लौट आओ दीपशिखा - 11

लौट आओ दीपशिखा

उपन्यास

संतोष श्रीवास्तव

अध्याय ग्यारह

गौतम के कहने पर रघुवीर सहाय ने टेप रिकॉर्डर स्विच ऑफ़ करते हुए कहा- “इतना बेहतरीन इन्टरव्यू अभी तक तो किसी चित्रकार का लिया नहीं मैंने जबकि दीपशिखा जी हमारी किताब की अंतिम चित्रकार हैं|”

धीरे-धीरे गुजरात के दंगे शांत होने लगे| लेकिन दीपशिखा का मन अब उतना ही अशांत रहने लगा था| दंगों से वह उबर नहीं पा रही थी| हर वक़्त ख़ौफ़ बना रहता कि कोई उसे मारने आ रहा है| रात को चौंक-चौंक जाती| गौतम उसका सिर अपने सीने से लगाकर थपकियाँ देता| एक अनाम लेकिन मज़बूत बंधन था दोनों के बीच जिसके सिरे दोनों के दिल से बँधे थे| दीपशिखा ने गौतम का कॅरियर बनानेमेंजी जान एक कर दी थी| वह इस बातके लिए खुद को दोषी मानती थी किगौतम का फिल्मीकॅरियर उसी की वजह से ख़तम हुआ है| गौतम को बेतहाशा प्यार करना, उसे सँवारना दीपशिखा की दिनचर्या थी उन दिनों|मानो वह छोटा बच्चा हो जिसकी जवाबदारी दीपशिखा की थी| लेकिन पीपलवाली कोठी में घटे हादसे से अब दीपशिखा ही नन्ही बच्ची हो गई थी| भयभीत, डरपोक और शक के दायरे में कैद|पिछली रात सुलोचना को पानी देने गज़ाला जब उनके कमरे में गई तो लॉबीसे गुज़रते हुए उसकी लम्बी छाया दीवार पर देख दीपशिखा डर गई थी| उसने बगल में सोये गौतम को झँझोड़ा- “गौतम..... नीलकांत मुझे मारने आया है| वह मुझे मार डालेगा एक दिन|”

गौतम उसकी बड़ी-बड़ी सफ़ेद पड़ चुकी आँखों को एकटक निहारता ही रह गया| क्या हो गया है दीपशिखा को? किस्से सलाह ले? तुषार भी लंदन में है छै:महीनों से|शेफ़ाली भी उसके साथ गई है| तुषार अपने विषय का विशेषज्ञ होने के लिये वहाँ रहकर गहन शोध कार्य कर रहा था| उसी से सलाह लेना ठीक है| उसने फोन पर तुषार को दीपशिखा के डर और भय की बात विस्तार से बताई| सुनकर तुषार चिंतित हो बोला- माई गॉड..... ये तो पेरोनाइड सिज़ोफ्रिनिया के सिम्टम हैं जिसमें ऐसा लगता है कि कोई मारने आ रहा है| बड़ा घातक है ये रोग..... तुम चिन्ता मत करो..... मैं एक हफ़्ते बाद लौट रहा हूँ| तुम्हें दीपशिखा को पुराने माहौल से निकालना होगा| विश्वास, प्यार और आबोहवा बदलने से इस रोग पर काफ़ी हद तक काबू पाया जा सकता है|”

गौतम के माथे पर पसीने की बूँदें झलक आईं| घबराहट में वह दो तीन गिलास पानी पी गया- “ये क्या हो गया शिखा तुम्हें..... इतने कमज़ोर दिल की तुम कैसे हो गईं मेरी बहादुर शिखा..... लेकिन दीपशिखा गहरी नींद में सोई थी| गौतम रात भर करवटें बदलता रहा| बाथरूम जाता बार बार और उतनी ही बार ठंडा पानी हलक से नीचे उतारता| उसे लग रहा था जैसे वह सहरा से गुज़ररहाहै जहाँ धूप की चिलचिलाहट औरगरम रेत के सिवा कुछ नहीं|

शेफ़ाली लंदन के आसपास के गाँवों में चित्रकला के विषय तलाशने की मुहिम में तब तक जुटी रही जब तक तुषार अपने शोध में व्यस्त रहा| लौटी तो ढेर सारे चित्र साथ लेकर लौटी|उसने दीपशिखा को फोन किया- “आँटीजी किस हैं? क्या तू लंदन में बनाए मेरे चित्रों को देखने मेरे घर आ सकती है?”

इतने महीनों बाद शेफ़ाली से मिलने को खुद को रोक नहीं पाई दीपशिखा..... वैसे भी सुलोचना की तीमारदारी गज़ाला बहुत अच्छे से कर रही थी|

गाड़ी खुद ड्राइव करके आई थी दीपशिखा| शेफ़ाली ने उसे गले से लगा लिया- “कैसी है मेरी सखी?”

