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आशाओं से आच्छादित जीवन
मृत्यु शैया पर भी
आशाओं से विरत न हो सका
प्रभु की भक्ति में
मन रम ना सका।
अपनी व्यथा की कथा
सुनाने में ही वक्त बीत गया
मृत्यु का क्षण आ गया
शरीर से आत्मा मुक्त हुई
उसकी सकारात्मकता
सृजन के रूप मंे
स्मृति में अमर हो गई
नकारात्मकता देह के साथ
अग्नि में भस्म हो गई।
उसकी स्मृति में
सबकी आंखों से
गंगा की पवित्रता के समान
दो आंसू बह निकले
जो करूण रूदन में कही खो गए
जीवन का प्रारंभ से अंत है
या अंत से प्रारंभ
हम इसे समझने में ही
अपने आप में खो गए।

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संत जी

नर्मदा नदी के तट पर एक संत अपने आश्रम में रहते थे। उन्होंने अपने आश्रम को नया स्वरूप एवं विस्तार करने की इच्छा अपने एक व्यापारी शिष्य को बताई उस शिष्य ने अपनी सहमति देते हुए उन्हें इस कार्य को संपन्न कराने हेतु अनुदान के रूप में अपनी दो हीरे की अंगूठीयाँ भेंट कर दी। यह देखकर संत जी प्रसन्न हो गये और उन्होंने दोनों अंगूठियों की सुंदरता को देखते हुए उन्हें संभालकर अलमारी में रख दी।
एक दिन एक भिखारी जो कि अत्यंत भूखा एवं प्यासा था उनके पास भोजन की इच्छा से आया। संत जी ने उसे भोजन के साथ साथ मिठाई देने हेतु अलमारी खोली और उसमें से एक डिब्बा निकालकर उसे दे दिया। उस भिखारी ने घर आने पर डिब्बा खोलकर देखा तो उसके एक कोने में हीरे की अंगूठी चिपकी हुई थी। यह देखकर वह चौक गया और तुरंत संत जी के पास आकर उन्हें इसकी जानकारी देते हुए उनके चरणों के पास अंगूठी रख दी और बोला कि यह आपकी वस्तु है जो कि धोखे से मेरे पास आ गई थी।
यह सुनकर संत जी कुछ क्षण के लिए मौन हो गये और चिंतन करने लगे कि यह भिखारी कितना गरीब है परंतु इसका मन कितना उज्जवल एवं विशाल है। यह ईमानदारी और नैतिकता का साक्षात उदाहरण है। मैं अपने आप को संत मानता हुआ भी इस अंगूठी की सुंदरता में उलझ गया और इसी कारण मैंने उस अंगूठी को बेचा नही। मुझे अभी अपने आप को और अधिक निर्मल करने की आवश्यकता है।

