लौट आओ दीपशिखा - 10

लौट आओ दीपशिखा

उपन्यास

संतोष श्रीवास्तव

अध्याय दस

शेफ़ाली और दीपशिखा अब रोज़ आयेंगी यह जानकर सैयदचचा की बाँछें खिल गई थीं| वैसे भी वे दिन भर स्टूल पर बैठे-बैठे तम्बाखू फाँकते थे और ऊँघते थे| अब रौनक रहेगी|

दो महीने देखते ही देखते बीत गये| कलाकुंभ का दिन भी नज़दीक आ गया| केरल जाने की पूरी तैयारी हो चुकी थी| शेफ़ाली ने बताया था- “मालूम है दीपू..... केरल में बहुत लार्ज स्केल मेंकलाकुंभ का आयोजन हो रहा है| सात जगहों पर प्रदर्शनी का इंतज़ाम है| कुछ चित्रों को पब्लिकप्लेसेज़ में भी रखा जाएगा ताकि आम आदमी भी चित्रकारों से रूबरू हो सके|”

“पता है, मेरे पास भी सना का फोन आया था| ये तो लक की बात है कि हमारा एक शुभचिंतक वहाँ मौजूद है तो सारी खबरें पता हो रही हैं| सना का हनीमून पैकेज कितने दिन का है|”

“पूरा केरल घूमेंगे वो लोग, एकहफ़्ते में लौटेंगे|” कहते हुए शेफ़ाली अपने चित्रों कोफाइनल टच देने लगी| सना फिर फोन पर थी- “काम करने दोगीकिनहीं?”

“मैं तो चकरा गई हूँ भाभी|अपने पर कोफ़्त हो रही है| काश मैं भी भाग ले पाती| एक से बढ़कर एक नामी कलाकार आ रहे हैं| कोच्चि के किले के परेड ग्राउंड में इंस्टॉलेशन का काम पूरा हो चुका है|”

“ओ.के...... मियाँ के साथ नहीं है क्या?”

“वोबाथ ले रहा है| तुम मेरी एक्साइटमेंट नहीं समझ सकतीं| मुजीरिस समुद्र के किनारे पुराने बंदरगाह में जो प्राचीन किला है न, उसके दरबार हॉल का रीकंस्ट्रक्शन कियागया है इसी कलाकुंभ के लिए|पेपर हाउस, पुराना डच स्टाइल का बड़ा बंगला और सोलह हज़ार वर्ग फ़ीटकाउसका कोर्टयार्ड आर्टिस्टों के स्टूडियो तथा रहने के लिए इस्तेमाल किया जायेगा| तुम्हारा और दीपशिखा का वहीं इंतज़ाम है रुकने का|”

“सना..... तुम्हारा मियाँ नहा चुका होगा| उसके लिए कबाब ऑर्डर करो|”

“क्यों छेड़ रही है बेचारी सना को, ला फोन मुझे दे|”

दीपशिखा देर तक सना से वहाँ के हालचाल पता करती रही| फिर शेफ़ाली से बोली- "दो दिन बाद हमारी फ़्लाइट है|कल पूरा दिन हम आराम करेंगे और परसों पैकिंग|”

“हाँ यार, एक बड़ा बॉक्स तो मेरे चित्रों का ही होगा| तीन महीने रुकना है| विदेशी चित्रकारोंके बीच चर्चाएँ, वार्ताएँ, सेमिनार, प्रेज़ेंटेशन और लाइव परफॉरमेंस..... ड्रेसेस भी अच्छी रखनी पड़ेंगी|”

“थोड़ी शॉपिंग भी ज़रूरी है..... कल शाम मिलते हैं हम| सैय्यद चचा..... तीन महीने के लिये बिदा| कल ड्राइवर आयेगा| आप हमारे ये बॉक्स गाड़ी में रखवा देना|”

“अच्छाबिटिया..... बेस्ट ऑफ़ लक़|” सैय्यद चचा सेल्यूट की मुद्रा में खड़े हो गये|

रात को दीपशिखा ने सुलोचना को फोन लगाया| वेबार-बार नाराज़ीवश काटती रहीं लेकिन अंत में माँ का दिल..... हाँ, बता दीपू, क्यों परेशान कर रही है?”

