Read My Story ... full of Fun and Humour "पहला घूँट" and please give your reviews

जब चाहो होठों से लग जाती है,
एक पल में उबल कर संभल जाती है,
दिल को जला कर भी सहला जाती है,
एक पल को ग़म सब भुला जाती है।

सुकूँ और ताजगी को एक साथ सँजोती है
असली महबूबा तो फिर चाय ही होती है।

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रात ख्वाबों के आंचल में बीती ,
सुबह पहली फुरस्त में तेरे ख़्याल आने लगे
चाय की प्याली ने यादों की गठरी खोली,
बीते लम्हें मुस्कुराने लगे..

कसूर मेरा नही रिमझिम मौसम की शरारत है
तुझ बेहद खास के साथ फिर चाय पीने की चाहत है

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खुश्क मौसमों की खिडकियों पर,
भीगे मौसम दस्तक देते रहे रात भर

रात भर बरसी, सुबह तक ठहरी रहीं,
इन बूंदों में मौजें, दबी बहुत गहरी रहीं

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बड़ी सँभाल कर खर्च करते हैं
तेरी यादों की दौलत...

आखिर एक उम्र गुजारनी है
इन्हीं की बदौलत...

बादलों का छाना
बूँदों का
बरस पड़ना
सामान्य सा
मौसमी बदलाव

किन्तु मेरी
सामान्य सी चाह
इतनी बड़ी
क्यों लगती है-

जब पहले
बादल घुमड़ें
पहली बूँदे पड़ें
पहली बार
मिट्टी भीगे तो
मैं भी भीगूँ
साथ तुम्हारे
और मुझसे उठी
सोंधी महक
तुम महसूस करो

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बादलों की मटरगश्ती और नम हवाओं की आवारगी में एक कलाम हो जाये

ऑनलाइन तुम भी मैं भी ... चाय हो और इनबॉक्स पर दुआ सलाम हो जाये

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ये बारिशें भी तुम सी हैं

जो बरस गई तो बहार हैं
जो ठहर गई तो क़रार हैं

कभी आ गई यूँ ही बे सबब
कभी छा गईं यूँ ही रोज़ ओ शब

कभी शोर हैं कभी गुम सी हैं
ये बारिशें भी तुम सी हैं !

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मेघों से गिरे
कूपों में बसे

झरनों से झरे
गंगा में बहे

कितना भी
साफ़ हो पानी
तुम्हारे प्रेम सा
नहीं होगा-

देखो तो कैसा
चमक गया हूँ
तुम से धुल कर

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पता है तुम्हें मेरे स्वप्न
क्यों विलक्षण हैं ?

उन्हें मेरे अतिरिक्त
कोई नहीं देखता,
तुम भी नहीं
और उन में
तुम्हारे अतिरिक्त
कोई नहीं होता,
मैं भी नहीं

किंतु वे सदैव
सम्पूर्ण रहे हैं
मेरे इस अपूर्ण
जीवन में तुम्हारे
चिर अभाव में

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