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संगति का प्रभाव

महेश एक कर्तव्यनिष्ठ व मेहनती व्यक्ति था जो कि एक कारखाने में लिपिक के पद पर कार्यरत था। वह अपनी पत्नी और एक बच्ची के साथ सुखमय जीवन जी रहा था। उसके विभाग में रमेश नामक एक दूसरे लिपिक से उसकी घनिष्ठ मित्रता हो गयी। वह एक बिगडा हुआ, शराब का आदी व्यक्ति था। उसकी इस बुरी आदत ने धीरे धीरे महेश को भी जकड लिया और वह भी शराब का आदी हो गया था। वह अपनी मेहनत की कमाई के रूपये शराब में उडा देता था जिससे उसके घर में आर्थिक तंगी के कारण झगडे होने लगे। वह अपनी बेटी पिंकू को बहुत प्यार करता था।
एक दिन जब वह मदिरालय में शराब पी रहा था तभी उसके पास खबर आई की उसकी बेटी अचानक छत से गिर गई है और उसे गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती किया गया है। महेश शराब के नशे में इतना डूबा हुआ था कि उसने इसे अनसुना कर दिया और शराब पीने में ही अपना समय गंवाता रहा। जब वह देर रात्रि घर पहुँचा तो उसे पिंकू के निधन का पता हुआ। यह जानकर वह स्तब्ध रह गया कि उसकी प्यारी बच्ची अंतिम समय तक अपने पापा की याद करते हुए मृत्यु को प्राप्त हो गई।
महेश का नशा उतर चुका था और उसका हृदय व्यथित होकर उसे बार-बार धिक्कार रहा था। उसकी आँखों से अश्रुधारा लगातार बह रही थी और वह आत्मग्लानि में आत्महत्या करने के लिए संकल्प कर चुका था। यह जानकर उसकी पत्नी ने उसे रूंधे गले से समझाया कि आत्महत्या करना कायरता की निशानी है अगर आपको कुछ करना ही है तो शराब पीने की आदत को खत्म कीजिए। आपकी इस आदत ने ही हमारे परिवार के बर्बाद कर दिया और हमारी बच्ची की जान ले ली।
महेश को यह बात समझ आ गयी थी और उसने शराब छोडने का दृढ संकल्प कर लिया था। उस दिन के बाद से उसने शराब को हाथ भी नही लगाया। कुछ वर्षों पश्चात उसने अपनी बेटी की स्मृति में एक नशा मुक्ति केंद्र की स्थापना की।

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सृजन

प्रसिद्ध कवि रामसजीवन सिंह कवि सम्मेलन में अपना काव्यपाठ प्रस्तुत करने के उपरांत अपने गृहनगर वापिस जा रहे थे। उनके साथ उनके द्वारा लिखी गई नवीन रचनाओं का पूरा संग्रह भी साथ में था। कवि सम्मेलन से लौटते वक्त वे काफी थक गये थे और ट्रेन में गहरी निद्रा में सो रहे थे।
जब उनकी नींद खुली तो उन्होंने देखा कि सामने की सीट के नीचे रखा हुआ उनका संदूक नदारद था। यह देखकर उनके होश उड गये क्योंकि उसमें उनकी नवीन रचनाओं का पूरा संग्रह रखा हुआ था, जो कि उसी सप्ताह प्रकाशन हेतु जाना था। उन्होंने काफी खोजबीन की परंतु उन्हें निराशा ही हाथ लगी। उन्होने इसकी रिपोर्ट रेल पुलिस मे दर्ज करायी। इसके लगभग एक सप्ताह बाद उन्हें पुलिस द्वारा जानकारी मिली कि उनका संदूक रेल्वे ट्रेक के पास अस्तव्यस्त हालत में प्राप्त हुआ है एवं उन्हें जाँच हेतु पुलिस स्टेशन बुलाया गया है।
वहाँ पहुँचने पर उन्होने देखा कि उनकी सभी रचनाएँ संदूक में फटी हुई हालत में पडी हुई थी। यह देखकर वे बहुत द्रवित हो गये। उनको देखकर वहाँ के इंस्पेक्टर ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि महोदय आपका इतना परिश्रम एवं समय व्यर्थ नष्ट हो गया। जिस चोर ने यह सामान चुराया था उसे इसकी कीमत का अनुमान नही होगा परंतु मैं स्वयं एक काव्यप्रेमी हूँ। मैं किसी साहित्यकार की इस वेदना को महसूस कर सकता हूँ। अब आपको इसके सृजन में बहुत परिश्रम लगेगा।
वे कवि महोदय उनकी बात सुनकर बोले की जीवन में व्यक्ति को परिश्रम करने से कभी भी हतोत्साहित नही होना चाहिए और सृजन के प्रति सदैव समर्पित रहना चाहिए। मै तो यह मानता हूँ कि ईश्वर जो भी करता है, उसमें कोई ना कोई भलाई छुपी होती है। मैं जब पुनः इन काव्य रचनाओं का लेखन करूँगा तो विचारों में और भी अधिक परिपक्वता लाकर पहले से भी अच्छे साहित्य का सृजन कर पाऊँगा। हमें समय और परिस्थितियों के अनुसार समझौता करना चाहिए और अपने कर्म के प्रति समर्पित रहना चाहिए।