“तू बता? लंदन से मोटी होकर आई है| तुषार ने अच्छी ख़ासी केयर की है तेरी|”

“जी नहीं..... उल्टे उसे पेम्परिंग करना पड़ता है| माई चाइल्ड हस्बैंड|”

शेफ़ाली ने दीपशिखा के आने के पहले ही सारे चित्र दीवार पर सजा दिये थे| दीपशिखा घूम-घूम कर चित्रों को देखते हुए बेहद खुश हो रही थी- “तेरा वहाँ रहना तो बड़ा कामयाब रहा| मैं तो दंगे और माँ की बीमारी से ही जूझती रही| रंग और ब्रश अलमारी में रखे मुँह बिसूर रहे हैं|” शेफ़ाली ने उबली हुई मूँगफली को मसाले आदि डालकर खूब चटपटा बनाया था जिसे खाते हुए लंदन की ढेरों बातें उसने दीपशिखा को बताईं..... कि तुषार बहुत अच्छा इंसान है और उससे भी बड़ी बात ये है कि वह मुझे बेहद प्यार करता है|”

दीपशिखा शेफ़ाली को लेकर बहुत अधिक आश्वस्त हुई| उसकी प्यारी सखी सुख से है और उसे क्या चाहिए लेकिन गोधरा कांड की चर्चा छिड़ते ही दीपशिखा का चेहरा बुझने लगा|

“वो हमें जान से मारने आये थे|”

“है हिम्मत किसी में? शेफ़ाली ने बात बदली| तुषार और गौतम के बीचदीपशिखा को लेकर जो बातें होती थीं उनसे शेफ़ाली परिचित थी बल्कि तुषार और शेफ़ाली भी दीपशिखा को लेकर चिंतित थे|

धीरे-धीरे सुलोचना की बीमारी और दीपशिखा का मनोरोग बढ़ता गया..... तीन साल तक बिस्तर भोग कर सुलोचना एक रात जो सोईं तो सुबह उठी ही नहीं| उनकी नींद में ही मृत्यु हो चुकी थी| महँगे इलाज और विशेष सावधानी के बावजूद भी सुलोचना की हालत देख सभी ये प्रार्थना कर रहे थे कि उन्हें जल्दी ही इस पीड़ा से मुक्ति मिले| दिन भर धैर्य से काम लेते हुए रात को गौतम के कंधे पर सिर रख रो पड़ी दीपशिखा..... मन की कचोट आँसुओं संग बह चली- “ईश्वर सच में दयालु है| जो काम दवा नहीं कर सकी वह ईश्वर ने कर दिखाया| माँ को उनकी तकलीफों से छुटकारा दिला दिया|”

सुलोचना की मृत्यु के साथ एक युग का अंत हो गया| अभीतेरहवींका हवन होकर ही चुका था कि पीपलवाली कोठी के कई दावेदार खड़े हो गये| यूसुफ़ ख़ान के चचाजात भाइयों ने दीपशिखा से बँटवारा चाहा| एक हिन्दू लड़की से शादी करने के गुनाह में यूसुफ़ ख़ान ताउम्र अपने परिवार वालों से ‘बिरादरी बाहर’ जैसी पीड़ा सहते रहे थे लेकिन अब वही परिवार वाले उनकी जायदाद पर अपना हक़ जता रहे हैं?

“किसी को फूटी कौड़ी भी नहीं मिलेगी|” दीपशिखा ने बेबाकी से ऐलान किया- “गौतम, तुम जानते हो, इन्होंने मेरी माँ को कितना सताया है| चैन से जीने नहीं दिया उन्हें| मैं इन्हें देने से अच्छा दरिया में बहाना पसंद करूँगी उस जायदाद को|”

“रिलैक्स..... तुम जो चाहोगी वही करेंगे| हम कल वकील से परामर्श करके सारे ज़ेवरात, शेयर्स आदि बेचकर तय कर लेंगेक्या करना है?”

वकील ने भी सब कुछ बेचकर वसीयतनामा तैयार करने की सलाह दी| सौ करोड़ की संपत्ति आँकी गई| जिस दिन गौतम और दीपशिखा पीपलवाली कोठी बेचने के लिये गुजरात जाने की तैयारी कर रहे थे दीपशिखा ने शंका जताई- “पापा के चचेरे भाई कहीं मुझे मार न डालें..... उन्हें कुछ देना ठीक रहेगा क्या?”

“अंतरआत्मा जैसा कहे वैसा करो, किसी से सलाह मत लो|”

वीरान कोठी में क़दम रखते ही दीपशिखा का कलेजा काँप गया| अब वहाँ एक भी नौकर नहीं बचा था| सब अपने-अपने गाँव चले गये थे|फुलवारी सूख गई थी| सारे कमरे जालों से अँटे पड़े थे| रसोई जो कभी पकवानों से महकती थी आज भुतहा दिखाई दे रही थी| दीपशिखामाथा पकड़कर बैठ गई| गौतम अफ़सोस कर रहा था- “नहीं लाना था दीपशिखा को, वह तनावग्रस्त हो गई है|”

कोठी की नीलामी लगी और सौदा तय होते तक दीपशिखा ने यूसुफ़ ख़ान के तीनों चचेरे भाईयों को भी कुल संपत्ति का चालीस प्रतिशत देकर मुक्ति की साँस ली- “कब क्या कर बैठें कोई भरोसा?”

गुजरात से सदा केलिये नाता टूट चुका था| इस तरह अंत होता है एक भरे पूरे परिवार का, परिवार से जुड़ी ज़िन्दग़ियों का| दीपशिखा आहत मन से मुम्बई लौटी| गौतमऔर शेफ़ाली के साथ के बावजूद एक उदासी उसे घेरे रहती| उसने सुलोचना की तस्वीर सामने रख एक औरत का आदमक़द चित्र बनाया जो काफी हद तक सुलोचना से मिलता जुलता था| औरत के चेहरे पर एक रहस्यमय उदासी थी| काली गहरी आँखों में सूनापन था| औरत की साड़ी को लाल रंग से रंगते हुए दीपशिखा डर गई थी..... खून..... ऐसा ही खून बहा था दंगों के दौरान..... ऐसा ही खून बहाने कोठी में घुसे थे दंगाई..... उसने आँखें बंद कर लीं जो भय से सफेद हो चुकी थीं| दीपशिखा नहीं जानती थी कि यह उसकी ज़िन्दग़ी काआख़िरी चित्र है और लाल रंग उसे हमेशा डरावना लगेगा..... वह यह भी नहीं जानती थी कि मशहूर चित्रकार की हैसियत से वह अपने प्रशंसकों को ऑटोग्राफ़ देने वाली एक दिन आड़ी तिरछी रेखाएँ भी नहीं खींच पायेगी| ..... साम्प्रदायिक दंगों से लगी नफ़रत की आग ने, प्रतिहिंसा की लपटों ने मातम में बदल दिये हैं दिल..... यहाँ भी..... वहाँ भी|

