किसी ने मुझे मेरा बचपन याद दिला दिया और ये चन्द पंक्तियाँ उतर आयीं मेरे ज़हन में--
इन पंक्तियों का एक-एक लफ्ज़ मेरे वज़ूद का हिस्सा है, इन्हें मैंने जिया है। ये ख़्वाब नहीं हकीकत है ......

आज के इस बचपन में
हमारा सा बचपन कहाँ ?

वो भाई और पापा के साथ
छत पर चढ़ मुंडेर पर मोमबत्ती का चिपकाना,
दीवाली की पूजा में बैठ माँ का चिल्लाना -
अरे ! मुहुर्त निकला जा रहा है
और हमारा अपने हाथों से बनाए
उस हैलीकॉप्टर वाले कण्डील में उलझा रहना।
हमारा सा बचपन कहाँ ?

आँगन की हर नाली में कपड़ा ठूँस
उसमें वो गुलाबी रंग वाला पानी भरना
और घण्टों उस प्यारे से स्वीमिंग पूल का आनन्द उठाना,
रंग पुते हाथों से गुझिया उठा लेना
पर माँ की प्यारी चिंता भरी डांट -
एक गुझिया हमें अपने हाथों से खिलाना।
हमारा सा बचपन कहाँ ?

स्कूल का आखिरी दिन -
बस्ते का बिस्तरे पर फेंका जाना
भरी गर्मी
और वो पड़ोसी के बाग से आम चुराकर खाना
दिन में चार बार नहाना,
छुपन - छुपाई , गिट्टीफोड़ या ऊँच-नीच के साथ
फ़िक्र के बिना छुट्टियों का निकलते जाना।
हमारा सा बचपन कहाँ  ?

और आज का बचपन,
गर्मी की छुट्टियाँ
प्रतियोगिता या सलाना इम्तिहान की तैयारी में गुज़ारता है
आम को चाकू से काट प्लेट में सजाकर खाता है
शरीर के पसीने को
AC की ठण्डी हवा से सुखाता है
सर्दी के साथ गर्मी की छुट्टी को खोजता रह जाता है।

आज के इस बचपन में
हमारा सा बचपन कहाँ ?
हमारा सा बचपना कहाँ ?

नीलिमा कुमार

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