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गुरूदक्षिणा

आचार्य रामदेव के सान्निध्य में अनेक छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे, उनमें से एक केशव अपनी शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत गुरूजी के पास जाकर उन्हें गुरूदक्षिणा हेतु निवेदन करता है। गुरूजी उसकी वाणी से समझ जाते हैं कि इसे मन में अहंकार की अनूभूति हो रही है। वे गुरूदक्षिणा के लिये उसे कहते है कि तुम कोई ऐसी चीज मुझे भेंट कर दो जिसका कोई मूल्य ना हो और जिसकी कोई उपयोगिता ना हो।
केशव यह सुनकर मन ही मन प्रसन्न होता है कि गुरूजी तो बहुत ही साधारण सी भेंट मांगकर संतुष्ट हो जाऐंगे। वह जमीन से मिट्टी उठाकर सोचता है कि इसका क्या मूल्य है तभी उसे महसूस होता है कि जैसे मिट्टी कह रही है कि वह तो अमूल्य है वह अनाज की पैदावार करके भूख से संतुष्टि देती है उसके गर्भ में अनेक प्रकार के खनिज एवं अमूल्य धातुऐं छिपी है इनका दोहन करके मानव धन संपदा पाता है। ऐसा भाव आते ही केशव मिट्टी को छोड़ देता है और पास में पडें हुऐ कचरे के ढेर में से कुछ कचरा यह सोचकर उठाता है कि यह तो बेकार है इसका क्या मूल्य हो सकता है वह कचरा मानो उससे कहता है कि मुझसे ही तो खाद बनती है जो कि खेतों में पैदावार को बढाने में उपयोगी होती है।
केशव उसे भी वापिस फेंक देता है और मन ही मन सोचता है कि ऐसी कौन सी वस्तु हो सकती है जिसकी कोई उपयोगिता एवं मूल्य ना हो ? उसको कुछ भी समझ में ना आने पर वह वापिस गुरूजी के पास जाता है और कहता है कि इस सृष्टि में बेकार कुछ भी नही है जब मिट्टी और कचरा भी काम आ जाते हैं तब बेकार की चीज़ क्या हो सकती है ?
गुरूजी ने उसे अपने पास स्नेहपूर्वक बैठाकर बताया कि अहंकार ही एक ऐसी चीज है जो व्यर्थ है और यदि इसे अपने मन से हटा दो सफलता के पथ पर स्वयं आगे बढते जाओगे। केशव स्वामी जी का भाव समझ गया और उसने मन में प्रण कर लिया कि अब वह अहंकार को त्याग कर गुरूजी के बताए मार्ग पर ही चलेगा।

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कर्मफल

जबलपुर शहर से लगी हुई पहाडियों पर एक पुजारी जी रहते थे। एक दिन उन्हें विचार आया कि पहाडी से गिरे हुये पत्थरों को धार्मिक स्थल का रूप दे दिया जाए। इसे कार्यरूप में परिणित करने के लिये उन्होने एक पत्थर को तराश कर मूर्ति का रूप दे दिया और आसपास के गांवों में मूर्ति के स्वयं प्रकट होने का प्रचार प्रसार करवा दिया।
इससे ग्रामीण श्रद्धालुजन वहाँ पर दर्शन करने आने लगे। इस प्रकार बातों बातों में ही इसकी चर्चा शहर भर में होने लगी कि एक धार्मिक स्थान का उद्गम हुआ हैं। इस प्रकार मंदिर में दर्षन के लिये लोगों की भारी भीड़ आने लगी। वे वहाँ पर मन्नतें माँगने लगे। अब श्रद्धालुजनो द्वारा चढ़ाई गई धनराशि से पुजारी जी की तिजोरी भरने लगी और उनके कठिनाईयों के दिन समाप्त हो गये। मंदिर में लगने वाली भीड़ से आकर्षित होकर नेतागण भी वहाँ पहुँचने लगे और क्षेत्र के विकास का सपना दिखाकर अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का प्रयास करने लगे।
कुछ वर्षों बाद पुजारी जी अचानक बीमार पड़ गये। जाँच के उपरांत पता चला कि वे कैंसर जैसे घातक रोग की अंतिम अवस्था में है यह जानकर वे फूट फूट कर रोने और भगवान को उलाहना देने लगे कि हे प्रभु मुझे इतना कठोर दंड क्यों दिया जा रहा है ? मैंने तो जीवनभर आपकी सेवा की है।
उनका जीवन बड़ी पीड़ादायक स्थिति में बीत रहा था। एक रात अचानक ही उन्होनें स्वप्न में देखा की प्रभु उनसे कह रहे हैं कि तुम मुझे किस बात की उलाहना दे रहे हो ? याद करो एक बालक भूखा प्यासा मंदिर की शरण में आया था अपने उदरपूर्ति के लिये विनम्रतापूर्वक दो रोटी माँग रहा था परंतु तुमने उसकी एक ना सुनी और उसे दुत्कार कर भगा दिया। एक दिन एक वृद्ध बरसते हुये पानी में मंदिर में आश्रय पाने के लिये आया था। उसे मंदिर बंद होने का कारण बताते हुये तुमने बाहर कर दिया था। गांव के कुछ विद्यार्थीगण अपनी शाला के निर्माण के लिये दान हेतु निवेदन करने आये थे। उन्हें शासकीय योजनाओं का लाभ लेने का सुझाव देकर तुमने विदा कर दिया था। मंदिर में प्रतिदिन जो दान आता है उसे जनहित में खर्च ना करके, यह जानते हुये भी कि यह जनता का धन है तुम अपनी तिजोरी में रख लेते हो। तुमने एक विधवा महिला के अकेलेपन का फायदा उठाकर उसे अपनी इच्छापूर्ति का साधन बनाकर उसका शोषण किया और बदनामी का भय दिखाकर उसे चुप रहने पर मजबूर किया।
तुम्हारे इतने दुष्कर्मों के बाद तुम्हें मुझे उलाहना देने का क्या अधिकार है। तुम्हारे कर्म कभी धर्म प्रधान नही रहे। जीवन में हर व्यक्ति का उसका कर्मफल भोगना ही पड़ता है। इन्ही गलतियों के कारण तुम्हें इसका दंड भोगना ही पडे़गा। पुजारी जी की आँखें अचानक ही खुल गई और स्वप्न में देखे गये दृष्य मानो यथार्थ में उनकी आँखों के सामने घूमने लगे और पश्चाताप के कारण उनके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी।

