Hey, I am on Matrubharti!

कभी सोचा ना था कि ऐसा भी शिक्षक दिवस आयेगा
जिसे एक टीचर घर बैठकर बनायेगा,
ना बच्चे पास होंगे ना कोई शोर मचायेगा,
न क्लासरूम होंगे ना कोई कुछ पढ़ायेगा,
ये स्कूल ये क्लाससे सब कुछ सुनसान पड़ा रह जायेगा,
ना बच्चों की मस्ती होगी ना टीचर डांट लगायेगा,
ना कोई प्रेयर होगी ना कोई अनुशासन सिखायेगा,
ना कोई शिक्षा होगी ना कोई संस्कार सिखायेगा,
ना बच्चे होंगे ना ही कोई अटेंडेंस लगवायेगा,
ना लंच होगा ना कोई बेल बजायेगा,
ना कोई शिकायत होगी ना कोई मुस्कुरायेगा,
ना कोई पढ़ेगा ना कोई पढ़ायेगा,
कभी सोचा ना था कि ऐसा भी शिक्षक दिवस आयेगा।
इस अधूरे शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🙏💐💐
- साक्षी जैन

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क्षमापना कोई आडंबर नहीं,
यह पर्व है पापों को धोने का,
अहंकार में लिप्त होने का नहीं,
निर्मल भावो से मन का मेल धोने का,
विषय कषायो में फसने का नहीं,
कर्म बंधनों से मुक्त होने का,
गलतियों की गांठ लगाने का नहीं,
यह वक्त है उलझी गांठ को सुलझाने का,
पुरानी गलतियों को दिल से लगाने का नहीं,
यह वक्त है क्षमा करने का और कराने का,
क्षमा मांगने से कोई छोटा होता नहीं,
क्षमा करने वाले से बड़ा और कोई होता नहीं,
अनजाने में हुए हैं हमसे जो भी भूल और पाप,
इन सबके लिए मुझे क्षमा करें आप।
क्षमा वीरस्य भूषणमं।
उत्तम क्षमा 🙏🙏🙏
-साक्षी जैन

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#biteson
आज के वक्त को देखकर लगता है कि इंसान के जीने से ज्यादा इंसान के मरने की कीमत है। जिंदा अगर कोई इंसान है तो उसे कोई नहीं पूछता उसके साथ बेगानों सा सुलूक किया जाता है और मरने के बाद उसे बड़ा याद किया जाता है।
इसी बात पर दो लाइन पेश है-
पता ना था मौत इतनी हसीन है,
हम तो कमबखत बेवजह जी रहे थे।

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"राखी एक अनोखा त्यौहार"

राखी एक अनोखा त्यौहार है,
जिसमें प्यार और अपनापन बेशुमार है,
भाई बहन के रिश्ते की,
यह अनोखी सौगात है,
भाई बहन का रिश्ता ही,
अपने आप में कुछ खास है,
जिसमें खट्टी और मीठी यादें,
दोनों एक साथ है,
यह त्यौहार उन यादों को,
साथ में ले आता है,
हम दूर-दूर हो तो भी,
यह त्यौहार हमें पास ले आता है,
राखी के बंधन में,
अटूट प्यार और विश्वास होता है,
एक दूसरे की रक्षा का वादा,
इसमें बहुत खास होता है,
राखी को बांधने का भी,
एक अलग अंदाज होता है,
उसे बांधने और बंधवाने वाला,
पहले खुद तैयार होता है,
थाली को लगाकर फिर,
उसे कुमकुम अक्षत और दिये से सजाते हैं,
राखी के डोरे में हम,
अपना प्यार सजाते हैं,
माथे पर तिलक लगाकर,
हम उस पर अक्षत लगाते हैं,
नारियल पर शगुन रखकर,
भाई के हाथों में उसे थमाते हैं,
भाई की कलाई पर बांध कर राखी,
फिर अपना प्यार जताते हैं,
बड़े ही प्यार से फिर,
उसका मुंह मीठा कराते हैं,
बाद में नेक के नाम पर,
उसकी जेब भी ढीली कराते हैं,
बड़ी ही प्यारी होती है,
ये रस्मे जिन पर हम अपना प्यार लुटाते हैं,
याद करते हैं एक दूसरे को,
और बहुत याद आते हैं,
बड़ी ही खुशी और हर्षोल्लास के साथ,
हम रक्षाबंधन का त्योहार मनाते हैं।
Written by- Sakshi jain