दीपशिखा ने कलाकुंभ की एक-एक बात विस्तार से बताई| दीपशिखा की इस सफलता से सुलोचना ने आवाज़ दी-“यूसुफ़..... सुना तुमने हमारी बेटी चोटी की चित्रकार हो गई है.....” फिर जाने क्या हुआ वे फोन पर ही रो पड़ीं और यह बात गौतम को बताते हुए दीपशिखा भी रोती रही| गौतम उसके बाल सहलाता रहा, आँसू पोंछता रहा- “बस करो शिखा (वह उसे अब इसी नाम से संबोधित करता था) तुम्हें एक बड़े मिशन को सफल बनाना है| सोने की कोशिश करो वरना तबीयत बिगड़ जायेगी|”

गौतम के प्यार ने उसे ऊर्जा से भर दिया था और इसी ऊर्जा के सहारे तीन महीने कलाकुंभमें भागीदारी करके जब वह शेफ़ाली के साथ मुम्बई लौटी तो खिले पुष्प सी ताज़गी उसके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रही थी गौतम को|

दीपशिखा का घर द्वार सम्हालने वाली गज़ाला ने फोन की लम्बी लिस्ट लाकर दी- “आपकी ग़ैर हाज़िरी में जो फोन आये थे..... आपका इंटरव्यू लेने के लिए ये दिवाकर जी कल का ही अपॉइन्टमेंट माँग रहे थे|”

“ठीक है..... तुम जाओ..... मैं देख लेती हूँ|”

आलस्य के मूड में थी दीपशिखा| गौतम की इच्छा ऑफ़िस जाने की बिल्कुल नहीं थी पर अभी ही उसे खपोली के लिए निकलना है- “कोशिश करूँगा जल्दी आने की|”

गौतम के जाते ही दीपशिखा बिस्तर पर लेट गई| देर तक सोती रही| शाम को नहाकर उसने पीली एम्ब्रॉयडरी वाली काले रंग की अनारकली ड्रेस पहनी..... बाल खुले छोड़ दिये और लॉन में आते हुए गज़ाला को चाय का ऑर्डर दे दिया| गौतम तयशुदा समय से पहले ही आ गया| दोनों लॉन में बैठकर चाय पीने लगे|

“क्या बात है प्रिंसेज़..... आज तो मुग़ल शहज़ादी लग रही हो|”

“शहज़ादी तो मैं हूँ, अपनेपापा यूसुफ़ ख़ान की.....”

जैसे मन से आवाज़ निकली हो..... उसके दिल की धड़कनों ने पापा पुकारा हो..... इसवक़्त? क्यों..... क्यों उन तक पहुँचने के लिए वह तड़प उठी|

“क्या हुआ..... कुछग़लतकह गया मैं?”

“नहीं गौतम..... अचानकपापायाद आ गये| जब मुझे कुछ हासिल होता है तो मैं बड़ी शिद्दत से उसे माँ पापा के संग शेयर करना चाहती हूँ..... उनकी शाबाशी चाहती हूँ पर.....”

दो दिन बाद सूचना मिली यूसुफ़ ख़ान को दिल कादौरा पड़ा है और वे सीरियस हैं| गौतम के साथ बिना शादी कियेरहने के कारण लगभग डेढ़ साल से दीपशिखा उनकी नाराज़ी झेल रही थी औरइसी नाराज़ी के कारण वह पीपलवाली कोठी नहीं जा पाई थी| लेकिन यूसुफ़ ख़ान की बीमारी का सुन वह अपने को रोक नहीं पाई “मैंने कहा था न गौतम..... पापा मुझे शिद्दत से याद आ रहे थे दो दिन से|”

गौतम ने उसे तसल्ली दी- “कुछ नहीं होगा| पहुँचते ही सारे हालचाल तुरन्त बताना|”

सुलोचना उससे लिपट कर रो पड़ीं- “यह क्या कर डाला तूने? हम क्या शादी के लिये मना करते? मैंने तो खुद गौतम से कहा था| तभी से तेरे पापा गुमसुम रहने लगे थे|