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एक नई परिकल्पना

यह बात उन दिनों की है जब स्वर्गीय राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री पद पर थे एवं स्वर्गीय अजय नारायण मुशरान जबलपुर से लोकसभा के सांसद थे। उनके नेतृत्व में शहर से युवा कांग्रेस का एक प्रतिनिधि मंडल, राजीव जी से भेंट करने हेतु दिल्ली गया था। उनसे भेंट के दौरान राजीव जी ने अचानक ही एक प्रश्न हम लोगों के सामने रखा कि हम केंद्र से गरीबों के हितार्थ समुचित राशि प्रेषित करते है परंतु उसका अपेक्षित परिणाम नही प्राप्त हो पाता है, इसका क्या कारण है ? हमारे प्रतिनिधि मंडल के एक सदस्य ने उनसे निवेदन किया कि ऐसा क्यों होता है इसे मैं आपकों एक छोटे से उदाहरण के माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ।
उसने एक बर्फ का टुकडा बुलवाया और राजीव जी के हाथ में देकर कहा कि इसे आप क्रमश एक दूसरे के हाथों में देने का निर्देश दे। यह सुनकर राजीव जी ने अचरज के साथ कहा कि जैसा यह कह रहे है ऐसा करिए। ऐसा कहते हुए उन्होंने अपने हाथ में रखा हुआ बर्फ का टुकडा दूसरे सदस्य के हाथों में दे दिया और उस सदस्य ने किसी दूसरे सदस्य को दे दिया। इस प्रकार क्रमश 50 सदस्यों के हाथों से गुजरने के बाद जब बर्फ का टुकडा अंतिम सदस्य के पास पहुँचा तो वह टुकडा अत्यंत छोटा हो चुका था।
राजीव जी ने जब यह देखा तो वह गंभीर होकर बोले कि मैं समझ गया कि आप क्या कहना चाहते है। जब केंद्र से धन भेजा जाता है तो वह अनेक माध्यमों से होता हुआ जनता के पास पहुँचता है और इसी कारण जितना धन भेजा जाता है तो उसका आधा भी भ्रष्टाचार के कारण जनता तक नही पहुँच पाता है ? इसके बाद राजीव जी ने कहा कि आप लोग ही इसका समाधान भी बताइये।
हमारे सदस्यों ने कहा कि कुछ ऐसा प्रबंधन किया जाए जिससे केंद्र एवं जनता के बीच के माध्यमों की संख्या सीमित हो एवं केंद्र का जनता के साथ सीधा संवाद हो सके। ऐसी प्रणाली यदि विकसित की जा सके तो भ्रष्टाचार में काफी हद कमी आ जायेगी और जनता इससे ज्यादा लाभान्वित होगी। उस समय तो यह बात सामान्य चर्चा बनकर समाप्त हो गई परंतु उस चर्चा की सार्थकता आज नजर आ रही है।