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"दोस्ती"
दोस्तों के बिना जिंदगी अधूरी होती है,
दोस्तों से ही तो जिंदगी की कमी पूरी होती है,
दोस्तों के साथ से ही तो मिलता है अपनापन,
दोस्त सच्चा हो तो बदल जाता है जीवन,
दोस्ती का रिश्ता चेहरों से नहीं किया जाता,
ये वो रिश्ता है जो दिल के धागों से है बंध जाता,
दोस्ती का रिश्ता इसलिए भी खास है क्योंकि,
इसमें ऊंच नीच और जात पात का कोई नहीं काम है,
दोस्तों के होने से लगता है कोई तो ऐसा पास है,
जो सिर्फ मेरी अच्छाई में ही नहीं
मेरी बुराई में भी मेरे साथ है,
दोस्त है तो लगता है जैसे
किसी बंजर जमीन पर भी है हरियाली,
दोस्त नहीं हो तो लगता है जैसे,
सावन में भी सूख रही हो पेड़ों की डाली,
दोस्ती का रिश्ता ऐसा ही खास है, जिसमें खुद को बदलता नहीं कोई इंसान है,
यही तो इसकी सबसे अच्छी बात है,
जैसे आप हो वैसे ही आपको अपनाता वह इंसान है,
दोस्त साथ हो तो दुनिया का हर दर्द कम लगता है,
उसके साथ बांट लो गम तो दुनिया का हर गम कम लगता है,
यह कैसा रिश्ता है जो खुद ब खुद बन जाता है,
जाने-बिन जाने भी कोई हमारा दोस्त बन जाता है।
Happy friendship day to all my dear friends😊
Written by- Sakshi jain

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#Bites #
""प्यार एक एहसास.....""

प्यार एक एहसास है
                              जो अपने आप में बहुत खास है,
इसके होने से लगता है
                              जैसे कोई हर वक्त हमारे साथ हैं
प्यार की दुनिया में
                                  खुशियां बेहिसाब है,
ऐसा लगता है मानो
                                  पतझड़ में भी बरसात है,
उसकी बातों से लगता है जैसे
                           कानों में मिश्री सी घुल रही मिठास है,
उसकी बातों को सुनकर
                          चेहरे पर हर वक़्त खुशी का एहसास है,
उससे बात करके 
                              ना सुबह का पता है ना शाम है,
प्यार की राह थोड़ी मुश्किल है
                                  इतनी नहीं आसान है,
लेकिन जिसको मिल जाए
                      वह दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान है,
प्यार के तो दर्द में भी मिठास है
                       इसकी चुभन में एक अनकहा एहसास है,
नाराज होकर भी लगता है कोई
                             जैसे हर वक्त हमारे आसपास है,
हर पल हर वक्त बस
                            उसके मनाने का इंतजार है,
उसके मनाने पर
                        मेरा मान जाना ही मेरा प्यार है,
प्यार हो तो लगता है जैसे
                         दुनिया की सारी खुशियां हमारे पास है ,
प्यार एक हसीन ख्वाब है
          जो रुह-ए-मोहब्बत बनकर हर वक्त हमारे साथ है।
        
                                                              --- साक्षी जैन

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#Bites #
"एक वक्त ऐसा भी.......part-1"
यह एक पूरी कविता है लेकिन 500 शब्द की लिमिट होने के कारण यह यहां पर पूरी नहीं आ पा रही है, इसीलिए इससे 2 पार्ट में डिवाइड कर दिया गया है कृपया दोनों पार्ट पढ़ें और पढ़ कर बताएं कि आपको यह कविता कैसी लगी है।

जिंदगी के सफर में
एक ऐसा वक्त भी आता है,
जब अपना ही अपनों के
काम नहीं आता है,

जिंदगी के मुकाम में
एक ऐसा दौर भी आता है,
जब भगवान भी हमारी
परीक्षाएं लिए चला जाता हैं,

