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‘महानपुर के नेता’ एक बहुत ही महान गाँव की कहानी है। इतने महान गाँव की कि यहाँ महानता की केवल बातें ही नहीं की जातीं अपितु उन्हें व्यवहार में भी उतारा जाता है। 300 बरस पहले महान बाबा ने महानपुर बसाया तो सबसे कहा कि यहाँ न कोई जाति होगी न ही धर्म। सब महानता का व्यवहार करेंगे और सबके नाम के आगे बस महान लगेगा। इस बात को महानपुरियों ने गाँठ बाँध लिया और ये गाँठ तब तक कसकर बँधी रही जब तक महानपुर में चुनाव की चिड़िया नहीं आयी। लेकिन जब चुनाव की चिड़िया ने चहकना आरम्भ किया तो महानता के मायने बदलते गये। एक जोड़ी बूढ़ी आँखों के आगे एक शहरी ने महानता को ही हथियार बनाकर महानता का गला घोंटने का हर सम्भव प्रयास किया। महानता के बोझ तले दबे महानियों के मूल स्वभाव की कुरेदन से बने नये चित्रों की रंगकारी ही है ‘महानपुर के नेता’।

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नारेबाजी करने से प्रत्याशी का रक्त संचार तेज हो जाता है। वह स्वयं को कुछ समझने लगता है और जोश में जनता के लिए वादे कर देता है। नारेबाजी के बदले में जनता को मिलते हैं वादे, वादे जो सुनने में अच्छे लगते हैं। इसलिए नारेबाजी द्विपक्षीय लाभदायी प्रक्रिया है। साथ ही जब वादे पूरे नहीं होते तब जनता में असंतोष की वृद्धि होती है। असंतोष से नए नेता पैदा होते हैं और इस प्रकार राजनीति का ये क्रम चलता रहता है।

पृष्ठ संख्या 134
#महानपुर_के_नेता

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कल से सोशल मीडिया पर "हमें तो पहले ही पता था" जमात सक्रिय है।😜
#कच्ची_पोई

जोमैटो प्रकरण के बाद आजकल देश में धर्म पर बहस छिड़ी हुई है। लेकिन एक ऐसा भी गाँव है जहाँ न जाति है न धर्म। लेकिन अब वहाँ चुनाव का बीज बोया गया है तब क्या गाँव विवादरहित रह पाएगा?

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#महानपुर_के_नेता

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‘महानपुर के नेता’ एक बहुत ही महान गाँव की कहानी है। इतने महान गाँव की कि यहाँ महानता की केवल बातें ही नहीं की जातीं अपितु उन्हें व्यवहार में भी उतारा जाता है। 300 बरस पहले महान बाबा ने महानपुर बसाया तो सबसे कहा कि यहाँ न कोई जाति होगी न ही धर्म। सब महानता का व्यवहार करेंगे और सबके नाम के आगे बस महान लगेगा। इस बात को महानपुरियों ने गाँठ बाँध लिया और ये गाँठ तब तक कसकर बँधी रही जब तक महानपुर में चुनाव की चिड़िया नहीं आयी। लेकिन जब चुनाव की चिड़िया ने चहकना आरम्भ किया तो महानता के मायने बदलते गये। एक जोड़ी बूढ़ी आँखों के आगे एक शहरी ने महानता को ही हथियार बनाकर महानता का गला घोंटने का हर सम्भव प्रयास किया। महानता के बोझ तले दबे महानियों के मूल स्वभाव की कुरेदन से बने नये चित्रों की रंगकारी ही है ‘महानपुर के नेता’।

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पनकी जी, समस्याएँ तो हर जगह होती हैं और यदि समस्याएँ नहीं हैं तो उन्हें उत्पन्न कीजिए। समस्याएँ नहीं होंगी तो मुद्दे नहीं होंगे और मुद्दे नहीं होंगे तो चुनाव क्या खाक होंगे?

आने वाली किताब
"महानपुर के नेता" से

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अगर आप वासना की दृष्टि से न देखें तो दुनिया की हर लड़की आपको सुंदर लगने लगेगी।

प्रांजल सक्सेना

सही या नहीं😜