मन के भाव अनुभावों को ..पन्नों पर उकेरना है पसन्द .... कभी कथा, कभी लघुकथा, कभी रूप बने है काव्य -छंद..

#काव्योत्सव -2

आंख मिचौली 

"जिस दिन फूलों पर बिखरी थी, मधु की पहली बूंदे
 जिस दिन से अंबुज की, प्यासी आंखें रवि को ढूंढें 

जिस पल नील-घूंघट में चेहरा देखा, विधु ने रजनी का
जिस पल दीपक की लौ में जलकर, प्रेममय हुआ पतंगा

जिस क्षण किरणों के रंग से ,रंग उठे थे तारे 
जिस क्षण पुष्प के मीठे रस से ,भीगे मधुकर सारे

 उन्हीं पलों में भीग उठा,मेरा चंचल सा जीवन
उन्हीं क्षणों में फूट पड़ा,स्वर के बंधन से रोदन 

तब से मैंने अंबुज बनकर, ढूंढा अपने रवि को
 तब से मैंने इस नदिया बनकर ,ढूंढा सागर की छवि को 

कितने बीत गए पतझर, कितने बसंत दिन आए
 पर मेरी व्यापक पीड़ा का, कोई छोर न पाए

 अब तो इन जर्जर तारों में, उलझ गया है मानस
 प्रतिपल घुमड़ रहा नेत्रों में, टूटे सपनों का पावस 

आज भी अनछिड़े हैं कोमल हृदय के तार,
 गूंजती है बस यहां एकांत की झंकार 

अब थके हैं प्राण, होकर वेदना में मौन 
जो अगर आए कभी वे,तो पूछना तुम कौन 

अब नहीं होने देना, मेरे मन कोई अनहोनी
 दूर हटो मेरे निर्मोही ,नहीं खेलनी आंख मिचौली"

-कविता जयन्त

Read More

काव्योत्सव-2

"बरसों बाद देखा तुम्हें
 कुछ बदले बदले से लगे तुम

 यह जानना कुछ मुश्किल ही था 
क्यों आए थे पलटकर गुमसुम 

रूखी हवाओं के थपेड़ों सर्द
 ना कोई दुख ना कोई दर्द 

जो सिर्फ समझती थी मुझे गर्द
 आज आंखें उसी की है जर्द 

भावहींन प्रतिमा का वह कठोर रूप 
जो किसी के आंसू की ओस पर बनते धूप

 कैसे उसी की नजरों में उभर आए ?
 दर्द की लकीरों के साए ?

कभी धुंधली सी रोशनी में गुम हो गए थे लम्हे 
जो नीले सागर की गहराई में छुपाना चाहते थे तुम्हें 

वह सागर अब तो सूख कर वीरान हो उठे 
तुम्हारे प्रेम की अतृप्त आस में रो उठे

 जिन आंखों में कभी स्वर्णिम स्वप्न मैं बसाती रही
 उन आंखों को अब नींद सी आने लगी

 उस रात कर इंतजार मैं हार गई
 पर आज तुम आए लो मैं सब कुछ बिसार गई ..

क्योंकि आज भी है मेरे मन पर,वो दर्द के साए 
आज भी दुख के बादल ,प्यास से छटपटाए 

प्यार पर विह्वल हुई मैं उस घड़ी ..
मेरे आंसुओं की आंच से जब तुमने होंठ जलाए

-कविता जयन्त

Read More

#काव्योत्सव

अनंतकाल

सूरजमुखी युगों से सूरज को ही निहारती है
थकती नही है कोयल जाने किसे पुकारती है
चांद निकलता है जाने किसकी प्रतीक्षा में
सांझ किसकी प्रतीक्षा में हर एक क्षण गुजारती है

व्याकुल रश्मियां सूरज को छोड़ पेड़ों को थाम लेती हैं
न जाने ये चंचल बेसुध हवा किसका नाम लेती है ..
ये नदियां सदियों से बहती ,किससे मिलने जाती हैं
ये कलियाँ पंखुड़ियों को किसकी बात बताती हैं

क्या कभी सूर्य सूर्यमुखी का प्रेम समझ पायेगा
क्या कोयल की पुकार सुनकर कोई मिलने आएगा
क्या चांद अपनी प्रतीक्षा का फल कभी पायेगा
फूलों के न मुरझाने का भी दिन आएगा

कब थमेगा इनके प्रेमाश्रुओं का काफिला
कब खत्म होगा इनकी निराशाओं का सिलसिला
कब खत्म होगा इन समस्याओं का जंजाल
कब खत्म करेगे ईश्वर इस प्रतीक्षा का अनंतकाल