“माँ..... मुझे माफ़ कर दो| मैं ऐसी ही हूँ माँ|” दीपशिखा भी रोने लगी| रोते-रोते ही ‘आई सी यू’ में पापा को देखने गई| नालियोंसे पटा पड़ा शरीर| नाक पर ऑक्सीज़न मास्क| दीपशिखा ने हाथ जोड़े- “पापा..... मुझे माफ़ कर दीजिए|”

दीपशिखा को लगा पापा ने पलकें झपकाई हैं| लेकिन वह जीवन की अन्तिम हरक़त थी| वे काँपे और फिर स्थिर हो गये|

पीपलवाली कोठीसदमे में डूब गई| दीपशिखासुलोचना को अपने साथ मुम्बई लाना चाहती थी लेकिन सुलोचना ने इंकार कर दिया| वे दीपशिखा से अब नाराज़ नहीं थीं| कई बार उन्होंने उसकी ज़िद्द के आगे घुटने टेके हैं लेकिन इस वक़्त वे यूसुफ़ के बिना जिस पीड़ा से गुज़र रही थीं उसमें कोठी में रहना वे उचित समझती थीं|

“माँ..... अकेलेपन में तुम पापा को बहुत अधिक मिस करोगी|”

“नहीं दीपू..... वो तो मुझसे दूर गये ही नहीं| शरीर से वे मेरे साथ नहीं हैं..... दीपू, आँसूमेरी आँखों में थम गये हैं पर मैं तरबतर हूँ उन आँसुओं से| मुझे सब कुछ महसूस करने दो|”

दीपशिखा ने जिस प्यार को पाने के लिए तीन बार तक़दीर के दरवाज़े खटखटाये, उस प्यार को माँ ने एक ही बार में पा लिया| उसने माँ की गोद में सर रखदिया- “माँ, क़ाश मैं गौतम से शादी कर पाती| लेकिन माँ..... जब तक इंसान और दूसरे बंधनों में है..... आज़ाद नहीं है..... तो वह कैसे एक और बंधन में बँधे| माँ..... मैं चित्रकला के बंधन में जकड़ी हूँ, आज़ाद कहाँ हूँ?”

सुलोचना उसके बालों में उँगलियाँ फेरती रही- “तुम्हारे पापा भी लेखक थे| हाँ, मैं जानती हूँ वे वैवाहिक ज़िम्मेवारियाँपूरी तरह नहीं उठा सके लेकिन फिर भी हम खुश थे|”

“लेकिन माँ वे पुरुष थे, मैं स्त्री..... क्या ये अंतर हमारी स्थितियाँ स्पष्ट नहीं करता?”

सुलोचना को हथियार डालने पड़े| दीपशिखा के तर्क अकाट्य थे|

कर्मकांड की तमाम विधियाँ सम्पन्न होने के बाद मजबूरी में दीपशिखा को सुलोचना को अकेला छोड़कर मुम्बई लौटना पड़ा- “माँ..... डर रही हूँ यहाँ से जाते हुए..... माँ, मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती| वादा करो, मेरे लिए खुद को सम्हालोगी|”

सुलोचना ने उसे कलेजे में भींच सा लिया| पीपलवाली कोठी दीपशिखा के जाते ही सन्नाटे में डूब गई|

यूसुफ़ ख़ान की मृत्यु ने दीपशिखा के मन में गहरी उदासी भर दी थी| ज़िन्दग़ी की तमाम बातों को वह पूरा ज़रूर कर रही थी पर मन में जैसे एक खेद सा बना हुआ था| लगता था इतनी उपलब्धियों के बावजूद वह जहाँ की तहाँ हैं क्योंकि उसके पापा उसके साथ नहीं हैं| वह जिनकी वजह से इस दुनिया में आई जब वे ही नहीं रहे तो किस काम की ज़िन्दग़ी| अब डर सुलोचना को लेकर भी था|छै: महीने गुज़र गये यूसुफ़ख़ान को गये लेकिन सुलोचना की तबीयत सुधरने के बजाय दिन पर दिन गिरती जा रही है| कहीं वे भी..... वह घबरा गई|गौतम कंपनी के काम से बेंग्लोर गया था..... दिन ज़्यादा लग सकते थे इसलिये उसने दीपशिखा को पीपलवाली कोठी चली जाने की राय दी| दीपशिखा भी यही चाहती थी|