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आत्मसम्मान

” मैंने चोरी नही की है, मुझे आपकी चूड़ियों के विषय में कोई जानकारी नही है। मुझे पुलिस के हवाले मत कीजिए, वे लोग मुझे बहुत मारेंगे, मैं चोर नही हूँ, गरीबी की परिस्थितयों के कारण आप के यहाँ नौकरी कर रहा हूँ। ऐसा अन्याय, माँ जी मेरे साथ मत कीजिए। मेरे माता-पिता को पता होगा तो वे बहुत दुखी होंगे। “ मानिक नाम का पंद्रह वर्षीय बालक रो-रो कर, एक माँ जी को अपनी सफाई दे रहा था। वह घर का सबसे वफादार एवं विश्वसनीय नौकर था।
माँ जी की सोने की चूड़ियाँ नही मिल रही थी। घर के नौकरों से पूछताछ के बाद भी जब कोई समाधान नही निकला तो पुलिस को सूचना देकर बुलाया गया। पुलिस सभी नौकरो को पूछताछ के लिए थाने ले गई। उन्हे सबसे ज्यादा शक मानिक पर ही था क्योंकि वही सारे घर में बेरोकटोक आ जा सकता था। पुलिस ने बगैर पूछताछ के अपने अंदाज मे उसकी पिटाई चालू कर दी। वह पीड़ा से चीखता चिल्लाता रहा परंतु उसकी सुनने वाला कोई नही था। इसी दौरान अचानक ही बिस्तर के कोने में दबी हुई चूड़ियाँ दिख गई, उनके प्राप्त होते ही पुलिस को सूचना देकर सभी को वापिस घर बुला लिया गया।
मानिक मन में संताप लिये हुए, आँखों में आँसू, चेहरे पर मलिनता के साथ दुखी मन से घर पहुँचा और तुरंत ही अपना सामान लेकर नौकरी छोडने की इच्छा व्यक्त करते हुए सबकी ओर देखकर यह कहता हुआ कि उसके साथ आप लोगो ने अच्छा व्यवहार नही किया, उसके मान सम्मान को ठेस पहुँचाकर एक गरीब को बेवजह लज्जित किया है। मुझे लग रहा था कि मानिक की आँखें मुझसे पूछ रही हों कि क्या गरीब की इज्जत नही होती ? क्या उसे सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार नही है ? उसकी सच बातों को भी झूठा समझकर उसे क्यों अपमानित किया गया ? यह जानकर परिवार के सभी सदस्यों ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए उसे नौकरी नही छोडने का निवेदन किया। वह यह देखकर कि उसके मालिक के द्वारा स्वयं माफी माँगी जा रही है। वह हतप्रभ एवं द्रवित होकर नौकरी छोडने का विचार छोड देता है।

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सकारात्मक सोच

सेठ मनोहरलाल श्रीनगर के एक प्रसिद्ध व्यवसायी थे जिनका कालीन बनाने का बहुत बडा कारखाना था। उनका विदेषांे में भी निर्यात होता था। एक बार संयोग से उन्हें विदेष में कालीन निर्यात करने का बहुत बडा सौदा प्राप्त हुआ और वे इसी के निर्माण में व्यस्त थे।
एक दिन अचानक ही नदी में बाढ आ जाने के कारण पूरा श्रीनगर जलप्लावन से घिर गया। इस प्राकृतिक आपदा में सैकडो लोग मारे गए एवं बहुत आर्थिक क्षति हुयी। इस प्राकृतिक आपदा के कारण सेठ मनोहरलाल का कारखाना भी नष्ट हो गया एवं उसमें काम करने वाले कुषल कर्मचारी भी मारे गए। गोदामों में पानी भर जाने के कारण सेठ जी द्वारा बनाया गया सारा माल भी खराब हो चुका था। इस समय वे भयंकर आर्थिक तंगी में आ गये थे और इस आपदा में उनका घर भी गिरकर तहस नहस हो चुका था। ऐसी विकट परिस्थितयों में एक दिन राहत षिविर में जब सेठ मनोहरलाल भोजन कर रहे थे तो उनके एक परिचित व्यापारी मित्र ने पूछा कि भाई साहब ऐसी विकट परिस्थिति में जबकि आपका सबकुछ नष्ट हो चुका है परंतु आपके चेहरे पर चिंता एवं दुख की कोई लकीर भी नजर नही आ रही है। इसका क्या कारण है ?
सेठ जी ने जवाब दिया कि जो कुछ होता है सब प्रभु इच्छा से होता है और हमें उसे स्वीकार करना ही होता है। प्रभु की कृपा से ही मैंने धन कमाने की कला सीखी है। इस प्राकृतिक आपदा में भले ही मेरा अत्याधिक आर्थिक नुकसान हो गया है परंतु जिस कला से मैंने इतना धन कमाया था वह कला नष्ट नही हुई है और अभी भी मेरे दिल और दिमाग में बसी हुई है। मैं पुनः इसके माध्यम से अपने व्यवसाय को आरंभ करूँगा और एक दिन अपने को पुर्नस्थापित करके बता दूँगा। सेठ मनोहरलाल की यह बात सुनकर उनके मित्र को इस दुखद घडी में बहुत संात्वना मिली और ऐसी सकारात्मक सेाच से उसके मन में भी अपने व्यवसाय को पुनः स्थापित करने की हिम्मत पैदा हो गयी।

