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चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा - 5
by Suraj Prakash
  • 24

चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा अनुवाद एवं प्रस्तुति: सूरज प्रकाश और के पी तिवारी (5) कई बातों में वे बहुत महान चरित्र के इंसान थे। उनमें कुछ ऐसा भी था ...

चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा - 4
by Suraj Prakash
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चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा अनुवाद एवं प्रस्तुति: सूरज प्रकाश और के पी तिवारी (4) मुझे इस बात की हैरानगी है कि कैम्ब्रिज में मैंने जितने भृंगी-कीट पकड़े, उनमें से ...

चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा - 3
by Suraj Prakash
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चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा अनुवाद एवं प्रस्तुति: सूरज प्रकाश और के पी तिवारी (3) इन दोनों ही वर्षों में गर्मी की छुट्टियों में मैंने खूब मज़े मारे। हाँ, इतना ...

चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा - 2
by Suraj Prakash
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चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा अनुवाद एवं प्रस्तुति: सूरज प्रकाश और के पी तिवारी (2) स्कूली जीवन के शुरुआती दौर की ही बात है, एक लड़के के पास `वन्डर्स ऑफ ...

चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा - 1
by Suraj Prakash
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चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा अनुवाद एवं प्रस्तुति: सूरज प्रकाश और के पी तिवारी अनुवादक की बात महान प्रकृतिविज्ञानी चार्ल्स रॉबर्ट डार्विन (12 फरवरी 1809- 19 अप्रैल 1882) को प्रजातियों ...

कार्टून
by Deepak sharma
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कार्टून प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट प्रभाज्योति अपने हर इन्टरव्यू में अपनी माँ की सीख दोहराते हुए उन के प्रति अपना आभार प्रकट करती है| बताती है वह जैसे ही हाथ में ...

गुजराती हिन्दी की भाषाई नोंक झोंक - 3
by Manju Mahima
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गुजराती हिन्दी की भाषाई नोंक झोंक संस्मरण-4 ढाबा            गुजरात में रहकर गुजराती के नए शब्दों को जानने में बडा़ मज़ा आ रहा था. विशेष कर ऐसे चिर परिचित ...

पके फलों का बाग़ - 12
by Prabodh Kumar Govil
  • 303

मुझे महसूस होता था कि अब लोगों से निकट आत्मीय रिश्ते बहुत जटिल होते जा रहे हैं। आपको ज़रूर इससे हैरानी हो रही होगी। आप कहेंगे कि उल्टे अब ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 25 - अंतिम भाग
by Santosh Srivastav
  • 1.4k

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (25) आत्मविश्वास के पद चिन्ह संतोष श्रीवास्तव की रचनाधर्मिता के कई आयाम है। वे एक समर्थ कथाकार, संवेदनशील कवयित्री, जागते मन और ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 24
by Santosh Srivastav
  • 390

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (24) इन दिनों यूट्यूब चैनलों की बाढ़ सी आ गई है दिल्ली के ललित कुमार मिश्र का यूट्यूब चैनल वर्जिन स्टूडियो नाम ...

पके फलों का बाग़ - 11
by Prabodh Kumar Govil
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क्या कोई इंसान अकेला रह सकता है? कोई संत संन्यासी तो रह सकता है, पर क्या कोई दुनियादारी के प्रपंच में पड़ा हुआ इंसान भी इस तरह रह सकता ...

गुजराती-हिन्दी की भाषाई नोंक झोंक  - 2
by Manju Mahima
  • 231

गुजराती -हिन्दी की भाषाई नोंक झोंक संस्मरण-2              हमारे भारत की भाषाओं की यह बड़ी विशेषता है कि वे अलग अलग होते हुए भी मूल से ...

अमर शहीद वीर भगत सिंह
by Slok
  • (19)
  • 480

अमर शहीद वीर भगत सिंहआज बात करुगा अमर शहीद भगत सिंह की, १९०७ में उसका ज़न्म हुआ। लायलपुर नाम का गाव, लाहौर में पड़ता है,आज जोकी पाकिस्तान में है। ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 23
by Santosh Srivastav
  • 282

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (23) मेरी ट्रेन 5 घंटे लेट थी । दिल्ली पहुंचते ही भारत भारद्वाज से मिलना था। उनकी तबीयत ठीक नहीं थी और ...

पके फलों का बाग़ - 10
by Prabodh Kumar Govil
  • 465

इन दिनों मुझे लगने लगा था कि जीवन भर के रिश्तों को एक बार फ़िर से देखा जाए और जिस तरह किसी अलमारी की सफ़ाई करके ये देखा जाता ...