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सेवा


एक दिन विभिन्न रंगों के फूलों से लदी हुयी झाडी पर एक चिडिया आकर बैठी और फूलों से बोली तुम लोग कैसे मूर्ख हो कि अपना मकरंद भंवरों को खिला देते हो। वह अपना पेट भरके तुम्हें बिना कुछ दिये ही उड जाता है। फूलों ने मुस्कुराकर कहा कि कुछ देकर उसके बदले में कुछ लेना तो व्यापारियों का काम है। निस्वार्थ भाव से किया गया कार्य ही सच्ची सेवा एवं त्याग है। यही जीवन का उद्देश्य होना चाहिये कि दूसरों के लिये काम आने में ही जीवन की सार्थकता हैं।

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प्रायश्चित


एक कस्बे में एक गरीब महिला जिसे आँखो से कम दिखता था, भिक्षा माँगकर किसी तरह अपना जीवन यापन कर रही थी। एक दिन वह बीमार हो गई, किसी दयावान व्यक्ति ने उसे इलाज के लिये 500रू का नोट देकर कहा कि माई इससे दवा खरीद कर खा लेना। वह भी उसे आशीर्वाद देती हई अपने घर की ओर बढ़ गई। अंधेरा घिरने लगा था, रास्ते में एक सुनसान स्थान पर दो लड़के शराब पीकर ऊधम मचा रहे थे। वहाँ पहुँचने पर उन लड़को ने भिक्षापात्र में 500रू का नोट देखकर शरारतवश वह पैसा अपने जेब में डाल लिया, महिला को आभास तो हो गया था पर वह कुछ बोली नही और चुपचाप अपने घर की ओर चली गई।
सुबह दोनो शरारती लड़को का नशा उतर जाने पर वे अपनी इस हरकत के लिये शर्मिंदा महसूस कर रहे थे। वे शाम को उस भिखारिन को रूपये वापस करने के लिये इंतजार कर रहे थे। जब वह नियत समय पर नही आयी तो वे पता पूछकर उसके घर पहुँचे जहाँ उन्हें पता चला कि रात्रि में उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गयी और दवा न खरीद पाने के कारण वृद्धा की मृत्यु हो गई थी। यह सुनकर वे स्तब्ध रह गये कि उनकी एक शरारत ने किसी की जान ले ली थी। इससे उनके मन में स्वयं के प्रति घृणा और अपराधबोध का आभास होने लगा।
उन्होने अब कभी भी शराब न पीने की कसम खाई और शरारतपूर्ण गतिविधियों को भी बंद कर दिया। उन लडकों में आये इस अकस्मात और आश्चर्यजनक परिवर्तन से उनके माता पिता भी आश्चर्यचकित थे। जब उन्हें वास्तविकता का पता हुआ तो उन्होने हृदय से मृतात्मा के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुये अपने बच्चों को कहा कि तुम जीवन में अच्छे पथ पर चलो और वक्त आने पर दीन दुखियों की सेवा करने से कभी विमुख न होओ, यहीं तुम्हारे लिये सच्चा प्रायश्चित होगा।