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सब दिन होत ना एक समाना

हरीषचंद नगर के एक सफल व्यवसायी माने जाते थे, जिनका व्यापार दिन दूनी रात चैगुनी प्रगति कर रहा था। उनकी धर्मपत्नी एक बहुत ही विदुषी एवं जागरूक महिला थी। वे अक्सर अपने पति को कहती थी कि ईष्वर कृपा से अभी अपना समय बहुत अच्छा चल रहा है तुम्हारी आमदनी को देखते हुए मैं तुम्हें सुझाव देना चाहती हूँ कि तुम अपनी आय का एक बडा हिस्सा सुरक्षित रखो। जीवन में वक्त हमेषा एक सा नही रहता और ना जाने कब व्यापार में उतार-चढ़ाव आ जाये तब वह संचित धन तुम्हारे बहुत काम आयेगा। हरीषचंद यह सुनकर हंसकर कह देता था कि अभी क्या जल्दी है। हम कुछ दिनों के बाद तुम्हारे सुझाव को मानकर रूपये इकट्ठा करना षुरू कर देंगें। तुम चिंता मत करो तुम तो अभी केवल खाओ, पियो और मौज करो। अपने आप को खुष रखो और मुझे भी षांति से रहने दो। इस तरह समय बीतता गया और हरीषचंद ने अपनी पत्नी की बातों को नजर अंदाज कर दिया।
कुछ वर्षों के बाद आर्थिक मंदी के कारण बाजार में व्यापार ठप्प पडने लगा। इसका असर हरीषचंद के व्यापार पर भी हुआ और उसकी बिक्री कम होने के साथ-साथ उसके द्वारा बाजार में अन्य व्यापारियों को दिया हुआ उधार भी समय पर वापिस ना आ पाया, उसके द्वारा अपने मित्रों को दिया गया धन भी उसके वापिस माँगने पर उसे नही मिला। इस प्रकार इन सब परिस्थितियों के कारण हरीषचंद को व्यापार में घाटा होने लगा क्योंकि वह अपने व्यापार में आवष्यक पूंजी का विनिवेष नही कर पा रहा था। वह बहुत चिंतित और परेषान था और उसे अब अपनी पत्नी के द्वारा दिये गये सुझाव को ना मानने के कारण पछतावा हो रहा था। इन्ही चिंताओं के कारण उसका स्वास्थ्य भी गिरता जा रहा था और एक दिन उसकी पत्नी के पूछने पर उसने अपनी व्यथा से उसे अवगत करा दिया। उसने बडे प्रेम से अपने पति से पूछा कि तुम्हें अपने व्यापार को संभालने एवं सुचारू रूप से चलाने के लिए कितने धन की आवष्यकता है। हरीषचंद मायूस होकर बोला कि मुझे 20 लाख रू की तुरंत आवष्यकता है। यदि कही से इसका इंतजाम हेा जाये तो मैं विपरीत परिस्थितियों में भी अपने व्यापार को घाटे से उबार लूँगा। उसकी पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा कि बस इतनी सी बात के लिए तुम इतने चिंतित हो मैंने तुम्हारे द्वारा दिये गये घरखर्च में से रकम बचाकर इकट्ठी की हुई हैै वह मैं तुम्हें दे रही हूँ। यह देखकर हरीषचंद को पुनः अपनी गलती का अहसास हुआ कि उसे सही समय पर धन संचित करके रखना चाहिए था आज उसकी पत्नी की बुद्धिमानी एवं दूरदर्षिता ने ना केवल उसकी साख बचा ली बल्कि उसके व्यापार को भी सहारा दे दिया।

