क्या पता कि हमारी मिट्टी की देह में जुड़े हुए हों मिट्टी के ही पंख कई, और आसमान हमारे नीचे हो? .......कथाएँ, कविताएँ, आप और हम

मन रे तुझको भाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन।

खोजके बोलो लाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन।

गिरहन रखी छुड़ाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन।

संझा बाती लाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन।

जंगल सारे जलाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन।

फूल काक औ' बास छितराए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन?

धरती पे अम्बर बिठाए कौन,
भोर भए सूरज पठाए कौन,
देहरी चंदा धर जाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन।

प्रभु बनबास पठाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन।

रावन मारे, रोहतास जिलाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन।

धनु पहाड़ उठाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन!

हज़ार नाम कहाए कौन,
एक पे दौड़ा आए कौन,
ये बंसी दूर बजाए कौन,
ये पास खड़ा मुस्काए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन?

गीता बेद सुनाए कौन,
गीत, भजनिया गाए कौन,
बाँचे और लिखवाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन?

तुम गए तो लाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन?

जोगी मन भरमाए कौन
मेरे हिस्से आए कौन।

दूर मुझे बुलाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन।

पास से मेरे ये जाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन?

भटके कौन भटकाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन?

रस्ता कौन, दिखाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन?

महँगा कौन, बिक जाए कौन,
देखे कौन, दिखाए कौन
भागे कौन, भगाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन?

माटी ये बिखराए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन!

ये सारे घड़े बनाए कौन,
ये सारे घड़े चुराए कौन,
कहाँ से पाए,
कहाँ से लाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन।

मैं जिऊँ, जिलाए कौन,
मैं मरूँ, जलाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन?

रचे किससे रचाए कौन,
मैं तुम सब नचाए कौन,
सब देख सब छुपाए कौन,
मेरे हिस्से आए कौन?

मुझको ये बतलाए कौन,
हिस्से ये बँटवाए कौन,
किस्सा ये बँचवाए कौन,
कहो,
मेरे हिस्से आए कौन?

माया से छुड़वाए कौन,
मुझसे मुझको मिलवाए कौन,
मैं क्या कहूँ कि कहलाए कौन,
देखो
मेरे हिस्से आए कौन!
-कलमनयन

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माँ कागज़ और एक पुरानी पेन लेकर बैठती है,
कागज़ मेरी डायरी के पीछे से फाड़ा एक टुकड़ा होता है,
बिल्कुल उतना बड़ा जितने पे बनाते होंगे गुज़रे ज़माने के समुद्री लुटेरे,
खोए ख़ज़ानों के रहस्यमयी नक्शे!

माँ की कलम दो साल से चल रही है,
और उसमें अब भी स्याही भरी है,
घर में बाकी सब की कलमें, किताबें, पेंसिलें खो जाती हैं तो सब माँ की कलम उठा लेते हैं,
पर स्याही खत्म ही नहीं होती कि मानो,
उसी कलम से लिखे गए हैं, वेद, पुराण, मनुस्मृति और महाभारत में,
औरतों के सारे किस्से,
और रचाए गए हैं इतिहास में औरतों के सभी चरित्र।

माँ कागज़ और पेन लेकर बैठती है और किराने की लिस्ट बनाती है,
आटा, दाल, चीनी के बाद अटक जाती है किसी राइटर्स ब्लॉक पर,
और पूजा के सामान की ओर भटक जाती है।
फिर किसी रोज वो लिस्ट पकवानों, तोहफों, त्योहारों के इंतज़ामों पर खत्म होती है,
जो सहसा ही माँ की कल्पना से फूटते हैं,
कई कविताओं, परीकथाओं और कहानियों की तरह।

माँ जब भी
कागज़ और पेन लेकर बैठती है,
मैं अपने कागज़ परे हटाकर देखती हूँ
साहित्य का जन्म और काव्य का प्रस्फुटन,
जो उपमा में कालिदास की हार है,
और निडर बेबाकी में प्रेमचंद की जीत।

माँ लिखती है, बहुत लिखती है,
और मैं बस उसके आसपास पहुँचने की कोशिश में हूँ।
-कलमनयन

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"प्रेम कैसा होना चाहिए"

प्रेम अगर रचना हो,
तो साबुन की तरह होना चाहिए,
जो बदन पर रगड़कर धो दिए जाने के बाद भी,
भर दे उसे और
उससे लिपटने वाले हर किसी को
अपनी ख़ुशबू से,
जो रच सके किसी के स्पर्श को आतुर
नन्हे बुलबुले,
और जिसे घर पर भी बनाया जा सके,
सबके स्वादानुसार!