“गौतम..... दीपशिखा को चेंज की ज़रुरत है| तुम्हें उसे समय देना होगा|” तुषारने,जो क्लीनिक से सीधा दीपशिखा के पास उसके चेकअप के लिये आया था बेहद फिक्रमंद होकर कहा|

साथ में शेफ़ाली भी आई थी| उए तीन महीने का गर्भ था| सुनकर उछल पड़ी दीपशिखा- “वाह..... इस खुशखबरी पर तो जश्न मनाना चाहिए आज|”

“नहीं दीपू..... बहुत नाज़ुक जान पलती है कोख में..... जन्म के बाद ही हम जश्न मनाएँगे|” शेफ़ालीने दीपशिखा के गाल थपथपाये|

“हाँ, माँ कहती थीं कि बच्चे का नाम सुनते ही नज़र लगनी शुरू हो जाती है| मेरे जन्म के बाद मुझे जो पहला झबला पहनाया गया वह नया नहीं था, माँ की पुरानी साड़ी से बनाया गया था|”

तुषार और गौतम की धीमी आवाज़ दोनों सखियों तक नहीं पहुँच पा रही थी| गौतम ने आहिस्ता से कहा- "ऊटी प्लान कर लेता हूँ| वह जगह दीपशिखा को बहुत पसंद है|”

हफ़्ते भर बाद गौतम को ऑफ़िस से जाने की परमीशन मिली थी|काम ही ऐसा है जल्दी छुट्टियाँ सैंग्शन नहीं होतीं| दीपशिखा खुश थी कि कुछ दिन गौतम के साथ फुरसत में गुज़रेंगे| ऊटी के जिस होटल में वे रुके थे उसी होटल में गौतम का मित्र भी रुका था जो एक इत्तफ़ाक़ था|होटल के डाइनिंग हॉल में ब्रेकफ़ास्ट के दौरान दोनों की मुलाकात हुई|

“ओ..... व्हाट अ सरप्राइज़, कैसे हो यार?”

“यह तो वाक़ई इत्तफ़ाक़ है|” फिर सामने बैठी दीपशिखा से परिचय कराया- “शिखा मेरा दोस्त दिवाकर और दिवाकर मेरी लाइफ़ पार्टनर दीपशिखा|”

दिवाकर ने दीपशिखा को ग़ौर से देखा- “डबल सरप्राइज़ दोस्त, तुम छुपे रुस्तम हो| शादी कर ली बताया तक नहीं|”

“हमलिव इन रिलेशन में हैं दिवाकर.....”

दिवाकर आश्चर्य से दोनों को देखने लगा| वह ज्योतिष विद्या का जानकार था और दीपशिखा के माथे की लकीरें उसके मन में कई प्रश्न खड़े कर रही थीं लेकिन वह खामोश रहा| दोनों मित्र पुराने दिनों को याद करते रहे|

“अभी तुम लोग झील की सैर कर लो| शाम को हम चाय बाग़ान साथ में चलेंगे| बस, आज की शाम ही है मेरे पास गौतम तुम्हारे साथ बिताने की| कल वापिसी..... चलो मैं चलता हूँ| दस बजे से मीटिंग है|”

झील के किनारे नीलगिरी के ऊँचे-ऊँचे दरख़्तों के नीचे छाया का मानो स्थाई बसेरा था| हवा में जब शाख़ें डोलतीं तो छाया भी डोलने लगती|

“देखातुमने गौतम?” दीपशिखा ठिठककर खड़ी हो गई|

“डालियों की छाया हवा के डर से इधर-उधर छिपने की कोशिश कर रही है|”

डर..... डर..... हर वक़्त असुरक्षा का एहसास ओह..... मेरी संगिनी के साथ ही यह होना था? मुट्ठी भर खुशी भी ईश्वर को बर्दाश्त नहीं| प्रगट में वह दीपशिखा को मुग़लिया स्टाइल में सलाम करते हुए बोला- “बेग़म, यह तो आपके आने की खुशी में शाखाएँ कालीन बिछा रही हैं|” दीपशिखा ने हँसते हुए नीलगिरी के पेड़ के तने में उगी कोंपल को तोड़कर हथेली पर रगड़ा और हथेली गौतम की नाक के पास ले गई- “सूँघो|”

एक तुर्श गंध उसकी साँस के साथ भीतर कलेजे तक पहुँच गई|

“एक बात पूछूँ गौतम? मुझे लेकर तुम क्या सोचते हो?”

“मतलब?” दीपशिखा के अजीब से सवाल से चौंक पड़ा था गौतम.....

“मैंजानती हूँ, पुरुष हमेशा औरत का पहला प्यार बनना चाहता है और मैं तो.....”

“तुम ऐसा कब से सोचने लगीं? तुम तो उन्मुक्त विचारों की हो|अपनी ज़िन्दग़ी अपनी पसन्द से चुनी तुमने, क्या मैं तुम्हारी पहली पसंद नहीं हूँ?”

