Balanath Rai, Good-Evening on 31-May-2019 10:03am | Matrubharti | Good-Evening Video

Published On : 31-May-2019 10:03am
अकेला खड़ा मैं नदी के किनारे,
एक लहर उछली मगर प्यास को छल गई,
राह सूनी रही, पथरा गये ये नयन,
प्रतीक्षा में एक और शाम ढल गई।

उम्र थोड़ी मगर,राह लम्बी रही,
कामना गगन से मिलन की,
जाने कैसे पल गयी ?
एक दिन ज़िन्दगी का फिर कम हुआ,
प्रतीक्षा में एक और शाम ढल गई।

सूरजमुखी के सहारों ने,ज़ख़्म ताज़े किये,
कालजयी घुटन दर्द की एक चादर बुन गई
हार गया तन, बिखर गया मन,
प्रतीक्षा में एक और शाम ढल गई।

ये बहारें ये खुशियां, हमारे नहीं,
चलो माना हम कुछ भी तुम्हारे नहीं,
कोई आयेगा मगर ये आस थी,
आँखों में किसके दर्श की प्यास थी ?
तुम्हारे लिये हृदय में फिर,क्यों पीड़ पल गई ?
प्रतीक्षा में एक और शाम ढल गई।

一 बालानाथ राय

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