अलग तरह का देश
by Abdul Gaffar
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अलग तरह का देश अब्दुल ग़फ़्फ़ार बेहद ख़ूबसूरत ... मख़मल सी मुलायम, मलमल सी सफ़ेद, मरमरी बाहें, तपती निगाहें, मदमस्त चाल... बॉलीवुड की नई तारिका रश्मि गर्ग ... का ...

पके फलों का बाग़ - 9
by Prabodh Kumar Govil
  • 354

कभी- कभी सभी लोग इस तरह की चर्चा करते थे कि इंसान का पहनावा कैसा हो। वैसे तो ये सवाल लाखों जवाबों वाला ही है। जितने लोग उतने जवाब। ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 22
by Santosh Srivastav
  • 297

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (22) केरल जाने के लिए मुम्बई से फ्लाइट लेनी थी। मुंबई पहुंचते ही न जाने क्या हो जाता है मुझे । मुंबई ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 21
by Santosh Srivastav
  • 366

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (21) कबीर तन पँछी भया, जहाँ मन तहाँ उडि जाय भोपाल बिल्कुल अनजाना शहर। रिश्तेदारों में बस विजयकांत जीजाजी। सभी की जुबान ...

पके फलों का बाग़ - 8
by Prabodh Kumar Govil
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मुझे लग रहा है कि आपको पूरी बात बताई जाए। एक बार एक सेमिनार में बहुत सारे रिसर्च स्टूडेंट्स ने मुझसे पूछा कि जिस तरह से विज्ञान के क्षेत्र ...

पके फलों का बाग़ - 7
by Prabodh Kumar Govil
  • 399

अनुवाद बहुत आसान है। कोई भी मैटर लो, फॉर एग्जांपल, "ये ज़िन्दगी उसी की है जो किसी का हो गया", ठीक है? अब हम इसे किसी अन्य भाषा में ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 20
by Santosh Srivastav
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मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (20) इन दिनों कविता के प्रति रुझान तेजी से हो रहा था। कहानी दिमाग में आती ही नहीं थी। सुबह घूमने जाती ...

नरोत्तमदास पाण्डेय मधु जी का जीवन और व्यक्तित्व
by कृष्ण विहारी लाल पांडेय
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ऽ नरोत्तमदास पाण्डेय मधु जी का जीवन और व्यक्तित्व नरोत्तमदास पाण्डेय ’’मधु’’ बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में बुन्देलखण्ड के ऐसे कृती कवि हुए हैं जिन्होंने प्रभूत परिमाण में उत्कृष्ट ...

पके फलों का बाग़ - 6
by Prabodh Kumar Govil
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आने वाला फ़ोन मेरे एक मित्र का था जो इसी शहर में एक बड़ा डॉक्टर था। उसने कहा कि उसे अपने एक क्लीनिक के लिए एक छोटे लड़के की ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 19
by Santosh Srivastav
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मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (19) इतनी लंबी साहित्यिक यात्राओं के बाद मुझे काफी समय खुश रहना चाहिए था पर मेले की समाप्ति का सूनापन मेरे साथ ...

पके फलों का बाग़ - 5
by Prabodh Kumar Govil
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मुझे अपने जीवन के कुछ ऐसे मित्र भी याद आते थे जो थोड़े- थोड़े अंतराल पर लगातार मुझसे फ़ोन पर संपर्क तो रखते थे किन्तु उनका फ़ोन हमेशा उनके ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 18
by Santosh Srivastav
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मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (18) दिल्ली में मौलिक काव्य सृजन द्वारा कृष्ण काव्य सम्मान 20 अक्टूबर को मिलना था । कार्यक्रम के आयोजक सागर सुमन ने ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 17
by Santosh Srivastav
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मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (17) सूने घर का पाहुना ज्यूँ आया त्यूँ जाव औरंगाबाद पहुंचकर प्रमिला से लिपट खूब रोई । सब कुछ खत्म । हेमंत...... ...

पके फलों का बाग़ - 4
by Prabodh Kumar Govil
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मुझे रशिया देखने का चाव भी बहुत बचपन से ही था। इसका क्या कारण रहा होगा, ये तो मैं नहीं कह सकता पर मेरे मन में बर्फ़ से ढके ...

पके फलों का बाग़ - 3
by Prabodh Kumar Govil
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क्या मैं दोस्तों की बात भी करूं? एक ज़माना था कि आपके दोस्त आपकी अटेस्टेड प्रतिलिपियां हुआ करते थे। उन्हें अटेस्ट आपके अभिभावक करते थे। वो एक प्रकार से ...