“..... लेकिन एक अजीबोग़रीब चाहत ने जन्म लिया है मेरे दिल में कि मैं तुम्हारी अन्तिम चाहत रहूँ सदा|”

गौतम ने हथेली फैलाई- “वादा रहा|”

“सोच लो|”

“सोच लिया..... तुम्हें पाकर ज़िन्दग़ी में अब और कोई या किसी और की चाहत नहीं रही| मैं तुममें संपूर्ण हो गया|” दीपशिखा हुलसकर लिपट गई गौतम से| तभी शाख़ों पर बैठी चिड़ियों का झुँड चहचहाकर उड़ा, मानोदोनों के मिलन से वो अपनी खुशी प्रगट कर रहा हो|

शाम को दिवाकर के साथ उन्होंने चाय बाग़ानों की सैर की| झुटपुटा होते ही वे होटल लौट आये| ठंड बढ़ गई थी औरहलकी बारिश के कारण सड़कों पर सन्नाटा था| दिवाकर वोद्कालेकर आया था| गौतम के कमरे में ही महफ़िल जमी| एक पैग पीने के बाद दूसरा बनाते हुए दिवाकर ने कहा- “दीपशिखा जी, बहुत यश है आपके नसीब में, आपकी माथे की रेखाएँ बता रही हैं|”

“यानी कि ये शौक तुम अब भी पाले हो|”

“शौक भी है और गौतम, अब मैं इसे प्रोफ़ेशन भी बनाने जा रहा हूँ| विदेश में बहुत माँग है इसकी|”

“आपहाथ भी देखते हैं? लीजिए..... देखिए न मेरा हाथ|” दीपशिखा नज़दीक सरक आई|

दिवाकर उसका हाथटेबिल पर रखकर देर तक देखता रहा| फिर उसके माथे पर बल पड़ गये- “अरे, आपकीजीवन रेखा तो खंडित है|”

दीपशिखा ने चौंककर दिवाकर की ओर देखा| भय से वह काँप उठी| चेहराउतर गया- "यानी लाइफ़ ख़तम|” “क्या बकवास कर रहे हो दिवाकर..... मैं इन सब चीज़ोंपर यकीन नहींकरता| छोड़ो ये सब, तुम दीपशिखा की कविता सुनो|”

दिवाकरज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा- “बन गये न दोनों उल्लू..... आय’म सॉरी..... एक्चुअली उल्लू तो मैं गौतम को कह रहा हूँ दीपशिखा जी..... मुझे लगा था आप मज़ाक समझती हैं|बात को आई गई हो जाना था पर दीपशिखा का मन आंदोलित था| वह आधी रात को जाग पड़ी और अपनी हथेलियों को ताकने लगी| दिवाकर का कथन काली छाया सा उसके आसपास मँडरा रहा था| सुबह ऊटी जाने से पहले दिवाकर ने कहा- “प्लीज़, दीपशिखाजी..... उसे सीरियसली मत लीजिए, वह महज़ एक मज़ाक था|”

लेकिन सीज़ोफ्रेनिया की रोगी दीपशिखा के दिल में वह मज़ाक गहरे असर कर गया| जिस दिन वे मुम्बई लौटने वाले थे दीपशिखा को पागलपन का पहला दौरा पड़ा| मानो भूचाल आ गया हो जो उसके शरीर के ‘जीन’ से पैदा हुआ था और जो उसकी दुनिया के अंत की शुरुआत थी|वह ज़ोरों से चीख़ती हुई दरवाज़े पर पड़े परदों में खुद को छिपाने लगी- “गौतम, वे मुझे मार डालेंगे|”

गौतम ने उसे ज़ोरों से सीने में दबोच लिया| वह पंख फड़ाफड़ाती कबूतरी सी काँपने लगी- “मैंने देखा, वो काली छाया हाथ में चाकू लिये इसी ओर बढ़ रही थी|”

“रिलैक्स..... रिलैक्स शिखा, मैं हूँ न| भला किसकी हिम्मत है तुम्हारे नज़दीक आने की| मेरे सुरक्षा कवच में परिंदा भी पर नहीं मार सकता|”

गौतम ने दीपशिखा को पलंग पर लेटाकर कंबल उढ़ाकरथपकियाँदीं..... धीरे-धीरे बोझिल तंद्रा में डूब गई दीपशिखा|

ऊटी से बैंग्लोरतक कार से आना था| मुम्बई के लियेबैंग्लोर से ही फ़्लाइट लेनी थी| दीपशिखा की ऐसी हालत..... और रात का सफ़र क्योंकि फ्लाइट सुबह आठ बजे की थी| फोन पर तुषार था- मैं एक टेबलेट का नाम एस एम एस कर रहा हूँ..... अगर ऐसा लगे कि अटैक आने वाला है, खिला देना गर्म दूध के साथ| एयरपोर्ट से सीधे क्लीनिक आ जाना|”

“नहीं तुषार, तुम्हें ही मेरे घर आना पड़ेगा| मैं हिम्मत करके दीपशिखा को मुम्बई ला रहा हूँ..... मेरे लिये यह बहुत जोखिम भरा है|”

बहुत ही आरामदायक गाड़ी से गौतम दीपशिखा को बैंग्लोर लाया| एहतियात के तौर पर उसने दवा भी ख़रीद ली थी और गर्म दूध थर्मस में भरवा लिया था| बैंग्लोर एयरपोर्ट पर शेफ़ाली को देखकर वह ताज्जुब से भर उठा- “तुम कब आईं?”

“तुम्हारी बातें फोन पर सुन ली थीं मैंने| मैं तुषार की क्लीनिक में ही थी| तुषार ने रात की फ़्लाइट की टिकट अरेंज कर दी| दो बजे से एयरपोर्ट पर तुम दोनों के इंतज़ार में हूँ| कैसी हो दीपू?”