जिंदगी के रास्तों में
एक मोड़ ऐसा भी आता है,
जिसको हम अपना मानते हैं
वही हमें छोड़ कर चला जाता है,

जिंदगी में कुछ दर्द
ऐसा हो जाता है,
जिसकी वजह से इंसान
घुटता चला जाता है,

जब वक्त अपना ना हो तो
बिना गलती के भी इंसान गलत हो जाता है
गलती ना होते हुए भी इंसान
सबकी नजरों में गलत हो जाता है,

गिरता है वह सबकी नजरों में
लेकिन चाह कर भी उठ नहीं पाता है,
अपने भी हो जाते हैं पराये
और परायो में अपनापन ढूंढा जाता है,

वह ढूंढता है हर जगह अपनापन
लेकिन हर जगह से चोट खाता है,
सोचते हैं हम क्या
और क्या का क्या हो जाता है,

बहुत विश्वास करते हैं हम जिन पर
वही हमारे विश्वास को चकनाचूर कर के चला जाता है, जिसे मानते थे हम अपना
वही हमें धोखा दे जाता है,

आंखों से झलकता है दर्द
और आंसू बनकर बह जाता है,
कितना मजबूर होता है वो इंसान
 जो‌ अपने आंसू ‌छुपा कर दुनिया के
 सामने हर पल मुस्कुराता है,

ऐसे वक्त में समाज भी अपनी
एक अहम भूमिका निभाता है,
सच- झूठ को जाने बिना ही
उसे कसूरवार ठहराता है,

ऐसे में रिश्तेदार कैसे पीछे रह जाता
वह भी अपना फर्ज बखूबी निभाता है,
इधर उधर की बातें सुनकर वो भी
जले पर खूब नमक-मिर्ची लगाता है,

दिल पर लगे जख्मों का दर्द
इतना गहरा हो जाता है,
कि वो बेचारा उस दर्द की
तन्हाइयों में डूबता चला जाता है,

तूफानों से लड़कर
पार लगाना चाहता है वह अपनी कश्ती,
लेकिन लहरों के भंवर में
फंस कर वही गोते खाता रह जाता है,

वह चीखता है चिल्लाता है
बार - बार समझाता है,
कोई ना उसकी सुनता है
ना कोई पास जाता है,

जिंदगी की कशमकश में
वह फिर अकेला रह जाता है।।3।।

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#Bites on#
"जिंदा थे जब तक..."

जिंदा थे तब तक कोई ना आया
इस दर्द में शामिल होने को
आज मर गए तो कहते हैं
कभी खोला तो होता हमारे साथ
दिल के किसी कोने को

जिंदा थे तब तक कोई ना समझ पाया
दिल के जज्बात को
आज मर गए तो कहते हैं कि
हम समझ रहे हैं तुम्हारे हालात को

जिंदा थे तब तक कोई ना आया
पूछने को मेरे हाल को
आज मर गए तो फिर
ट्विटर और इंस्टा पर करते मलाल हो

जिंदा थे तब तक तो खूब डराया इस बात से
यह मत कर वह मत कर
जमाना बुरा कहेगा हर बात पे
आज जब मर गए हैं अब तो चैन से सोने दो
अब मैं तो गया अब सोच कर रोते रहना
अच्छी बुरी बात को

जिंदा थे तब तक जिंदगी के इम्तिहान खत्म नहीं होते थे
फेल ना हो जाए हम हर रात इस डर में हम सोते थे
आज जब मर गए तो कहते हैं
पास फैल में क्या रखा छोड़ देते इन सब बातों को

जिंदा थे तब तक तो खूब ताने देते थे
गलती हो या ना हो हमेशा सुनाते रहते थे
आज मर गए तो कहते हो कि
तानों और लोगों का क्या डर है तो बस यूं ही कहते रहते हैं

जिंदा थे तब तक खूब प्यार के लिए जागे थे
प्यार मिले किसी का तो इसके लिए खूब इधर-उधर भागे थे आज मर गए हैं तो कहते हो कि
पागल हो तुम जो सिर्फ प्यार के लिए जान देते हो