पीपलवाली कोठी का सन्नाटा देख दीपशिखा का मन रो पड़ा| हर वक़्त गुलज़ार रहने वाली कोठी यूसुफ़ख़ान के वियोगमें सहमी सी नज़र आ रही थी| सुलोचना बहुत दुबली लग रही थीं- “ये क्या हाल बना रखा है माँ? क्या मुझे भी मरा मान लिया|”

सुलोचना ने उसके होठों पर अपनी हथेली रख दी| कहा कुछ नहीं बस रोती रहीं| थोड़ी देर बाद दीपशिखा ने टी.वी. ऑन कर दिया- “माँ, टी.वी. ऑनरखा करो| अकेलापन महसूस नहीं होता..... मैं तुम्हारे मनपसन्द गानों की सी.डी. तैयार करवा के लाई हूँ, कुछअच्छी फिल्मों की सी.डी. भी लाई हूँ| तुम्हें पसंद आयेंगी|”

उसने सुलोचना के बालों में तेल लगाते हुए कहा|

“टी.वी. में कितने बोर प्रोग्राम आते हैं..... देखने का मन भी नहीं करता|”

“देखने को कौन कह रहा है, बस चलने दिया करो| आवाज़ें सुनाई देती हैं तो घर भरा-भरा सा लगता है|”

सुलोचना के चेहरे पर अरसे बाद हँसी भोर में चिटख़ी कली सी तैर गई| अब उनकी बेटी बहुत गहरी बातें करने लगी है| जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है बुज़ुर्ग बच्चे हो जाते हैं और बच्चे बुज़ुर्ग|

“माँ जो छूट जाता है उसके लिये समझ लेना चाहिए कि बस इतना ही साथ लिखा था नियति ने| हमेंउतने साथ का शुक्रिया अदा करना चाहिए उस अदृश्य शक्ति के प्रति जो एक दरवाज़ा बंद करती है तोदूसरा खोल भी देती है|” हँसने लगी दीपशिखा..... “अब देखो न दाई माँ और महेश काका चले गये तो हंसा बेन और रतीलाल जैसेसेवकमिल गये न|”

सुलोचना भी हँसने लगी- “हंसाबेन के हाथ की मसाला चाय पी लो, बहुत अच्छी बनाती हैं|”

“नहीं माँ..... मन नहीं है..... तुम पियोगी?”

“जब तुम पियोगी दीपू|” कहते हुए वे तिरछी होकर सोफ़े पे पाँव फैलाकर बैठ गईं|

“माँ, गौतमने मुझे गहरे अवसादसे निकाला है वरना मैं अपने अँधेरों में डूब ही चुकी थी| छूट चुके लोगों से जुड़ी यादें..... पापा को लेकर मन की गाँठ..... उफ़, जैसेकाले गहरे समुद्र पर छायी काली घनघोर घटाएँ|”

दीपशिखा की आँखों में नमी छलक आई थी| अचानक रतीलाल दौड़ा आया- “मालकिन, दंगे छिड़ गये हैं|खूब मारा मारी चल रही है| सुना है रामभक्तों को ट्रेन के डिब्बे में बन्द कर जी ज़िन्दा जला दिये जाने की घटना घटी थी बस वही गुस्सा दंगे के रूप में भड़का है|”

दीपशिखा ने तुरन्त टी.वी. पर समाचार चैनल लगाया| खबरें आ रही थीं- “अयोध्या में राम नाम का पत्थर राममंदिर में चुनकर आये रामभक्तों की ट्रेन जलानेका मुद्दा ही साम्प्रदायिक दंगों के भड़कने की वजह बन गया है|” क्लिपिंग में धुआँ, जले हुए प्लास्टिक, कपड़े, रस्सी, काग़ज़ के उसी आकार में जले हुए दृश्य..... मस्जिदके गुंबदों पर केसरिया पताकाएँ लहरा रही थीं|