दीपशिखा शेफ़ाली को देख खिल पड़ी| गले में बाहें डालते हुए बोली- “अच्छी हूँ..... तू बता..... मेरा शरारती कैसा है?” वह शेफ़ाली के पेट पर हाथ फेरने लगी|

“पहले चाय पियेंगे| कुम्हला गई हूँ तेरे इंतज़ार में| फिर चीज़ ऑमलेट खायेंगे|”

“मेरा फेवरेट|”

वे ठिठके से लम्हे नॉर्मल लगे गौतम को| शेफ़ाली को देखते ही दीपशिखा खिल पड़ती है| बचपन की दोस्ती ऐसी ही होती है| गौतमराहत की साँस लेते हुए कुर्सी पर आ बैठा| दोनों सहेलियाँ अकेली ही चाय पीने चली गईं| कुदरत भी क्या रंग दिखाती है| जिस विषय में तुषार ने अपना मेडिकल शोध किया| विशेषज्ञ होकर मुम्बई में नामी डॉक्टर हुआ उसी रोग ने दीपशिखा को आ दबोचा| तभी तो इस रोग की पीड़ा से पूरीतरह वाकिफ़ है शेफ़ाली और अपनी नौकरी में से समय निकाल वह उसकी छाया बनी रहती है|

मुम्बई में गौतम की गाड़ी बाद में पहुँची तुषार पहले पहुँच गया| दीपशिखा ताज्जुब से भर उठी|

“तुम हमारे बिना यहाँ बोर नहीं हो रहे? गज़ाला, दरवाज़ा बंद करो पहले..... ‘सी आई ए’ हम लोगों के पीछे लगी है| कभी भी मार सकती है वह हमें|”

दीपशिखा फिर बहकने लगी| शेफ़ाली उसकी कमर में बाँहें डाल उसे सोफ़े तक ले आई- “तो क्यों इतनी खूबसूरत हो कि दुनिया का हर शख़्स तुम्हें न पानेके गुस्से में मार डालना चाहता है|”

शेफ़ाली ने कुछ इस लहज़े में कहा कि सभी हँस पड़े|

“थकी हो दीपशिखा..... इस इंजेक्शन से तुम्हें नींद आ जायेगी|” कहते-कहते इंजेक्शन बाँह में चुभ चुका था| थोड़ी ही देर में उसकी पलकें झपकने लगीं|

“मुश्किल समय है गौतम| दीपशिखा को अटैक आने शुरू हो गये हैं..... ऐसी स्थिति में पागलपन के चाँसेज़ भी बढ़ जाते हैं|”

“तुम तो कह रहे थे कि चेंज से फ़र्क पड़ेगा? यहाँ तो उल्टा ही हुआ| पहले कभी अटैक नहीं आया था|”

तुषार सोच में पड़ गया| ऐसाहोना तो नहीं चाहिए| लेकिन जब दिवाकर की ज्योतिष सम्बन्धी बात पता चली तो उसने माथा ठोंक लिया- “दिखाया क्यों उसे हाथ? ऐसी बातों से इसे दूर रखना है| मामला बहुत नाज़ुक है| किसी भी तरह कीउल्टीसीधी बातें दिमाग़ पर भारी प्रेशर डाल सकती हैं|”

गौतम अफ़सोस से भर उठा- आय’म सॉरी यार, बड़ीग़लती हो गई मुझसे|”

दीपशिखा गहरी नींद में थी| शेफ़ाली और तुषार के जाने के बाद वह उसे गोद में उठाकर बेडरूम में ले आया| बिस्तर पर लेटाकर चादर उढ़ा दिया|उसके नज़दीक ही बैठ गया| कैसे ठीक होगी दीपशिखा? अब क्या पूरी ज़िन्दग़ी ऐसे ही जीनी पड़ेगी? वहधैर्य खो चुका था| उसके आँसू टप टप तकिया भिगोने लगे|

समय गुज़र तो अपनी रफ़्तार से रहा था लेकिन गौतम को लग रहा था जैसे वह धीरे-धीरे, रुक-रुक कर गुज़र नहीं रहा बल्कि सरक रहा है| दिन बोझिल हो चुके थे|दीपशिखा ने पेंटिंग करना छोड़ दिया था..... वह तो लाल रंग देखकर ही डर जाती| घर से लाल रंग की हर वस्तु हटा दी गई| गज़ाला को सख़्त हिदायत थी कि वह कभी लाल रंग की पोशाक पहनकर घर न आए| कोई भी कुरियर वग़ैरह भी खुद ही साइन करके ले लिया करे क्योंकि दीपशिखा शक़ करने लगती कि उसके हस्ताक्षर पहचानने के लिए तो कहीं इस कुरियर वाले को किसी ने रिश्वत देकर भेजा है| घर में कोई भी उससे मिलने आता तो वह संदेह भरी नज़रों से उसे देखने लगती| थोड़ी देर बाद उदास सी धुन में बोले जाती- “कितनी जानें गईं, कितने घर बरबाद हुए| इस सबके पीछे किसी बड़ी साज़िश से इंकार नहीं किया जा सकता|”

दीपशिखा की मानसिक बीमारी की ख़बर न जाने कैसे मीडिया तक पहुँची और अखबार की सुर्खियाँ बन गई|लोगों ने फोन पर उसकेहालचालजानना शुरू कर दिया जिन्हें ज़्यादातर गज़ाला ही अटैंड करती| दीपशिखा के मोबाइल का सिम तुषार ने बदल देने की सलाह दी थी ताकि कोई भी उसे परेशान न करे| वह शेफ़ाली के नवजात शिशु के नामकरण के दिन अंकुर ग्रुप ऑफ़ आर्ट्स के कुछ सदस्यों से मिली थी| सैयद चचा भी आये थे| वे दीपशिखा की बीमारी से ग़मगीन नज़र आ रहे थे| बाद में वे स्टूडियो का काम छोड़कर गाँव चले गये थे|लेकिन हमेशा के लिये अपनी याद ‘आर्यन’ के रूप में छोड़ गये थे| शेफ़ाली के बेटे का नाम ‘आर्यन’ उन्होंने ही रखा था|

