भावों की ये, अभिव्यक्ति शब्दों के आधार है मेरी कलम ही, मेरे अस्तित्व की पहचान है.

कभी कभी उदासी में,
भी कुछ गुनगुना लेना चाहिए
बड़ा सुकून मिलता है जी

Uma vaishnav

आदत चाहे कोई भी हो,
वो हमेशा तकलीफ ही देती है

Uma vaishnav

इन पन्नों में,
क्या ढूंढते हो,
साहब,
हमने तो सबक जिंदगी से ,
सीखे हैं

Uma vaishnav

अब मुझे अंधेरों में,
डर नहीं लगता,
क्यूं की कुछ लोग,
उजालो में
भी धोखा दे जाते हैं

Uma vaishnav

मुखौटे की भी,
एक अजीब कहानी है,
वजूद इसका तो,
कुछ भी नहीं,
फिर भी बदनामी,
उसी की होनी है

Uma vaishnav

एक मुखौटे के पीछे,
कई चहरे छुपे होते हैं,
कुछ अच्छे,
तो कुछ बुरे होते हैं

Uma vaishnav

छुट्टी का दिन 😊😊

(पुरुष भाइयों के लिए विशेष रचना)

छुट्टी का दिन आया है,
थोड़ा आराम पाया हैं
पर मेरी बीवी ने मुझको,
काम पर लगाया है
बोली सन्डे का हैँ दिन
काम रहेगा मुझे पूरे दिन
आज तो थोड़ी सफाई करा दो,
दाल में थोड़ा तड़का लगा दो
वरना सिविगी से मंगवा दो
आराम करेगें दोनों मिल 😊
इतने में बच्चे आते हैं
बड़ा आतंक मचाते हैं
बोले पापा बाहर ले जाओ
सन्डे हैं कही सैर कराओ
वाटरपार्क चले हम मिल कर
धूम मचायेंगे हम मिल कर
ऎसे बीता सन्डे का भी दिन
आराम नहीं एक भी दिन
पर खुशियां अपार मिली हीप्पी होगई पूरी फैमिली 😊😊

उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित

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मेरा परिचय


यूँ तो मैं कुछ खास नहीं
मुझमें कोई बात नहीं
भावों की भाषा कहती हूँ
चाहत के नगमें बुनती हूँ
सुरत शहर में रहती हूँ
बच्चों के ट्यूशन लेती हूँ
मेरी प्यारी दो संतान हैं,
मानसी नरेश जिनके नाम हैं
सैयां जी बिज़नेस करते हैं,
हर दम व्यस्त ही रहते हैं,
बस इतना सा है मेरा परिचय,
अब इसके आगे हम क्या कहे,
साहित्य से हैं लगाव मेरा,
उमा वैष्णव हैं नाम मेरा

उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित

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गज़ल


हवाओं में वतन की इस तरह बदलाव ला देंगे।
जमीं से एक मुट्ठी खाक लेकर हम उड़ा देंगे।।

गगन तक महक मिट्टी की हमें अब यूं है पहुंचानी,
हवाओं की महक में एक खुशबू और ला देगें

हमेशा ही महकती जाएगी इस देश की मिट्टी ।
कलम के जोर से जग को यहीं हम अब बता देगें।।

रहे या ना रहे अब हम नहीं है फिक्र कोई भी।
जगत में देश की मिट्टी का हम जौहर दिखा देंगे।।

Uma vaishnav
मौलिक और स्वरचित

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