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કલમ, "કમળ" ની લખે કીચડ વિશે!
ગંદગી ગળાકાપ તત્વો ની માયા છે સીંચે,
સત્ય અસત્ય નો અંતર ખેંચે!
નિદ્રા મા, ઘોર અંધારા માં પ્રકાશ ના તત્વો છે ચિંદે,
એટલે તો કલમ કમળ ની લખે કીચડ વિશે!

@sumit

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अच्छा "लगे रहो मुन्नाभाई" फिल्म देखी ही होगी आपने? इस फिल्म में कैसे मुन्ना और सर्किट अपने जीवन में आए संकट को "गांधीगिरी" से टालते है।

यही देख तो मुझमें भी अहिंसा की भावना जगी थी।
कैसे जगी? चलो मैं आपको अपने बचपन में ले चलता हूं, जब हम गर्मियों की छुट्टियों में बड़ा-सा टोला बनाकर मैदान में क्रिकेट खेलने जाया करते थे। अच्छा, तो हुआ यूं कि एक बदमाश व असभ्य लड़का रोज़ हमारी क्रिकेट खेलने की पिच पर "मूत्र-विसर्जन" करता।हम भी उसे कुछ नहीं बोलते पर बस "विनम्रता" से एक छोटी सी स्माइल देकर, खुद मिट्टी डालकर उसकी गंदगी साफ कर देते!

वह असभ्य लड़का रोज़ आता और हमारी पिच खराब करता! एक दिन जब हमारी गेंद कांटो वाली झाड़ियों में फंस गई तो किसी से नहीं निकल रही थी, तभी हमें उस लड़के से मदद मांगने की तरकीब सूझी! उस लड़के से हमने गेंद निकलवाने की मदद मांगी, उसने हामी भरी और गेंद निकल गई। हम सबने उसे Thank You कहा और उसे हमारे साथ खेलने के लिए मनाया। अगले दिन वह असभ्य लड़का "सभ्य" बन चुका था और हमारा मित्र भी!
अभी आपके मन में ख्याल आ रहा होगा कि हमने किस तरह की गांधीगिरी की? तो मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अगर आपको आपके दुश्मन से मित्रता करनी है तो उसे सीधे तौर पर उनकी गलतियां मत समझाओ बल्कि उससे आप कोई मदद मांगो। इससे उस व्यक्ति को अपनेपन सी फीलिंग होगी और वह सुधर भी जाएगा!!!

#Gandhigiri #story

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तेरी यादों में मै नजरबंद।

था मैं इतना अकलमंद,

जो तेरे आने से हुआ छंद विछंद।

तुझे पाने के लिए पढ़े कई प्रेमग्रंथ!

तू थी जैसे राधा, कान्हा की तरह प्रेम किया, पर पा ना सका तुझे ऐसे मेरा दिल हुआ खंड खंड।

#love #lovestory #poem

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"वो गुजरी थी....!"
(प्रेम कविता)

वो गुजरी थी, हां गुजरी थी ना मेरे कनखियों के किनारे से।

उसकी चाल लगी जैसे "अंगारे" से।

मैने पीछे मुड़कर देखा, हां देखा ना पर वो चली गई थी किसी समय के "सुरंग" में!

पहली बार ऐसा महसूस हुआ जैसे कठोर से दिल का जलती हुई मोम की तरह पिघल जाना।

पहली बार ऐसा प्रतीत हुआ मानो आग का पानी से मिलन होना!

वो फिर दिखी? हां दिखी ना मेरे गहरे से समन्दर वाले ख्यालों में "जलपरी" की तरह।

मैने उससे अपनी इच्छाएं मांगी, मांगी ना पर वो चली गई मेरे सुंदर से ख्यालों के कांच की तरह टूटने से!

वो फिर दिखी, हां दिखी ना, जैसे ईद में चांद का दिखना।

बिन बारिश में भी मिट्टी की खुशबूओं का फैलना!

उसने मुझसे आंखे मिलाई, हां मिलाई ना जैसे तपते हुए सूरज को आंखे मूंद कर देखना।

ऐसा लगा मानो, उड़ते हुए पतंगों का हवाओं से मिलना!