शेफ़ाली के बेटे के लिए एक पार्टी दीपशिखा ने भी अपने घर रखी थी| एकअच्छे से ‘गेट टु गेदर’ का इंतज़ाम टेरेस पर किया गया था| दीपशिखा ने पर्शियन व्यंजन की किताब से पढ़कर अपने हाथों से ठंडा पेय बनाया था और वेलकमड्रिंकके रूप में गुलाब की पंखुड़ियों से सजाकर मेहमानों को पेश किया था| पर कड़वे स्वाद के कारण सबने एक-एक घूँट पीकर गिलास रख दिया|दीपशिखा ने अपनी समझ से तो ठीक बनाया था..... ज़रूरगज़ाला ने ही उसमें कोई कड़वी चीज़ मिला दी थी| सबके जाने के बाद वह गज़ाला पर बरस पड़ी- “हमें मार डालना चाहती हो तुम?आज कड़वी चीज़ मिलाई है, कल ज़हर मिला दोगी तो हम क्या करेंगे? तुम अब किचन में नहीं जाओगी| खाना मैं खुद बनाऊँगी|” गज़ाला सफ़ाई देना चाहती थी पर गौतम ने उसे इशारे से मना किया| बाद में अलगले जाकर समझाया- “बीमार इंसान की बात का बुरा क्यों मानती हो? तुम तो समझदार हो?”

“लेकिनमेमसाब ने मुझ पर शक़ क्यों किया?”

“यही तो बीमारी है उनकी| हमें खुद ही समझकर रहना होगा|” दीपशिखाढेर सारी व्यंजन की किताबें ख़रीद लाई कभी पकाया तो कुछ था नहीं, आता ही नहीं था पकाना| जो भी उल्टा सीधा, कच्चापका बनाती गौतम खा लेता| तारीफ़ भी कर देता|

“बहलाते हो मुझे| ये पुलाव बना है? जले हुए चावलों का बकबका स्वाद और तुम तारीफ़ किये जा रहे हो?” दीपशिखारुआँसी हो जाती|

“अरे जानेमन, अब हम तुम्हें देखें कि पुलाव को? हमें और कुछ सूझता ही नहीं तुम्हारे सिवा|” दीपशिखा पहले तुनक जाती फिर मुस्कुराती और फिर सहम जाती|

दिनपीछे की ओर क्यों नहीं लौटते? क्यों नहीं वे खुशनुमा बातें, मुलाकातें, प्यार के हसीन लम्हे..... वे आवारा उड़ानें वापिस लौट आतीं जिनमें दीपशिखा थी और गौतम..... दीपशिखा ने अपनी मंज़िल हासिल कर ली थी और जद्दोजहद गौतम को धरातल देने की थी| दीपशिखा ने क्या कुछ नहीं किया उसके लिये पर आज वह असहाय है| कुछ कर नहीं पा रहा है दीपशिखा के लिए| वह उसकी आँखों के सामने घुल रही है और वह लाचार..... उफ़|

दीपशिखा की खूबसूरत शख़्सियत..... ब्रश और रंगों का कैनवास पर कमाल..... वो मोहक, उद्वेलितकरती उसकी चित्र श्रृँखलाएँ..... कहाँ थम गया वो सिलसिला?

“गौतम तुम्हें पीपलवाली कोठी की याद है? कोठी के वो फूलों भरे बगीचे जहाँ छुटपन में मैं शेफ़ाली के साथ तितलियाँ पकड़ती थी?”

गौतम व्याकुल हो गया, उसके बाल सहलाते हुए बोला-“याद है न..... लेकिन अब वो हमारा नहीं रहा और जो हमारा नहीं रहा उसे याद करने से क्या फ़ायदा?”

“तुम तो बड़े मतलबी निकले? क्यों न याद करूँ? मुझे तो वो बरगद का दरख़्त भी याद है जो कोठी के कोने में लगा था| वो पहले बोनसाई था|माँ ने उसे एकदम छोटे से चौकोर गमले में लगाकर उसकी जड़ों को लोहे के तारों से बाँध दिया था| वे उसे सजाने के लिये संगमरमर के सफ़ेद पत्थर भी ख़रीद लाई थीं| मुझे तो बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था कि एक क़द्दावर प्रजाति के दरख़्त को छोटे से गमले में बाँध बूँधकर- काट छाँट करके लगा दो|मैंने तो माली काका से ज़िद्द करके उसे कोठी के कोने में लगवा दिया था|हमें क्या हक़ है पेड़ों को बौना करने का|”

दीपशिखा बोलते-बोलते खुद भी थक गई थी और गौतम को भी थका डाला था| वैसे वह कमज़ोर भी बहुत हो गई है| गौतम ने ठंडे पानी में ग्लूकोज़ घोलकर पिलाया| धीरेधीरे दीपशिखा की आँखें मूँदने लगीं|

गौतम एकटक उसे देखता रहा..... दीपशिखा तुमने मुझे ज़िन्दग़ी और प्यार की तीव्र उत्तेजनाओं का एहसास कराया, अनुभव कराया| आज तुम दिमाग़ी असंतुलन के दलदल में फँसी हो| क्या करूँ मैं..... आह|

पहले दीपशिखा को ज़िन्दा लोगों को लेकर डर था, अब अदृश्य साये और भूत प्रेत के ख़याली दृश्य भी उसे डराने लगे थे| सपने में उसे पीपलवालीकोठी की जगह पीपल के विशालकाय दरख़्त और उन पर उल्टे लटके प्रेत दिखाई देने लगे| वह चौंककर जाग जाती और गौतम से बेतहाशालिपट जाती| कुछ न पूछता गौतम|जानता है पूछेगा तो न जाने क्या क्या बताने लगेगी दीपशिखा|कैसे जिये गौतम? जैसे कई-कई रातें एक साथ इकट्ठी होकर अँधेरे को बहुत अधिक पुख़्ता कर गई हों उसके जीवन में और उजाले की एक किरन की भी उम्मीद शेष न बची हो| भयानक, तेज़ आँधियाँ उसे कँपा रही हैं और वह डाल से टूटे पत्ते सा कभी इधर तो कभी उधर डोल रहा है| न ठीक से जी पा रहा है और न.....