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समानता का अधिकार

एक वृक्ष जो उम्रदराज हो चुका था और कभी भी जमीन पर धराशायी होने की स्थिति में था। वह अपनी जवानी के दिनो को याद कर रहा था जब उसकी चारों दिशाओं में फैली हुई शाखाओं के नीचे पथिक आराम करते थे और बच्चे फलों का आनंद लेते थे। एक वृद्ध व्यक्ति उसके तने का सहारा लेकर विश्राम करने लगा। वह मन ही मन सोच रहा था कि उसका एक पुत्र और पुत्री दो बच्चे है। उसने अपने पुत्र पर पुत्री की अपेक्षा अधिक ध्यान दिया, उसे उच्च शिक्षा दिलायी और एक कुलीन परिवार में विवाह भी कराया। उसे अपने पुत्र से काफी आशायें थी परंतु वह इतना निकम्मा और चालाक निकला कि पिता की सब संपत्ति हडप कर उन्हें ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया कि वे स्वयं घर छोडकर कही अन्यत्र अपना बसेरा की तलाश कर ले। ऐसे कठिन समय में उनकी बेटी व दामाद उन्हें सम्मानपूर्वक अपने घर ले आये और सेवा सुश्रुषा सब करते हुए उनसे पुराने बातों को भूल जाने का आग्रह करते थे। उन्हें जानकारी मिली की उनका बेटा व बहू नौकरी के सिलसिले में अमेरिका चले गये है। अब दिन ढलने का समय हो गया था और वह वृद्ध व्यक्ति वापिस अपनी बेटी के घर चला गया।
उस रात अचानक ही उसकी तबीयत खराब हुई और अथक प्रयासों के बाद भी उसकी प्राणरक्षा संभव नही हो सकी और रात में ही उसकी मृत्यु हो गई। उसके बेटे को इसकी सूचना दी गई तो उसने अपनी नौकरी से छुट्टी ना मिलने की बात कहकर वापिस आने से मना कर दिया। दूसरे दिन उसका अंतिम संस्कार एवं समस्त परंपरायें उसकी बेटी के द्वारा संपन्न की गई। श्म्शान घाट में अग्निदाह देने के उपरांत सभी लोग चले गये केवल उसकी लडकी दुखी मन से अपने पिता के साथ बिताये हुये दिनों की याद करते हुए उनकी जलती हुई चिता को एकटक देख रही थी। जब काफी समय व्यतीत हो गया तो उसका पति ने उसके कंधे पर हाथ रखकर धीरे से समझाते हुए कहा कि जो चला गया वह अब वापिस नही आयेगा, आओ अब हम वापिस चले। वह इतना कहकर उसे सांत्वना देते हुए अपने सीने से लगाकर उसकी अश्रुपूर्ण आंखो से आंसुओं को पोंछते हुए वे दोनो वापिस अपने घर की ओर चले जा रहे थे। इससे यह जनसंदेश मिलता है कि आज के वर्तमान युग में पुत्री किसी भी रूप में पुत्र से कम नही होती और दोनो में भेद करना समाप्त होना चाहिए।

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महानता

एक बार पश्चिम बंगाल के कई जिलों में वर्षा ना होने के कारण सूखा एवं अकाल पड गया था। एक समाजसेवी व्यक्ति गरीबों की मदद के लिए आगे आया और वह अपने स्वयं के धन से यथासंभव भूखे लोगो को भोजन कराता था। एक दिन इसी दौरान एक बालक उसके पास आया और बोला कि सेठ जी मुझे कृपा करके आठ आने दान में दे दीजिये। सेठ जी के पूछने पर उसने बताया कि चार आने का वह स्वयं भोजन करेगा और बाकी के चार आने अपनी माँ को जाकर दे देगा। सेठ जी यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गये और उन्होंने खुश होकर उसे दस रूपये दे दिये और कहा कि अब तुम्हें दो तीन माह तक भीख माँगने की जरूरत नही होगी और तुम अपने परिवार के लिए रोटी का प्रबंध आराम से कर लोगे। वह रूपये पाकर बहुत खुश हुआ और सेठ जी को धन्यवाद देकर उनके पांव छूकर उनके प्रति अपना आदर व्यक्त करते हुए चला गया।
अब लगभग दो वर्ष के बाद वे सज्जन पश्चिम बंगाल के उस शहर मिदनापुर में वापिस आये और उसी स्थान जहाँ उन्होंने उस बच्चे को रूपये दिये अकस्मात पहुँच गये। वहाँ पर उसी समय एक बालक ने आकर उनके पांव पकडकर उनसे निवेदन किया कि आप मेरी अनाज बेचने की दुकान पर पधारकर मेरे परिवार को आशीर्वाद देने की कृपा करे। उस व्यक्ति ने आश्चर्य से पूछा कि तुम कौन हो भाई और मुझसे तुम्हारी यह अपेक्षा क्यों है ? उस लड़के ने बताया कि महोदय मैं वही लड़का हूँ जिसने आपसे आठ आने माँगे थे, और आपने उसकी एवज में दस रूपये दे दिये थें। मेरे परिवार ने उसमें से एक रूपये भोजन में खर्च किया और बाकी बचे नौ रूपये से अनाज के व्यापार का काम शुरू कर दिया था। प्रभु की कृपा और आपके आशीर्वाद से हमारा काम दिन दूनी और रात चौगुनी प्रगति करने लगा। हमने यह दुकान भी खरीद ली है, आपके चरण कमल पडेंगें तो हम और भी अधिक मेहनत करके जीवन में सफल होगें। वह व्यक्ति उसका अनुरोध स्वीकार करके उसके साथ उसकी दुकान पर गया, जहाँ उसका पूरा परिवार उनके प्रति कृतज्ञ था। वह व्यक्ति और कोई नही सुप्रसिद्ध समाज सेवी ईश्वरचंद विद्यासागर थे।