प्रेम अगर विरोध हो,
तो माचिस के डब्बे की
आखिरी तीली की तरह होना चाहिए,
जो जला दे मोमबत्तियों की एक पूरी लड़ी,
और सबको महसूस हो जाए कि
"हम अकेले नहीं हैं"!

प्रेम,
जो केवल प्रेम हो,
तो,
मेरे और तुम्हारे बीच होना चाहिए।
-कलमनयन
#आतुर

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खुद को जानने की कोशिश करने वाले
ये कविता पढ़ रहे हैं,
क्योंकि
उन्हें खुद को जानने की कोई जल्दी नहीं है।

खुद को जानने की कोशिश करने वाले,
ऐसी कविताएँ लिखते हैं,
क्योंकि
वे खुद को खोजते खोजते भटक चुके हैं।

खुद को जानने की कोशिश करने वाले,
मिसरी के दोने थामे,
दीवारों के भीतर बैठे भगवानों को छानते हैं,
जो खुद तिलमिला रहे होते हैं,
इस ज़बरदस्ती की अलगौझी में!

खुद को जानने की कोशिश करने वाले,
जंगल, पोथी, पहाड़, सब बाँचते हैं,
और पूछते हैं ऊँची अटारियों पर बैठे,
खुद को जानने का दावा करने वालों से,
खुद का और भगवान का पता!

खुद को जान चुके अधनंगे जोगी,
लोट रहे होते हैं घाटों की धूल में,
किसी छोटी गुमटी के पैताने,
और मिट्टी मिली चाय पर सुन रहे होते हैं
भटकती दुनिया के समाचार,

और खुद को जानने वालों का भगवान,
भीतर बैठा होता है विज्ञापन सहित,
किसी प्रिंटिंग प्रेस के मुफ्त में बाँटे कैलेंडर पर,
और हँस रहा होता है,
बाहर आने जाने वालों पर!

खुद को जानने वाले जोगी, चाय और भगवान,
साथ ही बैठते हैं,
खुद को जानने की कोशिश करने वालों के इंतज़ार में,
और साथ ही परोसे जाते हैं,
खुद को जान सकने वालों को!
-कलमनयन

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मैं कई जगहों पर खोज चुका हूँ देवता!
बल्कि,
मेरी अब तक की आयु
आयु को रचने वाले की ही खोज में निकली है,

और मैंने समझा है
कि मनुष्य को देवता इसीलिए नहीं मिलते,
क्योंकि उसने उन्हें स्वर्गों में बसा रखा है,
और जो उतनी दूर की नहीं सोच पाते,
उनके देवता भी हाथी घोड़ों पर बैठ आते हैं,
और बसते हैं
ऊँचे पहाड़ों और घने जंगलों में,

और देवता को मनुष्य इसीलिए नहीं मिलते,
क्योंकि
मनुष्य उन्हें बुलाते हैं तो
सावन ढले एकाध महीनों की रामलीलाओं में,
और फिर भेज देते हैं वापस,
बिना उनका पता ठिकाना जाने,
और देवता फिर खो जाते हैं!

पर मेरा मानना है कि देवता बहुत पुराने हैं
स्वर्गों और रामलीलाओं से,
इसीलिए वो इतिहास से आते हैं!

मेरा मानना है कि भगवान रहा होगा वो
जिसने पहली बार दो पत्थर खटकाकर आग जलाई होगी,
और ठंड में ठिठुरते वनवासी के लिए
बन गया होगा आग का ही पर्याय!

ईश्वर रहे होंगे वे कुत्ते, गाय और घोड़े,
जो जंगलों से निकलकर चले आए होंगे खेतों में जूझते पहले किसानों तक,
और जो अंततः कहलाए होंगे देवताओं की सवारियाँ!

देवता रहे होंगे पहली बार पहिए, हल और छैनियाँ तराशने वाले,
और जिन्हें संज्ञा दे दी गई होगी
खदानों, भट्टियों और खेतों के विश्वकर्मा की!

परमात्मा रहे होंगे लिखने, सिखाने और पढ़ाने वाले,
बटोरने और बाँटने वाले,
और वही जाने गए शिव, ब्रह्मा, विष्णु, रमा, शारदा कइयों नामों से!