पर ज़िन्दग़ी के अपने तकाज़े हैं..... तकाज़े न हों तो ज़िन्दग़ी कैसी? मुम्बई से बाहर ऑफ़िस के टूर में उसे जाना पड़ता है| दीपशिखा के पास चौबीसों घंटे किसी का रहना ज़रूरी है, पर वह गौतम के सिवा किसी को टिकने नहीं देती| एक शेफ़ाली है जिसे दीपशिखा हर वक़्त अपने साथ चाहती है| पर उसकी भी घर गृहस्थी..... आर्यन और प्राजक्ता की देखभाल..... नौकरी सभी में व्यस्तता है| फिर भी वह आड़े दूसरे समय निकाल कर आ ही जाती है|

पेंटिंग बनाना तो पहले ही बंद हो चुका था| अब दीपशिखा किताबें पढ़ने में खुद को व्यस्त रखने लगी है| न जाने कहाँ से किप्लिंग की ‘फेंटम रिक्शा’ उसके हाथ लग गई| जैकब और एग्निस की प्रेम कहानी| जैकबको एग्निस बहुत ज़्यादा प्यार करती थी लेकिन जैकब बेवफ़ा निकला| उसने एग्निस को अपने प्यार के जाल में फँसाकर बाद में धोखा दे दिया| उसकी बेवफ़ाई के ग़म मेंएग्निसमर गई, मर कर भूत बन गई| जब भी जैकब छोटा शिमला रोड से गुज़रता वो एक रिक्शे में एग्निस को बैठी पाता|रिक्शे से एग्निस उसे झाँककर देखती नज़र आती|कहानी दीपशिखा के दिलको छू गई| अगर गौतम उसकी ज़िन्दग़ी में नहीं आता तो वह भी एग्निस की तरह नीलकांत की बेवफ़ाई के गम में मरकर भूत बन जाती| दीपशिखा घबराकर लॉन में निकल आई| एग्निस उसका पीछा करती रही| उसे लगा सामने सड़क पर भूत रिक्शा जा रहा है और उसमें से एग्निस झाँक रही है| डर के मारे आँखें मूँदकर वह लॉन पर रखी कुर्सी पर बैठ गई| फूलों की खुशबू हवा में समाई थी|

गौतम चार दिन के टूर पर दिल्ली गया था और शेफ़ाली भी हैदराबाद में अपने चित्रों की प्रदर्शनी के लिये गई थी| दोनोंकी याद में दीपशिखा बेचैन थी| एकाएक हवाएँ तेज़ चलने लगीं| दीपशिखा घबरा गई ऐसी हवाएँ तो सूनामीके वक़्त चलती हैं..... कहीं सूनामी तो नहीं आने वाला है| गज़ाला ने पास आकर कहा- “मालकिन, खाना खा लो फिर दवा का वक़्त हो जायेगा|”

अचानक वह तमककर उठी- “दवा खिला-खिलाकर मुझे मार डालना चाहती है? सब मेरी जान के दुश्मन हो गये हैं|कोई भी मेरा अपना नहीं है|”

गज़ाला डर गई| मालकिन को फिर पागलपन का अटैक आने वाला है सोचकर वह गर्म दूध और दवा लाने किचन की ओर तेज़ी से मुड़ी|

तभी तेज़ अँधड़ में चंपा के पेड़ की डाल टूटकर गिरी..... “आ गया सूनामी..... घर जा अपने..... तेरा घर समंदर के किनारे है| खूब अच्छे से दरवाज़ा बंद कर लेना और तब तक घर से बाहर मत निकलना जब तक मैं फोन न करूँ|”

उसकी आँखें और चेहरा हमेशा की तरह सफ़ेद पड़ गया था|

“और आप?”

“मुझे क्या होगा| अमेरिका के राष्ट्रपति ने मुझे पहले ही फोन करके आगाह कर दिया है कि घर से न निकलूँ| तू भी मत निकलना|”

डर गई गज़ाला..... इस समय तो गौतम भी नहीं है, इससमय यहाँ से चले जाने में ही भलाई है| उसके जाते ही दीपशिखा ने बंगले के सारे दरवाज़े बंद कर लिये| हवाएँ साँय साँय चलती रहीं| वह बिना खाये पिये मुँहतक कंबल ओढ़े लेती रही|उसकी धड़कनेंउसे साफ़ सुनाई दे रही थीं| गला सूख रहा थापर हिम्मत नहीं थी कि पानी लेकर पिये| मोबाइल की आवाज़ ने उसे चौंका दिया| थरथराते हाथों से उसने मोबाइल थामा- “शिखा, खाना खाया?”

