मै भोपाल मध्यप्रदेश से ,मेरी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं..."वो नीम का पेड़" "हिन्दी और सिनेमा" एवं "हम तिरंगा लेकर आऐंगे."बाल कविता संग्रह

ग़ज़ल
बहर-122 122 122 122

सभी तीर उनके निशाने लगे हैं
निगाहों से* जादू चलाने लगे हैं

भरा चश्म में था ग़मों का समंदर
उन्हें देखकर मुस्कुराने लगे हैं

सहारे वो* जिसके पहुंचें किनारे
वही नाव मांझी डुबाने लगे हैं

जिन्हें सौंप दी बेटियां वालिदों ने
वही डोलियों को लुटाने लगे है

कभी सर्द झोंकों से* जो डर रहे थे
दिए आंधियों में जलाने लगे हैं

चढ़ी सीढ़ियां जो सफलता की* मैनें
हमें गैर अपना बताने लगे हैं

जहां बेटियां हैं निगाहें झुकाए
वहां पे पिता सिर उठाने लगे हैं

कई पीढ़ियां साथ रहते भी* देखीं
यही कलयुगों के खजाने लगे हैं

जहां ले लिया है जनम बेटियों ने
सुमन खुशनुमा वो घराने लगे हैं

सभी कुछ लुटाकर जो* जीते दिलों को
सुमन वो सिकंदर कहाने लगे हैं

सीमा शिवहरे सुमन

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बड़ा ही चैन आया था मुझे किससे मिलाया था
बिना मेरी इजाज़त के किसी ने दिल चुराया था

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*मेरे गांव चले आओ, जमीं पर फूल खिलते हैं।*
*रात को बंद दरवाजे , सुबह हर रोज़ खुलते हैं।*
*कभी अनबन जो हो जाय, दिलों में घर नहीं करती,*
*सुबह की भूल कर रंजिश,शाम सब लोग मिलते हैं।।*
सीमा शिवहरे सुमन

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मन ही मन कोई चुभन, गहराई होगी
साथ होते हुए भी सबके, तन्हाई होगी।
कोई समझा ही न होगा उसकी भावनाओं को
ऐसे ही खुदकुशी करने की नौवत तो न आई होगी।।

सीमा शिवहरे सुमन

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