ऐसा प्रतीत हुआ जैसे किसी की याद में हिचकियां होना।

हम दोनों हंसे, हां हंसे ना, मानो किसी नई प्रेम कहानी की शुरूआत होना!

(प्रेम कविता)

#kavyotsav2 #kavyotsav #प्रेम #काव्योत्सव #काव्योत्सव2

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"मैं फिर से "बच्चा" बनना चाहता हूं!"

समय के पंखों को ओढ़कर मैं सपनों के "आकाशगंगा" में उड़ना चाहता हूं, क्योंकि मैं फिर से "बच्चा" बनना चाहता हूं!

ना कल की कोई फिक्र, ना दिल में औरों के लिए 'छल' का कोई जिक्र,

ना रंग से, ना पैसों से, ना कोई जातपात से, बनाए जाते मित्र खेल-खेल में!

भूख की तो चिंता छोड़ो, खा लिया करते थे उन मिट्टी से बने "टीलों" को...!

पाठशाला था जैसे दूसरा "घर" तो वहां के शिक्षक थे हमारा दूसरा "परिवार"।

शिक्षकों के ना आने के कारण होती कक्षा में "वर्ग-व्यवस्था", तो पूरे चरम पर आ जाती हमारी "बाल्यावस्था"!

बारिश में मिट्टी की सोंधी खुशबू को मानो शरीर पर "इत्र" की तरह मल देते, कागज़ की नाव में कभी अपने "मन" को भी तैरा लिया करते थे।

पाठशाला की होती अगर आखिरी "परीक्षा", तो उस दिन ऐसा प्रतीत होता मानो जीत ली हो कोई कठिन सी "प्रतिस्पर्धा" !

गर्मियों की छुट्टियों में "ट्वेल्थ मेन" की तरह शामिल कूलर का फिर से गूंजना, गोले वाले की टीन-टीन सुनकर तेज़ी से उसकी ओर दौड़ना और दिनभर खेलते रहना....!

डोरेमोन की "टाइम मशीन" में बैठकर फिर से उन संकरी गलियों में क्रिकेट खेलना चाहता हूं, क्योंकि मैं फिर से "बच्चा" बनना चाहता हूं!

मां की गोद "स्वर्ग", तो पापा के दिए दो रुपए जितनी भी 'पॉकेट मनी' से मानो दुनिया खरीद ले ऐसी होती "हसरत"!

भाई की पिटाई पर हसना और बहन की रक्षा में बड़ों से भी उलझ जाना!

बचपन के "साम्राज्य" में हुआ करते थे राजा, पर अब जवानी में भरा हुआ "मन" रूपी तालाब भी लगता है सूखा।

मैं "शकलक बूम बूम" वाली पेंसिल से बचपन की "अदृश्य" हुई यादें बनाना चाहता हूं, क्योंकि मैं फिर से "बच्चा" बनना चाहता हूं।

कभी "बस्तों" में किताबों का वज़न भी हल्का लगता, पर अब तो लोगों की उम्मीदों के भार ऐसे लगते मानों किसी "गधे" पर सामान है ढोया !

कभी "कागज़" के जहाजों से तारों को तोड़ लाया करते थे, अब तो ये तारें टूटने का नाम ही नहीं लेते !

मैं विक्रम के साहस से जवानी की "मिथ्या" को सुलझाना और बेताल के उलझे हुए "सवालों" में फिर से उलझना चाहता हूं, क्योंकि मैं फिर से "बच्चा" बनना चाहता हूं!

समय के पंखों को ओढ़कर मैं सपनों के "आकाशगंगा" में उड़ना चाहता हूं, क्योंकि मैं फिर से "बच्चा" बनना चाहता हूं!

#Kavyotsav2 #childhoodmemories

(भावनाप्रधान कविता)

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प्यार by Soul!

आज रवि की शादी थी, मुस्कान से, यह एक "Arrange marriage" थी। रवि के दिल के अन्दर कुछ बातें "तैर" रही थी, पर बदनामी के डर के कारण उसने बातों को अपने दु:ख के समंदर में डूबो दिया था!