अपनों के लिए प्रकट से प्रकृति तक लड़ जाने वाले बने होंगे
दुर्गा, राम और कृष्ण आदि,
और देवताओं के चमत्कार इतने तक ही सीमित हैं,
कि उन्हें सहज ही भुला दिया है इतिहास ने!

और ऐसे ही शायद मुझे मिल गए हैं सारे देवता,
जो कभी हुए थे,
और अब जो हो सकता है,
वह है सिर्फ हम सबका उनपर विश्वास,
और यही मेरी खोज का अंत है,
और देवताओं की खोज का आरंभ!
-कलमनयन

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"परीकथा"

मैंने एक बोलते सर्प की कथा लिखी
और मैं डर गया
ये सोचकर कि
एक बोलता सर्प
कितना ज़्यादा विष, कितनी देर तक
कितनी दूर फैला सकता है,
और विष क्या केवल सर्प की ही संपत्ति है,
या उससे भी अधिक विष
अपनी कल्पना में घोलकर,
मैंने एक बोलते सर्प की कथा लिखी है।

मैंने एक राजा सिंह की कथा लिखी
और मैं डर गया
ये अनुभव करके कि
एक शक्ति के मद में चूर जीव,
कैसे करेगा पालन किसी भी प्रकार के राजधर्म का,
और क्या एक महाशक्तिमान राजा ही
राज्य, न्याय और दंड का
एकमात्र विकल्प है,
क्योंकि बल ही रक्षा का आधार है,
या हम एक दूसरे से इतना डरते हैं,
हम में इतनी कुंठा है,
कि हमने जानबूझकर,
एक राजा सिंह की कथा लिखी है।

मैंने एक दयालु देवदूत की कथा लिखी,
और मैं डर गया,
ये समझकर कि
मुझे अपने जाने बूझे संसार में नहीं मिला
दया का कोई भी उदाहरण,
और दया करुणा की खोज में
मुझे मात्र एक किरदार नहीं,
अपितु एक सम्पूर्ण नया संसार रच देना पड़ा,
और अवसाद में घुटते हुए,
मैंने एक दयालु देवदूत की कथा लिखी।

मैं अब परीकथाएँ लिखने से डरता हूँ,
क्योंकि वे सीख-समझावन से अधिक
सत्य कहते हुए चीखने लगती हैं,

समाज के खोखलेपन को
चीर देती हैं चारों ओर से,
बेसुरी रागिनियों से तड़पती बाँसुरी की तरह,

और
दर्पण बन जाती हैं मेरे अवसाद, भय और कुंठा का,
जो अंततः,
मेरे ही सर पर गिरकर फूट जाता है,
और आपबीती के नाम पर
मैं अपने खून में घोलकर,
डरते हुए
एक और परीकथा लिख देता हूँ।
-कलमनयन

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"विडंबना"

गाँव के सबसे बड़े ऊँट के मुँह में
जीरा रखकर,
उसका पेट भर देना,
जंगल में हाथियों का झुंड दिख जाने से
ज़्यादा संभव है, सहज है,
और यही प्रकृति में
मानव के अस्तित्व की विडंबना है,
और भाषा में कहावतों और कल्पना का अंत है।
-कलमनयन

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तुम्हारा प्रेम मेरा भय है,
पर मेरा भय,
तुम्हारा प्रेम नहीं है,
क्योंकि तुम्हारा प्रेम मैं हूँ।

मेरा भय मेरा प्रेम भी नहीं है,
पर मेरा भय भी
तुम्हारे प्रेम को खोने से जुड़ा है,
फिर मेरा भय क्या है?

तुम्हारा भय मेरे प्रेम से जुड़ा है,
तुम मेरे हो,
मैं तुम्हारी हूँ,
प्रेम हम दोनों का है,
तो भय किसका है?
भय क्या है?
भय तुम्हारा है या मेरा है?
यही प्रश्न है,
जिसने सारा समीकरण बिखेरा है।
-कलमनयन