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हृदय परिवर्तन 

नर्मदा नदी के किनारे एक संत करते थे। उनके आश्रम के बगल में ही एक कसाई रहता था जिसकी नीयत स्वामी जी के आश्रम की जमीन हडपने की थी। वह चाहता था कि स्वामी जी किसी प्रकार से यहाँ से चले जाये और वह जमीन पर कब्जा कर ले। अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए वह प्रतिदिन एक मुर्गी को मारकर उसकी हड्डियाँ, आश्रम के मुख्य द्वार के पास फेंक आता था इससे वहाँ पर बदबू फैलने के कारण स्वामी जी एवं आश्रम में आने जाने वाले उनके अनुयायियों को काफी कष्ट होता था। यह जानकर वह कसाई मन ही मन प्रसन्न हुआ करता था। उसके विचित्र स्वभाव के कारण उसकी पत्नी और उसका बेटा उसके छोडकर अन्यत्र निवास करते थे।

कुछ माह के पश्चात शहर में प्लेग नामक बीमारी का प्रकोप अचानक फैल गया। शहर में रहने वाले लोग इसके प्रकोप से बचने हेतु शहर छोडकर बाहर जाने लगे। इसी दौरान वह कसाई भी इस बीमारी की चपेट में आ गया। उसकी पत्नी और बेटा पहले ही शहर छोडकर जा चुके थे। स्वामी जी ने ऐसी विकट परिस्थितियों में उसकी बहुत सेवा की जिससे अभिभूत होकर उसने एक दिन स्वामी जी से पूछा कि मै तो आपका अहित चाहता था और आपके आश्रम की जमीन हडपना चाहता था। मेरे इतने दुर्भावना पूर्ण व्यवहार के बाद भी आप इतने तन, मन से मेरी सेवा कर रहे है। ऐसा क्यों ?

स्वामी जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि मानव में मानवीयता के साथ मानव की सेवा करने की मन में भावना एवं उसे कार्यरूप में परिणित करना ही वास्तविक धर्म है। मैंने केवल अपने कर्तव्य का पालन किया है। यह सुनकर वह कसाई स्वामी जी के चरणों में गिरकर अपने द्वारा किये गये पूर्व कृत्यों के लिए माफी माँगता है। स्वामी जी की बातों से उसका हृदय परिवर्तन हो चुका था। उसने अपनी जमीन भी आश्रम को दान देकर स्वयं उनका शिष्य बनकर सेवा का संकल्प ले लिया। इससे हमें यह शिक्षा प्राप्त होती है कि निस्वार्थ सेवा के द्वारा कठोर व्यक्ति का भी हृदय परिवर्तन हो सकता है।

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storuiess am 65 years old young writer who started writingfrom2012dec .ihadno inclinationin for literature but one afternoon I was talking with very cultured lady I told her I would have written a
poem had I would have a poet. she smiled and encouraged me resulted I have become a writer I have written 15books published by rajkamal
pre baht. pustakmahal lndra publications etc
I wish my stories poems novels will give inspirations to youth and may be useful in life

regards to all.

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