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आदमी और संत


नर्मदा नदी के तट पर एक महात्मा जी रहते थे। उनके एक शिष्य ने उनसे निवेदन किया कि मुझे आपकी सेवा करते हुये दस वर्षों से भी अधिक समय हो गया है और आपके द्वारा दी हुई शिक्षा भी अब पूर्णता की ओर है। मैं भी अब संत होना चाहता हूँ और आपके आशीर्वाद की अपेक्षा रखता हूँ।
महात्मा जी ने मुस्कुराकर कहा - पहले इंसान बनने का गुण समझो फिर संत बनने की अपेक्षा करना।
इंसान का गुण है कि धर्म, कर्म, दान के प्रति मन में श्रद्धा का भाव रखे। उसके हृदय में परोपकार एवं सेवा के प्रति समर्पण रहे। ऐसे सद्पुरूष की वाणी मे मिठास एवं सत्य वचन के प्रति समर्पण हो। उसका चिंतन सकारात्मक एवं सदैव आशावादी रहे। वह जुआ, सट्टा व परस्त्रीगमन से सदैव दूर रहते हुये अपने पूज्यों के प्रति आदर का भाव रखता हो। ऐसा चरित्रवान व्यक्ति क्रोध, लोभ एवं पापकर्मों से दूर रहे। जीवन में विद्या ग्रहण एवं पुण्य लाभ की हृदय से अभिलाषा रखे एवं अपने गुणों पर कभी अभिमान न रखे। इन गुणों से मानव इंसान कहलाता है।
संत बनने के लिये पुण्य की भावना, पतित-पावन की सेवा, उनकी मुक्ति की कामना जीवन का आधार रहे। मन में सद्विचार पर्वत के समान ऊँचे एवं सागर की गहराई के समान गंभीर हों। वह अपने भाग्य का स्वयं निर्माता बनने की क्षमता रखे तथा आत्मा को ही अपना सर्वोत्तम साथी रखे। उसके कर्मों का फल उसकी आत्मा को पाप और पुण्य का अहसास कराने की शक्ति उत्पन्न कर दे। सत्य से बड़ा धर्म नही, झूठ से बड़ा पाप नहीं, इसको वह जीवन का सूत्र बना ले। आत्म बोध सदा उपकारी मित्र होता है, इसे अंतर आत्मा में आत्मसात् करे। वह कामना ही मन में संकल्प को जन्म देती है और लोकसेवा से ही जीवन सार्थक होता है, इसे वास्तविक अर्थों में अपने जीवन में अंगीकार करें। इतने गुणों से प्राप्त सुकीर्ति संत की पदवी देती है।
मैंने तुम्हें इंसान और संत बनने की बातें बता दी हैं। अब तुम अपनी राह अपने मनन और चिंतन से स्वयं चुनो। यह कहकर महात्मा जी नर्मदा में स्नान करने हेतु चले गये। इतना सुनने के बाद वह शिष्य पुनः महात्मा जी की सेवा में लग गया।