जिंदा थे तब तक कोई नहीं समझना चाहते थे
आज मर गए हैं तो
हजारों RIP करके हमारा स्टेटस लगाते हैं

जिंदा थे तब तक कोई ना आया साथ होने को
आज मर गए तो कहते हैं कि समझते हैं मेरे रोने को
काश समझ जाते कभी जिंदा इंसान को
तो नहीं उठानी पड़ती है कभी ऐसी किसी लाश को।

-- साक्षी जैन

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"सजा मुझे मिली क्यों"
I dedicate this poem to all girls and specially rape victims and acid attack victims. These girls are the inspiration for us 😊🙏

जब गलती मेरी नहीं थी तो
                                   फिर मुझे सजा मिली क्यों?
जब गुनाह किसी और का था तो
                                    फिर सजा मुझे मिली क्यों?
यह समाज अगर सिर्फ लड़कों के लिए तो
                              फिर लड़कियों को पैदा करते ही क्यों?
इज्जत की बात सिर्फ एक लड़की के लिए ही हो तो
                               फिर ऐसे समाज की जरूरत ही क्यों?
जब नहीं दे सकते लड़के और लड़की को बराबरी तो
                                     फिर ये दिखावे की जरूरत क्यों?
हवस उठे अगर लड़कों के अंदर तो
                                       फिर नारी की इज्जत लुटे क्यों?
गलती की लड़के ने फिर
                                  सजा और बदनामी मिले मुझे क्यों?
लड़का हो तो सब गलती माफ और
                         लड़की हो तो बंदिशें ऐसा दोगलापन क्यों?
लड़का करें कई शादियां तो भी माफ और
             लड़की करे किसी से बात तो कुलक्षिणी ऐसा क्यों?
अगर नहीं है किसी से प्यार तो
                             उसे मना करने का हक मुझे नहीं क्यों?
अगर मैं उसे ना मिली तो मेरे चेहरे पर
            तेजाब डालकर उसे खराब करने का हक उसे क्यों?
उसने मुझे कहां कहां छुआ मेरे साथ कैसा सलूक किया
                              यह सब बताने का हक मुझे नहीं क्यों?
अगर मैंने आवाज उठा कर बताना चाहा तो
                        बंद करो यह बेशर्मी का प्रदर्शन,ऐसा क्यों?
उसने मेरी पूरी इज्जत का प्रदर्शन किया
                                             वो कुछ भी नहीं,ऐसा क्यों?
अगर मैंने किया मना तो
                               मुझे बदनाम करने का हक उसे क्यों?
ये धमकियां ये इज्जत ये बदनामी का
                                                  डर सिर्फ मुझे ही क्यों?
इतने सारे गुनाह करके भी
                                  बिना डर के घूमे वो आखिर क्यों?
और उसे देख कर
                                   मैं डर डर के सहम के चलूं क्यों?
गलती गुनाह किसी और का तो
                                             फिर यह ताने मुझे क्यों?
गिर के भी कई बार की उठने की कोशिश
                                     लेकिन फिर से मुझे गिराया क्यों?
टूट के भी कई बार की जुड़ने की कोशिश लेकिन
                                           वापस से मुझे ही तोड़ा क्यों?
धोखा खाकर भी किसी पर विश्वास करने की
            कोशिश की लेकिन फिर से मुझे ही दगा मिली क्यों?
विश्वास करके सब कुछ सच बताया
                                     फिर भी मुझे ही शक मिला क्यों?
खूब रोयी खूब तड़पी लेकिन
          ना मेरे आंसू ना मेरा सच किसी को नजर आया क्यों?
जब धोखा किसी और का गलती किसी और की
                                     तो फिर बदनामी मुझे मिली क्यों?
डर लगता है अब तो किसी पर विश्वास करने से
                  इस डर के साथ ही मैं कब तक जियू और क्यों?
अगर मेरी शादी करके मेरा घर बसाने का सोचा जाए
                       तो उसमें भी मेरे अतीत की परछाइयां क्यों?
अगर गुनाह है लड़की होना तो
                                       भगवान ने मुझे बनाया ही क्यों?
क्या है दुनिया में कोई ऐसा जो दे सके इन सवालों के
                         जवाब  कि आखिर यह सब हुआ ही क्यों?
दुनिया में कोई तो हो जो मुझे बताएं की
       ऐसा क्या गुनाह था मेरा जिसकी सजा मुझे मिली क्यों?
जब गलती मेरी नहीं थी तो
                                    फिर मुझे सजा मिली क्यों?

