शौकिया लिखाडी...लिखने का प्रथम सोपान..एक तलब,एक नशा है कुछ लिखने का..

...सम्बंधों का मर्म...
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सुनो,
प्रियतम,
तनिक सोचो तो,

नदी के दो किनारे,
इतने पास आ जाएं,
इतने पास,
कि नदी ही खो जाए,
बिन किनारा नदी कैसे बहेगी...??

मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता,
सम्बंधों के लिए,
ज़रूरी है,
एक अदद,
दूरी.....!!!

#करुनेश कंचन

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शाम से उड़ने लगी,ख़ुश्बू तिरी आवाज़ के,
खंडहर में जुगनुओं से,सज गयी बारात है..!!

# करुनेश कंचन

उनकी यादों ने दफ़्तन दे दी है दस्तक,
अश्क़-ए-समंदर में डूबने की बारी है

गवाह-ए-इश्क़ हैं हाज़िर इक बार फिर से,
ज़ख्म फिर हों ताजे,अदालतें हुक्म जारी है

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कितनी रातों का जागा हूँ यारों

मुख़्तसर सी कहानी शाम की है..!!

#करुनेश कंचन

ये उनसे कहना जो मेरी चुप से हज़ार बातें बना रहे थे,

मैं अपने शोले पा चुका हूँ मैं अपनी शिद्दत में आ बसा हूँ...!!


#अज़्म बहज़ाद

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...भगवान ने दो तरह के आदमी बनाये...सात्विक और असात्विक...समाज में दोनों का होना ज़रूरी....विलक्षण या अविलक्षण प्रवत्तियाँ का होना...आदमी के मस्तिष्क की बात है...विवेक की बात है....!!


करुनेश कंचन
#विलक्षण

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.... रास्ते का पत्थर....
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रास्ते का
एक छोटा सा पत्थर हूँ,
कुछ अनमना सा,

तभी,
रास्ते से जो गुज़रा
जाते-जाते,
एक ठोकर लगाई
मैं एक कदम आगे सरक गया
खुश था बहुत कि आगे आ गया
जो मेरी अरसे से चाहत थी
मैं भूल गया कि आगे का मतलब
पीछे भी हो सकता है...

पुनः ठोकर लगी
और मैं पीछे हो गया
उस जगह से
जहां पर मैं था

मुझे उस ठोकर की तलाश है
जो,
मुझे वहीं छोड़ जाएं
जहाँ हम थे.....!!

करुनेश कंचन

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