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संघर्ष

श्री देवेन्द्र सिंह मैनी 84 वर्ष के हो चुकें है। उनका जन्म वर्तमान पाकिस्तान के पुंछ क्षेत्र में हुआ था।
उनका कथन है कि वे अपने आप को बहुत भाग्यशाली मानते है कि उन्हे इतनी लंबी आयु ईश्वर ने दी है। वे अपने जीवन से बहुत संतुष्ट एवं प्रसन्न हैं। वे इसके लिए वाहे गुरू को धन्यवाद करते है।
उन्हें कैंसर हो गया था जो कि थर्ड स्टेज पर पहुँच चुका था किंतु उन्होंने समाज सेवा के कार्य पूर्ण लगन एवं समर्पण के साथ करना नही छोडा था। वे अपनी बीमारी से संघर्ष करके सफल होकर आज पूर्णतया स्वस्थ्य है।
जीवन और मृत्यु एक चक्र है। एक व्यक्ति जीवन को सफल और सार्थक कर सकता है यदि वह दूसरों के लिए जनहित के कार्य करता रहे, प्रसन्न रहे, कठिन परिश्रम करे और समाज की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहे।
वे पुनर्जन्म पर विश्वास नही करते है। उनका कहना है कि लोगों का भला करो परंतु उनसे कोई अपेक्षा मत रखो। नौजवानों को यही सलाह है कि वे गंभीरतापूर्वक अध्ययन करे और जीवन का भरपूर आनंद ले। वे एक घटना के संबंध में बताते है कि जब वे 13 वर्ष के थे तभी उन्होने भारत पाकिस्तान के विभाजन की विभीषिका को देखा है। आजादी के पहले झेलम में उनका बहुत बडा लकडी का व्यवसाय था। सन् 1947 में उन्हें वह सब छोडकर बडी मुश्किल से दिल्ली होते हुए जबलपुर आना पडा। यहाँ आकर उन्होंने अपना व्यवसाय प्रारंभ किया। कठोर परिश्रम, ईमानदारी के साथ परिस्थितियों पर विजय प्राप्त की। उनके पाकिस्तान से भारत आने के बीच जो अमानवीयता, अनैतिकता, खूनखराबे का दृश्य दिखा वह आज भी उनके मानस पटल पर दस्तक देता है।

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प्रभु दर्शन

डा. राजकुमार तिवारी ’सुमित्र’ (81 वर्ष) साहित्यिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में प्राण-पण से सक्रिय व समर्पित रहते है। वे दैनिक नवीन दुनिया के पूर्व संपादक, दैनिक जयलोक के सलाहकार संपादक, महाकौशल हिंदी साहित्य सम्मेलन के कार्यकारी अध्यक्ष एवं कई संस्थाओं से जुडे हुये है। उनका मानना है कि मृत्यु अटल सत्य है किंतु अब जीवन सीमित है यह सोच, समय के पहले ही मृत्यु का आभास कराने लगती है और हम सकारात्मकता छोड़कर नकारात्मकता की ओर अनजाने में ही बढ़ जाते है। मेरे अनुसार हमारी दृष्टि सकारात्मक होना चाहिए और जीवन के प्रत्येक क्षण को महत्वपूर्ण मानते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण से जीना चाहिए। इससे हमारे मन में ज्ञान की जिज्ञासा बढे़गी और हमें पढ़ने लिखने की ओर प्रेरित करेगी।
कुछ वर्ष पूर्व मैं अपनी बुआ एवं अन्य परिजनों के साथ चित्रकूट गया था। सायं हम लोग तैयार होकर होटल से बाहर निकले। अंधेरा उतर आया था। हम लोग सडक पर आकर आगे बढ़े कि बुआ ने आवाज दी- कहा देखो सड़क के उस पार झाँकी सजी है, चलो दर्शन कर लें। हम सब ने बालरूप राम, लक्ष्मण, जानकी के दर्शन किये, आरती की। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरा। वहाँ पीतवस्त्रधारी एक वृद्ध भी बैठे थे। दर्शन कर हम मुश्किल से पचास कदम आगे बढे होंगे तभी बुआ ने आवाज दी और कहा कि भैया झाँकी ? हम लोगों ने देखा- वहाँ कुछ नही था। प्रश्नाकुल मन लिये हम लोग प्रमोद वन के कार्यक्रम में गये। वहाँ से लौटकर फिर देखा, झाँकी की जगह कुछ नही था। सुबह जल्दी उठकर फिर देखा, एक दीवार थी, झोपडी या झाँकी का कोई निशान नही था। सोचा कि मंडली वाले होंगे। शाम तक पता चला कि उस वर्ष वहाँ एक भी मंडली नही आई थी। फिर झाँकी ? रात को चर्चा करते करते हम सब की आँखों से अश्रुपात हो रहा था। क्या प्रभु ने दर्शन दिये थे ? क्या झाँकी एक भ्रम थी ? क्या एक साथ पाँच व्यक्ति भ्रमित हो सकते है ? यह घटना अविश्वसनीय परंतु सत्य है।
जीवन में अपेक्षाओं का अंत नही है परंतु जो कुछ भी हमें प्रभु कृपा से प्राप्त हुआ हो उसी में संतुष्ट रहना चाहिए और मन में यह भाव रखना चाहिए कि ईश्वर ने हमें हमारी आवश्यकताओं से अधिक ही प्रदान किया है। इससे हमें हमेशा संतुष्टि, सुख एवं तृप्ति का अनुभव होगा।

