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होली की सभी भाइयो बहनों अंकल आंटीयो को शुभकामनाय

माता पिता ऐसे है, जैसे है परमात्मा।
समर्पण इनके प्रति करो, शांत रहेगी आत्मा।
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प्रेम ही अपने आप मे सम्पूर्ण ज्ञान है उसके बाद कुछ जानने की जरूरत नही होती है। प्रेम में किया गया समर्पण सब कुछ सिखा देता है किसी शास्त्र की जरूरत नही होतीं है
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संसार को प्रेम से जीतना चाहिये। सब से मिल जुल कर रहना चाहिए सबके दिल को जीते जो विश्ववजयी है वह बुद्ध है हमे भी बुद्ध होना चाहिये असित मुनि की बात गौर करने योग्य है।

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महाशिवरात्रि की सभी मातृभारती के भाई बहनों आंटी अंकल और बुर्जुग सभी को शुभकामनाएं।

शांत तुम सदा रहो, नही लगते कोई अपशब्द।
ऐसा ज्ञान कह गये, ज्ञानी महात्मा बुद्ध।।
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भीतर की वासना को मारने के लिये गहरे ध्यान की आवश्यकता है। जब हम इस शरीर से परे हो जाते है सारे विचार त्याग देते है आत्मसंतुष्टि आ जाती है। मैं और मेरे से विमुक्त हो जाते है। तभी हम वास्तव में आनंद में जीते है। जो हो रहा है जो आपके बस में नही उसे ईश्वर की इच्छा माने। जो आप कर सकते है उसे कर्मयोगी बनकर फल की सोच त्यागकर करे।
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कोई भी कार्य को उचित तरीके से करना चाहिते है तो उस काम मैं डूबना चाहिये भुगत कर कोई कार्य सार्थक नही होता चाहे वो ईश्वर का ध्यान, योग, पूजा पाठ पढ़ाई लिखाई कुछ भी हो। काम मे डूबना ही काम करने की सार्थकता है। जबरदस्ती भुगतना बेकार है इसलिये डूबने की कोशिश करनी चाहिये।
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नीचे लिखे गए सुविचार दोहे का अर्थ जो मैंने समझा है यह भगवद्गीता से लिया गया है कि योगी हर कर्म को ईश्वर को समर्पित कर दे और यह समझे जो हो रहा है वो ईश्वर की इच्छा से हो रहा है वो ईश्वर ही कर रहा है तो कर्म करते हुय भी अकर्म होगा। अकर्म में कर्म जा अर्थ है व्यक्ति भले ही कुछ न भी कर रहा हो तो भी कर्म तो हो रहा है जैसे सोना बैठना उठना सब कर्म है।

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कर्म में जो अकर्म देखे, अकर्म में देखें कर्म।
वही योगी जानता है, ज्ञान का मूल मर्म।।
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