अख़बार

आज सुबह अखबार देर से आया ......

    आज सुबह झुंझलाहट हो रही थी. तेज बारिश हो रही थी,लाईट गोल और 8 बज रहे थे अखबार नहीं आया था. बहुत गुस्सा आ रहा था,हाकर से लेकर एजेंसी वाले से लेकर अखबार मालिक ओर्र सम्पादक पत्रकार तक. मुझे क्यों गुस्सा आ रहा था ? कुल जमा डेढ़ सौ, दो सौ महीने के देकर मै अखबार खरीदता हूँ  ऊपर से मेरे मिजाज इतने ज्यादा चढ़े होते है कि मै किसी भी अखबार को कभी भी बंद कर दूसरा अखबार मंगाने लगता हूँ . 
  आज जब अखबार वाला आया तो मै उसपर चढ़ बैठा उसे देर से पेपर डालने के लिए खरी खोटी सुनाने लगा वो सहम कर चला गया. चाय के साथ इत्मिनान से  जब अख़बार के पहले पन्ने पर नजर डाला  तो देखा उस अख़बार के सम्पादक जी नहीं रहे ,अन्याय,अनीति के विरुद्ध कुछ करने वाले कलम के योद्धा नहीं रहे . मात्र 55 साल की उम्र में उनके दिल ने उनका साथ छोड़ दिया. उसे साथ छोड़ना ही था क्योकि जो दिल जो चाहता था वो वो नहीं करते थे, वो वो करते थे जो  समाज को जगाने  के लिए उनके दिमाग के एक और दिल की जोर की आवाज बनता था. एक अख़बार का पूरा सम्पादन जो देर रात तक चलता है, जिसमे अपनी भी गहरी बात रखने के लिए अलग से प्रयास करना ताकि सोया समाज जाग सके और विवेक पूर्ण हो सके, जो सही गलत को समझ सके, ताकि किसी के लाख भरमाने पर भी भरम में न पड़े. वे देर रात तक हर शब्द में संदेश गढ़ते थे और सुबह चाय के साथ हमारे लिए वो थोड़ी देर का मन बहलाने का साधन मात्र होता था ... 
एक अख़बार सुबह हाथों में आने के पहले कितनी बाधाओं को पार कर कितने लोगो के पसीने से तैयार होता है . पूरी रात प्रिंट समाचार कि दुनिया सक्रिय रहती है. और मशीनों से निकलता है अक्षर अक्षर शब्द बनकर एक समाचार.... जो कोशिश करता है कि रात को सोने वाले सुबह आँखों से ही नहीं, मन से भी जागें . उन जैसे न जाने कितने याग्निक अख़बार के साथ खुद को भी हर रोज दाँव पर लगाये रहते है , अख़बार भी बाजार की प्रतिस्पर्धा की गिरफ्त में हैं ,यदि  उसमे गुणवत्ता नहीं होगी, तो विज्ञापन नहीं मिलेगा और विज्ञापन नहीं मिलेगा तो लाखो प्रेस कामगार के रोजगार का क्या होगा,उनकी रोजी रोटी का क्या होगा.... एक दूसरे से श्रेष्ठ होने का भारी  दबाव उन लेखको और पत्रकारों पर होता है और यह दबाव सीधे सीधे उनके दिल पर असर डालता है  ... रक्त मांस का दिल आखिर एक मशीन ही तो है उसका रख रखाव नहीं हुआ तो वो बैठ जायगा ... हर आदमी के भीतर दो दिल होता है, एक जो उसके शरीर में धडकता है ,और एक उसके दिमाग में धडकता है दिमाग वाला दिल उसकी उपेक्षा करता है और वो साथ छोड़ देता है . और ये सच है कि कामयाबी जीने की ताकत छीन लेती है ....
उन जैसे मर खप जाने वाले लेखकों को पत्रकारों को वक्त भुला देता है जिंदा रह जाता है तो केवल के उस अख़बार का नाम  उस 

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shekhar

shekhar 10 month ago

Swatigrover

Swatigrover User Verified 10 month ago

Ankita prajapati

Ankita prajapati 10 month ago

nice story on news paper

nihi honey

nihi honey 10 month ago

Annu

Annu 10 month ago