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श्रममेव जयते


मुंबई महानगर की एक चाल में रमेश एवं महेश नाम के दो भाई अपनी माँ के साथ रहते थे। रमेश अपनी पढ़ाई पूरी करके षासकीय सेवा में शिक्षक के पद पर चयन का इंतजार कर रहा था। वह बचपन से ही पढ़ाई में काफी होशियार था और शिक्षक बनना चाहता था। महेश का बचपन से ही शिक्षा के प्रति कोई रूझान नही था वह बमुश्किल ही कक्षा दसवीं तक पढ़ पाया था। वह क्या काम करता था इसकी जानकारी उसके घरवालों को भी नही थी परंतु उसे रूपये की तंगी कभी नही रहती थी।
एक दिन अचानक पुलिस उसे पकड़ कर ले गई। रमेश और उसकी माँ को थाने में पहुँचने पर पता चला कि वह एक पेशेवर जेबकतरा है। यह सुनकर उनके पाँव तले जमीन खिसक गई। वे महेश की जमानत कराकर वापस घर लौट आये। माँ ने उससे इतना ही कहा कि यदि तुम यहाँ रहना चाहते हो तो यह घृणित कार्य छोड़ दो। बेटा क्या कभी तुमने सोचा कि जिसक जेब काटी उसके वह रूपये किस काम के लिये थे, हो सकता है कि वह रूपये उसकी माँ के इलाज के लिये हों, उसकी महीने भर की कमाई हो या फिर उसकी त्वरित आवश्यकता के लिये हों। उन्होने नाराजगी व्यक्त करते हुये उससे बात करना भी बंद कर दिया।
महेश अपनी माँ और भाई से बहुत प्यार करता था। उनके इस बर्ताव से उसे अत्याधिक मानसिक वेदना हो रही थी। वह आत्मचिंतन हेतु मजबूर हो गया और इस नतीजे पर पहुँचा कि बिना मेहनत के आसानी से पैसा कमाने का यह तरीका अनुचित एवं निंदनीय है। उसने मन में दृढ़ संकल्प लिया कि अब वह यह काम नही करेगा बल्कि मेहनत से पैसा कमाकर सम्मानजनक जीवन जियेगा चाहे इसके लिये उसे छोटे से छोटा काम भी क्यों ना करना पड़े तो वह भी करेगा।
दूसरे दिन से उसकी दिनचर्या बदल गयी थी, उसने एक चैराहे पर बूट पालिश का काम शुरू कर दिया था। यह जानकर उसकी माँ अत्यंत प्रसन्न हुयी और बोली कि कोई भी काम छोटा नही होता है। अपनी मेहनत एवं सम्मानजनक तरीके से कमाये हुये एक रूपये का मूल्य मुफ्त में प्राप्त सौ रूपये से भी अधिक रहता है।

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