-कविता जयन्त

Read More

#काव्योत्सव


सरल प्यार


एक दिन सहसा सूर्य सांझ में उगा,
 तुम समीप थे आए ,स्नेहदीप सा जला

क्या कुछ करने हैं शिकवे, या भूली छूटी बातें
 मैं एकल निस्तब्ध सोचती, देखती दो निश्छल आंखें 

टेसू के फूलों सा रक्तिम , होता था तुम्हारा मुख 
आंखों की झिलमिल पंक्ति में ,दिखने लगा था दुख

प्रेम तुम्हें छू गया था शायद, और रूठा था प्यार 
तुम्हारे रूठे प्रिय के आगे, सूना था संसार 

तुम्हें बताया और जताया, 'सरल बहुत है प्यार' 
तब तुम ने आंखें भी उठाई, जिनमें था मनुहार 

"यह तो मात्र प्रेम है समझो, कर सकते हो स्वीकार
 अहं नहीं होता है इसमें, केवल है झनकार

 बिन बोले कुछ कहना सीखो, सीखो शब्द प्रकार
 बहुत सरल है प्यार जताना जाओ करो पुकार .."

खुशी खुशी तुम चले गए और टूटा मेरा संसार 
आसां था समझा ना तुम्हें ,कि 'सीखो शब्द प्रकार' 

बिना कहे भी कहना सीखो ,यह सब कुछ है प्यार .."
मगर आज तक कह ना सकी मैं, रह गई पंथ निहार 

मैंने सोचा तुम ही कहोगे, बनकर मुक्ताहार 
मगर छोड़ कर चले गए तुम, छूटा अब संसार 
जैसे मांझी बीच भंवर में, छोड़ चला पतवार.."


-कविता जयन्त

Read More

#moralStories

कुलदीपक

उसने मकान के कागज पापा के हाथ मे थमाए ..और कहा "पापा ये मकान हमेशा आपका ही था और आपका ही रहेगा, जब तक मैं हूँ आप किसी बात की चिंता मत करिए ..!" उसने घूर कर अपने छोटे भाई को देखा जो इस वक़्त शर्म से नज़रें नीची किये अपराधी की भांति खड़ा था

पिता :(आंखों में आंसू व भर्राए गले से )"मुझे माफ़ कर दो बेटी , मैंने हमेशा तुम्हे गलत समझा कभी तुम्हे कुछ करने न दिया, हतोत्साहित किया ,पर देख मेरे बिजनेस के बुरे दौर में तू मेरा सहारा भी बनी और आज तूने मेरी एकमात्र जमा पूंजी की इतनी परवाह भी की ..ये तो यह भी न समझ सका कि यह मकान मेरे लिए क्या था '..आज इसने मेरे लाड़ प्यार का क्या फल दिया मुझे... अय्याशी की लत में मेरे ही घर का सौदा करने चला था..मैं सोचता था बेटी तितली की तरह नाजुक सी कमजोर होती है परायी होती है उसमें बोझ उठाने का सामर्थ्य नही होता, पर आज मैंने उन पंखों की ताकत देख ली , ईश्वर ने वक़्त रहते मेरी आँखें खोल दी कितना गलत था मैं सोचता था ,बेटा कुल का दीपक होता है पर आज समझ आया जो कुल का मान बढ़ाए वास्तव में वही कुलदीपक है।"

-कविता जयन्त

Read More

#moralStories

निगाह

उसने बैंक में पिता के स्थान पर मृतक आश्रित कोटे में नियुक्ति पाई हुई थी ..20 वर्षीय लड़की को देख दो सहकर्मी
" देखिए बेचारी बच्ची.. अभी उम्र ही क्या थी करियर बनाने के सपने रहे होंगे.. पर विधि का विधान था कि उस पर अपना घर चलाने की जिम्मेदारी आन पड़ी..!"

" हा हा हा हा.. क्या मजाक करते हैं सर .. आपको यह 20 साल की लड़की बच्ची दिखाई दे रही है, कहां से ? हा हा हा"...लालची आंखें उसके बदन का मुआयना कर रही थी...
अगले पुरुष ने व्यंग्य और क्रोध से कहा..
" लगने का क्या है भाई साहब, किसी को 20 साल की लड़की अपनी बच्ची लगती है , किसी को वस्तु.. ये तो निगाह की बात है ..वरना बहुत से लोगों को तो 6 महीने की बच्ची भी बच्ची नहीं लगती..!"

-कविता जयन्त

Read More