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मुझसे प्रेम करने वाले
सारे लड़के,
रुक नहीं सके मेरे पूरी तरह खुलने
या पूरी तरह सिमट जाने तक,
या इससे पहले कि
मुझे भी उनसे प्रेम हो जाता,
सिवाय तुम्हारे,
इसीलिए,
तुम्हें ही प्रेम में वो सब मिल रहा है,
जो पीढ़ियों से सीखा है
मेरे घर की औरतों ने,
और सिखाती आईं हैं,
अपने साथ की लड़कियों को,
प्रेम के वो सारे तौर तरीके,
जो चोरी चुपके पुराने सिंधौरे में
रखे लड्डुओं-से,
जो अटारी के सबसे ऊँचे ताकों पर
बिल्कुल कोने में छुपाए जाते थे,
तब के लिए,
जब चूल्हे के पीछे रखी चिक्कियाँ खत्म होने के बाद,
होली मिलने आई जीजी,
ससुराल लौटने वाली होती थी,
या मैदान से
फ़िर चोट खाकर भाग आता था भइया,
या मैं फिर पकड़ी जाती थी,
अमराइयों में कैरियाँ चुराते हुए,
और हम सभी घर उतने ही खाली लौटते थे,
जितने कि तुम
दुनिया से थक कर मेरे पास रह रहकर लौट आते हो,
और मेरे पास हर बार,
तुम्हें देने के लिए थोड़ा सा और प्रेम होता है,
जिसकी उम्मीद नहीं थी तुम्हें,
पर प्रतीक्षा थी,
और था वही,
लड्डुओं सा बालसुलभ विश्वास,
जो पीढ़ियों से सिखाते आए हैं,
तुम्हारे जैसे प्रेमी,
और सीखते आए हैं तुम्हें देखकर
तुम्हारे साथ के लड़के।
-कलमनयन

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बैठा था मैं वक़्त की ओस से भीगी
ज़िंदगी की घास पर,
हथेलियों से ढूँढ़ता आँसुओं की बूँदें,
मुस्कुराहटों के उल्लास पर,
याद कर रहा था माटी में खोया
कुछ सूखा,गुज़रा सा,
निहार ले रहा था कुछ बाहर उमड़ता,
उसी अज्ञात की आहटों से,
कि तभी वो आई
मुझे झकझोरा,मेरी हथेली उठाई,
और साथ लिए ही चल दी आगे और आगे,
वो सामने,मैं पीछे,
वो हाँफती, मैं साँसें खींचे,
ताकि सुन सकूँ मैं ही धड़कनें उसकी
उसके पड़ते कदमों की थाप,
और वो बेख़बर चलती रहे,
सफ़र, कदम,दूरियाँ नाप,
फिर जब आगे चलते वो जो हाथ मेरा छोड़ दे,
गिरती शबनम की बूँद कोई,
उसके नाम के साथ याराना जोड़ दे,
और फिर दोबारा हाथ फेरते हुए वक़्त पर
मैं सोचूँ कि क्या यही प्रेम था?

उन बीते हुए हाथों की गर्मी से,
भीगी ओस की नरमी को,
वक़्त की की गई इस बेशर्मी को
छूता बैठा रहूँ मैं ऐतबार में,
फिर थाम लूँ थमाया गया हाथ कोई
और फिर मैं आगे चलूँ,
हाँफते, हाथ भींचे
और वो पीछे शांत,साँसें खींचे,
उसकी बचाई साँसों की ठंडक का आराम,
महसूस करता पहुँच जाऊँ वहाँ,
जहाँ सिर्फ़ मुझे उसे छोड़ना है,
और दोबारा किसी और दिन
पुनः रिश्ता जोड़ना है,
वो ठंडक भले मुझे फिर सिहरन नाकाम दे दे,
और वक़्त उस चेहरे को भाई का नाम दे दे,
और फिर दोबारा हाथ फेरते हुए शबनम पर
मैं सोचूँ कि क्या यही प्रेम था?

फिर बैठकर मैं वक़्त की ओस से भीगी
ज़िन्दगी की घास पर,
हथेलियों से ढूँढ़ते आँसुओं की बूँदें,
मुस्कुराहटों के उल्लास पर,
इंतज़ार करूँ उस हथेली का
जिसके साथ मैं चल सकूँ,भाग सकूँ,
उसकी छुअन को भींचे,
साँसें अपनी खींचे,
फिर हम दोनों सुनें वही संगीत,
पैरों की थापों से निकले गीत,
छोड़ना भी पड़े जो ये साथ कहीं,
वो भी बैठा हो कहीं वक़्त की ओस से भीगी
ज़िन्दगी की घास पर,
और उस पर गिरती शबनम से
होते नए विकास पर,
और कहीं,मेरी हथेलियाँ भी भीग जाएँ
और हम मिलें दोबारा,
ढूँढ़ते आँसुओं की बूँदें,
मुलाकातों के उल्लास पर,
और मैं कहूँ कि प्रेम यही है,
यहीं है।
-शाम्भवी

#गीला

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