गौतम ने फोन किया- “क्या हाल हैं वहाँ के? इसक़दर तेज़ी से गुजरात के हालात बदले हैं कि समझ में नहीं आ रहा क्या होगा? दीपशिखा, पुलिस सुरक्षा माँगो| तुम्हारी कोठी निशाने पर न आ जाए कहीं|”

हिल उठी दीपशिखा| मुस्लिम पुरुष से हिन्दू स्त्री के विवाह के कारण वैसे भी विवादों में घिरी रही कोठी..... उस पर दीपशिखा का विवादास्पद जीवन|

“हाँ..... मैं बात करती हूँ पुलिस थाने से| तुम फोन रखो गौतम|”

गौतम के फोन रखते हीशेफ़ाली का फोन- “दीपू, तू पारिख अंकल से बात कर, सुरक्षा माँग.....”

शेफ़ालीने इस वक़्त पारिख अंकल का नाम सुझा कर दीपशिखा को बहुत बड़ा संबल दे दिया मानो| वे तो पापा के दोस्त हैं| उनके मातहत पूरा पुलिस महक़मा है|

दीपशिखा ने पारिख अंकल को फोन लगाया|इंगेज..... इंगेज..... कभी नेटवर्क नहीं पकड़ रहा तो कभी सीमाक्षेत्र से बाहर| जैसे तैसे फोन लगा- “हाँ, कहिए भाभीजी|”

“अंकल, मैं दीपशिखा..... आप तो जानते हैं पापा के जाने के बाद हम बिल्कुल बेसहारा हो गये हैं| अंकल, हालात को देखते हुए प्लीज़ हमें पुलिस सुरक्षा दीजिए|”

पारिख अंकल सोच में पड़ गये|कहाँ से दें सुरक्षा? पूरी पुलिस फोर्स तो शहर के हालात काबू करने में लगी है| उन्होंने धीरज बँधाया- “घबराओ नहीं दीपशिखा| किसी भी बात का अंदेशा हो तो मेरे प्राइवेट मोबाइलपर कॉल करना या एस एम एस करना..... नंबर लिख लो|”

दीपशिखा ने दौलतसिंह, हंसाबेन और रतीलाल को नौकरों के क्वॉर्टर में नहीं बल्कि हॉल में सोने को आदेश दिया|कोठी का हर एक दरवाज़ा अंदर से लॉक किया गया और सुरक्षा के लिए डंडे, पत्थर, चाकू, मिर्च पावडर भी हॉल में इकट्ठा किया गया| दौलतसिंह आधी रात तक पहरा देगा उसके बाद रतीलाल|दीपशिखा सुलोचना के कमरे में ही रही| गौतम का हर घंटे फोन आ जाता| लगभग दो बजे रात को पारिख अंकल ने भी फोन करके हालात पूछ लिए|

सुबह तक पूरा गुजरात बुरी तरह दंगे की चपेट में था| कई जगह दरगाहें तोड़कर वहाँ हनुमान और शिवलिंग के नाम से पत्थर रख, सिंदूर और चंदन की रेखाओं से पोतकर फूल चढ़ा दिये गये थे| बदले में कुछ ने उन दुकानोंको कैरोसिन से नहलाकर जला दिया था जिसमें गणपति पूजा और मकरसंक्रांतिके समय बिकने वाला पूजा का सामान, पतंगें रखी थीं|गुनाहगार कौन है| मरने वाले मुसलमानों केख़िलाफ़ दंगाइयों का ऐलाने जंग या कारसेवकों को ज़िन्दा जला दिये जाने के ख़िलाफ़ छिड़ा धर्मयुद्ध?