Written by- Sakshi jain

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"वो बचपन"

यादों की किस्से खोलू तो,
                                  कुछ किस्से बहुत याद आते हैं,
वो मुझे वापस मेरे बचपन में ले आते हैं,
                                   वो भोला सा मासूम सा बचपन,
वो प्यारी सी मासूम अदाएं,
                           वो मम्मी पापा के प्यार के लिए लड़ना,
वो हर बात में मस्ती करना,
                                    वो राजा रानी के किस्से,
वो परियों की कहानी,
                             वो दादी नानी की जुबानी,
वो सब का लाड़-दुलार,
                                 वो हर बात में प्यार,
वो गलती करने पर डरना,
                      और गलती करके फिर इधर-उधर छुपना,
वो डांट पड़ने पर सड़ा-सड़ा मुंह करना,
                                   और पीछे से जोर जोर से हंसना,
वो भाई बहन का हर बात पर लड़ना,
                                वो हर बात पर छीना-छपटी करना,
वो एक दूसरे की चुगली करना,
                                  वो एक दूसरे की मार पड़वाना,
उसे मार पड़वा कर फिर खुद चुप कराना,
                                           वो गुड्डे गुड़ियों के खिलौने,
वो घर-घर खेलना,
                         वो मिट्टी के बर्तन,
क्या मासूम था वो बचपन,
                                    वो गली नुक्कड़ की मस्ती,
वो मस्ती भरा सैर सपाटा,
                                   वो पकड़म बाटी,
वो आंख मिचोनी,
                             वो छुपन छुपाई,
वो घोड़ा बदाम छाई,
                             वो टीपी टीपी टॉप टॉप,
वो बर्फ पानी,
             बड़ी मस्त थी अपने बचपन के खेलो की कहानी,
वो पहली बार स्कूल जाने पर रोना,
                            स्कूल ना जाने के लिए देर तक सोना,
वो हर वक्त बहाने बनाना,
                              वो घर में कहीं जाकर छुप जाना,
वो स्कूल का होमवर्क,
                            वो क्लास वर्क की टेंशन,
वो टीचर की डांट,
                       वो अच्छे नंबर मिलने पर लाड़,
वो एक दूसरे की शिकायत करना,
                                    वो टिफिन खाने के लिए लड़ना,
वो क्लास रूम की मस्ती,
                                   वो दोस्तों का प्यार,
बहुत याद आता है मुझे,
                                 मेरा बचपन और मेरे यार
वो बात-बात पर जिद करना,
                     जिद पूरी ना होने पर रोने का नाटक करना,
वो जिद पूरी होने पर खिलखिलाना,
                          जैसे दुनिया की सारी खुशी मिल जाना,
वो दादा-नाना के साथ घूमने जाना,
                                        खूब मौज मस्ती करके आना,
वो चुपचाप आइसक्रीम खाना,
                             और फिर मुंह पौछ कर घर पर आना,
सबसे छुप-छुप कर चॉकलेट खाना,
                                   कोई पूछे तो फिर बहाना बनाना,
आ करके दिखाओ बोलने पर,
                                  मुंह बंद करके वहां से भाग जाना,
वो टेंशन फ्री रहना,
                            वो दूसरों को टेंशन देना,
ना किसी से कोई परेशानी,
                                    ना किसी से कुछ लेना देना,
वो प्यारी सी अदाएं,
                             वो नटखट जी शरारत,
वो मासूम सी हरकत,
                             वो प्यारी सी मुस्कुराहट,
वो प्यारी सी नादानी,
                             वो अनगिनत शैतानी,
बहुत याद आती है मुझे,
                               मेरे बचपन की वो कहानी।

Written by- Sakshi Jain
               
                    

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