दीपक बुंदेला लेखक, निर्माता-निर्देशक टीवी सीरियल लेखन और एसोसिएट डायरेक्टर (मिले सुर मेरा तुम्हारा, भक्ति सागर, गज़ल स्पेसल, फ़िल्मी चक्कर, चाणक्य, टीपू सुल्तान, जय हनुमान, विवाह, अजीब और भाभी ) वीडियो सांग डायरेक्शन (मेड इन इंडिया, ठंडा ठंडा पानी, तेरे बालों में मोती पिरो दू, एक लड़की प्यारी प्यारी लग भाग 200गानों का फिल्मांकन और नए लोगों को इंटरडूस किया ) फीचर फ़िल्म- इन क्रिएटिब डायरेक्टर (लाल दुपट्टा मल मल का, जीना तेरी गली में, सूर्य पुत्र शनि देव, माँ वैष्णों देवी, बेबफा सनम. वर्तमान में

ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात।।

सभी निरोग रहे
सब को सुख समृद्धि प्रदान करें
ऐसा आशीर्वाद हों आपका सबकी मनोकामनाये पूर्ण करें
🙏🙏🙏 जय श्री गणेश 🌺🌺🌺

-Deepak Bundela AryMoulik

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कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक हार्दिक शुभ कामनाये




कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, लेकिन कर्म के फलों में कभी नहीं… इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो और न ही काम करने में तुम्हारी आसक्ति हो।

-Deepak Bundela AryMoulik

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हसरतें कतरा ए कतरा ओस हुई
तपीश की ज़िन्दगी में खामोश हुई

-Deepak Bundela AryMoulik

शुभ मंगल

-Deepak Bundela AryMoulik

मित्र इस दुनियां में हम और तुम क्या हैं...!
हम तुम हो तो दुनियां ए खुशियां जहां हैं...!!

-Deepak Bundela AryMoulik
रामचरित मानस में उल्लिखित मित्रता की परिभाषा और कसौटियां आप सब मित्रो को समर्पित
रामचरित मानस में उल्लिखित मित्रता की परिभाषा और कसौटियां आप सब मित्रो को समर्पित

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी ।
तिन्हहि बिलोकत पातकभारी ।।
निज दुख गिरि सम रज करि जाना ।
मित्रक दुख रज मेरु समाना ।।
जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते, उन्हें देखने से ही बड़ा पाप लगता है। अपने पर्वत के समान दुःख को धूल के समान और मित्र के धूल के समान दुःख को सुमेरु (बड़े भारी पर्वत) के समान जाने ।

जिन्ह कें असि मति सहज न आई ।
ते सठ कत हठि करत मिताई ।।
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा ।
गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा ।।
जिन्हें स्वभाव से ही ऐसी बुद्धि प्राप्त नहीं है, वे मूर्ख हठ करके क्यों किसी से मित्रता करते हैं ? मित्र का धर्म है कि वह मित्र को बुरे मार्ग से रोककर अच्छे मार्ग पर चलावे। उसके गुण प्रकट करे और अवगुणों को छिपावे ।

देत लेत मन संक न धरई ।
बल अनुमान सदा हित करई ।।
बिपति काल कर सतगुन नेहा ।
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ।।
देने-लेने में मन में शंका न रखे। अपने बल के अनुसार सदा हित ही करता रहे। विपत्ति के समय तो सदा सौगुना स्नेह करे। वेद कहते हैं कि संत (श्रेष्ठ) मित्र के गुण (लक्षण) ये है ।

आगें कह मृदु बचन बनाई ।
पाछें अनहित मन कुटिलाई ।।
जाकर ‍िचत अहि गति सम भाई ।
अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई ।।
जो सामने तो बना-बनाकर कोमल वचन कहता है और पीठ-पीछे बुराई करता है तथा मन में कुटिलता रखता है- हे भाई (इस तरह) जिसका मन साँप की चाल के समान टेढ़ा है, ऐसे कुमित्र को तो त्यागने में ही भलाई है ।

सेवक सठ नृप कृपन कुनारी ।
कपटी मित्र सूल सम चारी ।।
सखा सोच त्यागहु बल मोरें ।
सब बिधि घटब काज मैं तोरें ।।
मूर्ख सेवक, कंजूस राजा, कुलटा स्त्री और कपटी मित्र- ये चारों शूल के समान पीड़ा देने वाले हैं। हे सखा! मेरे बल पर अब तुम चिंता छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारे काम आऊँगा (तुम्हारी सहायता करूँगा) ।


मीत एक सर्वज्ञ है और मीत नहीं कोई
जा हरि की कृपा से शत्रु मित्र सम होई

रिश्तों को दिन से नहीं दिल से जियो .......... सभी मित्रो को मित्र दिवस की शुभकामनाये

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कोटि कोटि नमन

-Deepak Bundela AryMoulik

DBArymoulik

आदमी ही आदमी का लिवास ओढ़ता हैं आदमी..!
जो ढोंग मिलने मिलाने रीवाज़ ओढ़ता हैं आदमी..!!

लिवास ए आड़ की गिरेवा से गिरेवा झांकता हैं आदमी..!
असलियत छुपा के चेहरे औरों के ताकता हैं आदमी..!!

ओहदा ए ओहदों की नस्ल टटोले हैं आदमी ही आदमी..!
होड़ की ज़िन्दगी में गिरता गिराता हैं आदमी ही आदमी..!!

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दोस्त एक ही रखा मैंने कोई दूसरा और बनाया नहीं...!
कई तो बनाते हैं बहुत पर मैंने उसे कभी भुलाया नहीं..!!
हर रात जला हूं यादों में उसकी आंखों को कभी सुलाया नहीं..!
जलता रहा जो फ़िक्र में उसकी कभी और चराग जलाया नहीं...!!

-Deepak Bundela AryMoulik

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एहसास

-Deepak Bundela AryMoulik