एक-एक कर दिन सरक रहे थे..... जैसे न जाने कितनी सदियों की थकान से भरे हों और गुज़र जाना मुश्किल लग रहा है| अख़बारों की सुर्ख़ियाँ दीपशिखा को भयभीत किये थीं| दुधमुँहे बच्चों पर कहर..... साम्प्रदायिकता की आग ने इन्हें भी नहीं बख़्शा| चहल-पहल से भरे घर के दरवाज़े बंद कर पानी भरदिया तमाम घरों मेंऔर उसमें बिजली काकरेंट दौड़ा दिया| एक ही झटके में बीस लोग मर गये, सब एक ही परिवार के..... दीपशिखा पत्ते सी काँप उठी| ऐसा जघन्य कृत्य करने वाले क्या उसके जैसे ही इंसान थे या इंसान के वेश में नरपिशाच? औरतों के कटे हुए स्तनों से भरे पैकेट..... नन्हे बच्चे की आँखों के सामने चाकू भोंक-भोंक कर मारे गये उसके माँ-बाप, भाई-बहन..... ज़िन्दा जलाए जाते मर्द| एक औरत देह को चीथतेदस-दस आदमज़ात भेड़िये और शर्त बदते लोग- “आज मुसलमान ज़्यादा मारे जायेंगे| नहीं, हिन्दू मारे जाएँगे..... लगी शर्त पचास हज़ार की|” और शर्त लगाते लोगों द्वारा ही छेड़े गये दंगे..... मुँह पुलिस का भी रुपियों से ठूँसा गया..... तभी तो वह निठल्ली खड़ी देखती रही|

नहीं..... कुछ नहीं करेंगे पारिख अंकल| इस कोठी की और माँ की हिफ़ाज़त मुझे ही करनी होगी..... अगर पारिख अंकल की पुलिस फोर्स कुछ कर पाती तो इतनी बर्बरता क्यों होती? समाजसेवी, दंगा पीड़ित इसे आतंकवादी कार्रवाई कह रहे हैं| यह कट्टरपंथियों का ऐसा वहशी गिरोहथाजिसने धार्मिक चश्मे पहन बर्बरता का विभाजन की त्रासदी से भी भीषण कीर्तिमान स्थापित किया था| यह मानो एकसधे हुए गिरोह का योजनाबद्ध काम था| ट्रकों में भरकर दंगाई आते..... उनके हाथों में हथियारों के साथ मोबाइल फोन भी होते जिससे वे पल-पल की ख़बर अपने बॉस को देते, बॉस जैसा निर्देश देते वे वैसा ही कर गुज़रते|

सुलोचना की तबीयत कल रात से ज़्यादा ख़राब हो गई थी| तेज़ बुख़ार और हाई शुगर लेवलके कारण मानो मूर्छा में थीं वे|डॉक्टर को बुलाया जाये भी तो कैसे? कर्फ्यूऔर भड़के हुए दंगे| दीपशिखा पुरानी लिखी दवाईयों के सहारे ही उन्हें ठीक करने की कोशिश कर रही थी| हंसाबेनपरहेज़का खाना लगभग सभी के लिये बना लेतीं|इस वक़्त इन सब कामों में ध्यान देने से बेहतर है सुरक्षा के उपाय सोचे जाएँ| सूरज ढलते ही दौलतसिंह और रतीलाल कोठी के आसपास का मुआयना कर लेते|गझिन हरियाली में डंडा ठोंक-ठोंक कर पड़ताल करते| कोठी तीन ओर से सात फुट ऊँची दीवारों से घिरी थी| दीवार की मुँडेरों पर काँच के नुकीले टुकड़े थे| लोहे का भारी-भरकम गेट जिसे दो आदमी ढकेलकर बंद कर पाते| जामुन, कटहल, मौलश्री, नीम के दरख़्तों की छतनारी डालियाँ जो पहले खूबसूरत लगती थीं अब भयावह लगने लगी थीं|क्या पता उनमें ही दंगाई छुपे बैठे हों| कोठीके बगल में ही नई इमारत बन रही थी| नींव ही खुदी थी कि दंगे भड़क गये| हर तरफ़ सन्नाटा तारी था| देश की आज़ादी के संग हिन्दू मुसलमानों के बीच हिन्दुस्तान, पाकिस्तान खड़ा कर अँग्रेज़ जाते-जाते भी अपनी ज़ात दिखा गये जबकि अपने देश को आज़ाद करने में दोनों का खून बहा था|और विभाजन की उस त्रासदी से भी बढ़-चढ़कर है गोधरा कांड..... सामूहिकक़त्लेआम, लूटपाट..... जो नादिरशाह, तैमूर, अहमदशाह अब्दाली की क्रूरता से भी दस क़दम आगे है| वे तो पराये देश से इस देश को लूटने आये थे| धनबटोरने और खूबसूरत भारतीय स्त्रियों से अपना हरम सजाने..... लेकिन ये..... अपने ही देश को लूटते, अपने ही लोगों को क़त्ल करते, अपनी ही माँ बहनों से बलात्कार करते..... कौन हैं ये? किस देश के नागरिक? किस धर्म के पालक? दीपशिखा करवटें बदलती रही| हर बार औरत ही सज़ा भुगतती है हर अत्याचार की, हर दंगे की, हर लड़ाई, हर उत्पीड़न की? अपनी कोख में पल रहे बच्चे के लिये दंगाइयों के सामने दया की भीख माँगती गर्भवती औरत| ओह, दंगाइयोंमें से एक ने अपनी तलवार उस औरत के पेट में घुसा कर उसकी कोख फाड़ डाली और उसका आठ महीने का शिशु हवा में उछाल कर तलवार की नोक पर लोक लिया|नर्म माँस का..... हिलता डुलता शिशु तलवार की धार में धँसता चला गया|