वो अपने माता-पिता को हमेशा यूं ही कहता कि मुझे शादी नहीं करनी...वो नहीं चाहता था कि उसके कारण किसी लड़की का जीवन ख़राब हो! पर परिवार वालों और खासकर माँ की जिद्द ने रवि को मुस्कान से शादी करने पर मजबूर कर दिया था!
शादी के बाद मुस्कान से आँखें नहीं मिला पाता था और ना ही ठीक से बात कर पाता था।
मुस्कान ने एक दिन रवि से सच्चाई और सारी दबीं बातों को उससे उजागर करने को कहा, रवि छटपटाया और सोचा कि "मैं अपनी ख़ामियों का दोष उस बिचारी को क्यों दे रहा हूँ!"

बाद में उसने मुस्कान को अपनी सारी बातें बताई। कहा, "मैं वो वृक्ष, जो फल-फूल नहीं दे सकता, साफ़-साफ़ कहूँ तो मैं 'नपूसंक' हूँ, बदनामी के डर और परिवार वालों के शादी करने के दबाव से मैं किसी को बता नहीं पाया, I am sorry!"

मुस्कान सन्न रह गई और बाद में हल्की-सी मुस्कुराहट लेके बोली "मैंने तो वृक्ष से प्यार किया है, ना कि उसके फल-फूल से!"
रवि की आँखें खुशी से भर आई और मुस्कान को गले से लगा लिया!

तो, इस कहानी से यह सीख मिलती हैं कि प्यार शरीर से नहीं, बल्कि आत्मा से किया जाना चाहिए! तो ही प्यार के रिश्ते मजबूत होते हैं।
#Moralstories #Pyarbysoul

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"जब एक अंधे ने सही राह दिखलाई!!"

तकरीबन दो महीने बीतने को आए और आशिष आज भी बेरोज़गार बैठा है। ग्रेजुएशन अच्छे नंबरों से पास किया था,सोचा कि उसे अब आराम से नौकरी मिल जाएगी।
आशिष नौकरी की तलाश में भटकने लगा लगभग दस से ज्यादा कंपनियों में 'इंटरव्यूस' दिए...पर कोई भी कंपनी उसे लेने को तैयार नहीं हुई!

बेकारी के कारण घर में हमेशा सोते रहना, मोबाईल फ़ोन पर समय बर्बाद करना, जैसे उसकी 'दिनचर्या' बन गई हो। बेरोज़गारी के कारण वह चिड़चिड़ा-सा हो गया था, मानो 'डिप्रेशन' के झाल में फँसते जा रहा हो!
एक दिन उसे 'interview call' आया, कंपनी की H.R Head को दबी आवाज़ में interview देने के लिए हाँ तो कर लिया , पर उसका मन अब भी रो रहा था। हांलाकि मन को मनाया और interview देने के लिए निकल पड़ा।

बस में चढ़कर, दूसरी बस बदलने के लिए शहर के मुख्य बस स्टेशन पहुंच गया। लोगों की भीड़ और फेरिये वालों की आवाजों के बीच एक "गरजती" हुई आवाज आई "शू पोलिश...शू पोलिश,आपके जूतों को 'आइने' की तरह चमकाए, जब आपका मगन मोची आए!" आशिष ने भी अपनी 'जिज्ञाष़ा' को संतुष्ट करने के लिए पास जा़कर देखा तो आश्चर्यचकित हो गया! पता चला कि मगन "दिव्यांग" है, आँखो से देख नहीं पाता है, फिर भी वो इतना संघर्ष कर रहा था!

आँखों से न देख पाने पर भी जीवन की नाव को आगे बढ़ाते रहने का 'परिश्रम' और चहरे पे हंसी देखकर आशिष भावुक हो गया और उसे जीवन का सार समझ में आ गया! ठाना कि "चिंता करने से कुछ नहीं होता, मेरे पास तो पूरा शरीर है पैसे कमाने को और मैं इतनी जल्दी हार मान गया, अभी मैं संघर्ष करूँगा, लडूँगा इन खराब परिस्थितियों के खिलाफ, पर कभी हार न मानूंगा!"
#Moralstories #Motivational

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