गौतम की आवाज़ से वह आश्वस्त हुई..... “नहीं, तुम जल्दी आ जाओ|”

“रिलैक्स प्रिंसेज़..... खाना खाकर आराम से सो जाओ| मैं आ रहा हूँ न जल्दी|”

“तुम भी खा लो, मुझे पता है तुमने नहीं खाया है|”

औरवह मोबाइल को चूमने लगी- “आई लव यू गौतम, नहीं रह सकती तुम्हारे बिना| कल सुबह तक नहीं आये तो जान दे दूँगी अपनी|”

“वो तो तं कब से दे चुकीं| मेरी बेग़म की जान मुझ नाचीज़ के दिल में समा चुकी है|”

दीपशिखा की हँसी में खनक थी| पर यह हँसी हमेशा वाली हँसी नहीं लगी गौतम को| उसे लगा जैसे कुछ छूट रहा है कुछ अपना बहुत अज़ीज़..... घबरा गया वह..... ये क्या सोचने लगा? क्यों सोचने लगा? कहीं ये नियति का संकेत तो नहीं? सारी रात वह करवटें बदलता रहा लेकिन चाहकर भी वह तीन दिन से पहले नहीं पहुँच पायेगा मुम्बई|

गौतम के फोन रखते ही दीपशिखा पलँग से उठकर टहलने लगी थी| उसे लगा जैसे एग्निस की रूह की तरह वह हलकी होकर हवा में तैर रही है| रूह के क़ातिल कई सारे चाकू, खँजर उसकी ओर बढ़ रहे हैं..... कभी वह माँ की गोद में सर छुपा लेती है, कभी गौतम के सीने में| दंगाई उसे चारों ओर से घेर चुके हैं,उनकेहाथों में जलती मशालें हैं| अचानकदंगाईयों के चेहरे नीलकांत के चेहरे में परिवर्तित होने लगे| दीपशिखा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा| उसनेपलँग पर लेट कर अपना चेहरा तकिये में छिपा लिया..... अंतिम सहारे के लिए|

आख़िर‘गौतम शिखा’ कुटीर से सरकारी ताला हटा लिया गया| तीन दिन तक लावारिस पड़े बंगले में जब दीपशिखा का अन्तिम संस्कार करके गौतम ने शेफ़ाली और तुषार के साथ कदम रखा तो एक मनहूस सन्नाटा बंगले को अपनी गिरफ़्त में लिये था| गौतम का बंगले के फर्श पर पड़ता हरक़दम आँसू बनकर उमड़ रहा था उसकी आँखों में| बयालीस साल की छोटी सी उम्र और मात्र दस वर्षों का साथ|दीपशिखा सचमुच दीप की शिखा के समान उसके अँधेरों को उजाला सौंप विलीन हो गई|

दीपशिखा की बड़ी सी तस्वीर के सामने जलता दीपक और लाल कपड़े से बँधा अस्थि कलश..... इतनी सी ज़िन्दग़ी के इतने बीहड़ रास्ते..... इतनी उठापटक..... इतनी नफ़रत, दुश्मनी..... गौतमदीवानपर बुत बना बैठा था| गज़ाला ने पूरा बंगला धोया था और अब सबके लिये चाय बना रही थी| दीपशिखा और गौतम के दोस्त एक-एक कर आना शुरू हो गये थे|बारह बजे अस्थि विसर्जन होगा| शेफ़ालीवाल्केश्वर में बाणगंगा के तालाब में अस्थिपुष्प विसर्जित करना चाहती थी लेकिन गौतम ने वर्सोवा जाना तय किया- “दीपशिखा ये सब कर्मकांड नहीं मानती थी| वह कहती थी समुद्र से अधिक पावन पवित्र तो कहीं का जल हो ही नहीं सकता| सारी नदियाँ समुद्र में ही तो आकर मिलती हैं|”

तुषार वर्सोवा जाकर पहले से एक नाव तय कर आया था| अस्थिकलश लेकर जब सब वर्सोवा पहुँचे, आसमान पर बादल घिर आये थे और समुद्र की लहरें काफ़ी तेज़ उछल रही थीं जैसे तूफ़ान आने वाला हो| नाव मछुआरों वाली थी| एक नाव में छै: से ज़्यादा लोग बैठ ही नहीं सकते थे| गौतम बैठा नहीं बल्कि कलश लिए खड़ा रहा| नाव हिचकोले खाती समुद्र पर तैर रही थी| शेफ़ाली को डर था कहीं गौतम गिर न जाए लेकिन उसने अपने को डाँवाडोलहालत में भी खूब साध कर रखा| तीन कि.मी. तकनाव खेने के बाद केवट ने चप्पू चलाने बंद कर दिये| कलश गौतम, तुषार, शेफ़ाली और सना ने पकड़ कर लहरों में छोड़ दिया| कलश ने डगमग डोलकर एक गोल परिक्रमा की और धीरे-धीरे जल में समाता चला गया| गौतम ने अंजलि में जल लेकर डबडबाई आँखों से छुआया और तुषार के कंधे पर अपना सिर टिका दिया- “मैंबिल्कुल अकेला रह गया तुषार|”

तुषार और शेफ़ाली उसकी पीठ थपथपाते रहे|नाव दीपशिखा के बिना तट की ओर लौटने लगी| अचानक काले सफेद पर वाले परिंदे क्वें-क्वें की तीव्र आवाज़ करते लहरों पर मँडराने लगे| उनमें से एक की चोंच में वह लाल कपड़ा था जो कलश के मुँह पर बाँधा गया था| लहरेंउसे किनारे की ओर ले आई थीं और अब वह परिंदे की चोंच में दबा था|

“दीपशिखा लाल रंग से डरती थी| अपने अन्तिम सफ़र में भी वह लाल रंग संग नहीं ले गई|”

गौतम देर तक तट पर खड़ा रहा| जैसे मेला ख़तम हो जाने के बाद मेले में लुट चुका मुसाफ़िर हो|

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समाप्त

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