“गौतम, मैं पागल हो जाऊँगी| ये सब क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है?” दीपशिखा की आवाज़ काँप रही थी जबकि गौतम उसे खुशखबरीसुना रहा था- “मत सोचोजिस पर हमारा वश नहीं उसे मत सोचो| हम कुछ नहीं कर सकते| सुनो..... मेरी अमृता शेरगिल..... कोलकाता के एक लेखक तुम्हारा इंटरव्यू लेने वाले हैं| वे चुनिन्दा चित्रकारों के इंटरव्यू की एक किताब संपादित कर रहे हैं| जैसे ही हालात नॉर्मल हों तुरन्त लौटना है तुम्हें|”

हालात बेहतर होते तो दीपशिखा के लिये ये ख़बर वाक़ई खुशखबरी होती..... पर| सुलोचना शायद पानी के लिये कुनमुनाईं थीं| दीपशिखा ने फोन कट किया और पानी देने को ग्लास की ओर बढ़ाया ही था कि कुछ फुसफुसाहटें सुनाई दीं| हंसाबेन दबे पाँव उसके पास आई और कानमेंधीरे से कहा- “बाहरकिसी के चलने की आवाज़ें हैं..... होशियार रहिए|”

दीपशिखा सन्न रह गई| हाथसेगिलास छूटते-छूटते बचा| दौलतसिंह की ओर से ख़बर थी कि कुछ लोग दीवार फाँद कर घुस आये हैं..... दंगाई ही हैं| अब क्या होगा?

फुसफुसाहटेंतेज़होगईं- “निकालो दोनों को बाहर..... हमारेइस्लामके नाम पर धब्बाहैं ये| यूसुफ़ ख़ान को ज़िन्दग़ी भर चूसा है इस हिन्दू कुतिया ने|”

थर-थर काँप रही थी दीपशिखा| सुलोचना फटी-फटी आँखों से दरवाज़े को ताक रही थीं| कोठी को मज़बूत दरवाज़े, खिड़कियाँ और हॉल में रखा सुरक्षा का सामान..... दरवाज़ाज़ोर-ज़ोर से पीटे जाने पर भी खुल नहीं रहा था| दीपशिखाने डरते-काँपते पारिख अंकल को फोन पर स्थिति की भयावहता बताई| एक मुसलमान के हिन्दू दोस्त ने उनका परिवार बचाने के लिए दस मिनट में ही पुलिस फोर्स भेज दी| आधे घंटे बाद खुद आये-

“वो आये कहाँ से दीपशिखा जबकि तुम्हारे सेवकों ने कोठी की सुरक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी थी|"

“साऽब..... बगल में खुदी पड़ी नींव में वे दिन में ही छिप गये थे| बस, नींवें ही हम नहीं देख पाये थे|” दौलत सिंह का संदेह एकदम सही था| रात के दो बजे थे और अब कोठी पूरी तरह सुरक्षित थी| पारिख अंकल ने राय दी- “भाभीजी, आप और दीपशिखा ये जगह छोड़ दीजिए, कभी भी कुछ भी हो सकता है| सब कुछ शांत हो जाने पर लौट आईयेगा| मैं आपको पुलिस सुरक्षा में एयरपोर्ट पहुँचा देता हूँ| आप मुम्बई चले जाइए|”

सुलोचना रो पड़ीं- “पारिख भाई..... हमने किया क्या है? ये किस बात की सज़ा हमें मिल रही है?”

पारिख अंकल तसल्ली बँधाते रहे- “ये वक़्त ही बेरहम है भाभी..... खुद को मत कोसिए|”

हंसा बेन चाय बना लाई थी| दीपशिखा ने कहा-“अदरकडाली है चाय में? अंकल को अदरक़ वाली चाय पसंद है|” सब हँस पड़े| सदमे में गुज़र रही कोठी पर भी मानो मुस्कुराहट तैर गई|

दूसरे दिन रात की फ़्लाइट से दीपशिखा और सुलोचना मुम्बई आ गईं| पीपलवाली कोठी नौकरों के भरोसे थी और नौकर खुद को कोठी की मज़बूत घेराबंदी में क़ैद कर भगवान भरोसे थे|

दीपशिखा गौतम से लिपट फूट-फूट कर रो पड़ी| दंगों की हैवानियत का असर उसके दिमाग़ पर बुरी तरह था|तेज़ी से घटी घटनाओं ने उसे मथ डाला था| अचानक यूसुफ़ ख़ान का जाना, सुलोचना की बीमारी ने उन्हें लगभग बिस्तर पर ही डाल दिया था| दंगे..... दंगों की ज़द में पीपलवाली कोठी का भी शुमार होना|

“गौतम, तुम तो मुझे छोड़कर नहीं जाओगे न?” वहक़ातर हो गौतम की बाहों में झूल गई|

“ए पगली..... गौतम दुनिया छोड़ देगा पर तुम्हें नहीं| हम देर से ज़रूर मिले पर मिले यही क्या कम है?”

थोड़ी देर में डॉक्टर आ गया| सुलोचना का चेकअप कर दवाईयाँ लिखदीं- “डायबिटीज़ बहुत ज़्यादा है| बहुत अधिक परहेज़ से रहना होगा वरना पैरालाइज़्ड.....”

“नहीं ऽऽऽ” चीख़ पड़ी दीपशिखा| गौतम उसे दूसरे कमरे में बैठा आया| गज़ाला को दवा लाने भेजकर गौतम ऑफ़िस के लिए तैयार होने लगा| जाते जाते सख़्त हिदायत देता गया- “दीपशिखा, तुम टी.वी. तो हरगिज़ नहीं देखोगी, न्यूज़ चैनल तो बिल्कुल नहीं| आराम करो, गज़लें सुनो और माँ से बातें..... मैं जल्दी लौट आऊँगा|”

दीपशिखा ने नन्ही बच्ची की तरह सिर हिलाया पर पीपलवाली कोठी में घुस आये दंगाईयोंकी दरवाज़े पर की गई ठक्-ठक् उसके दिमाग़ में घुस चुकी थी| गज़ाला ने खाना टेबिल पर लगा दिया| सुलोचना दवाई केसुरूर में नीमबेहोशसी थीं| नहीं खाया गया दीपशिखा से| दोपहर को किन्ही रघुवीर सहाय का फोन था इंटरव्यू के सिलसिले में.....

“हाँ, बताया था गौतम ने| दो दिन बाद का रखते हैं| अभी तो मैं गोधरा कांड की विभीषिका से उबरने की कोशिश में लगी हूँ|”

फिर देर तक गोधरा कांड पर ही चर्चा करते रहे| इस बातचीत ने दीपशिखा को काफी राहत दी| लगा कि दिल का बोझ थोड़ा हलका हुआ है|

रघुवीरसहाय काफी गंभीर, सुलझा हुआ व्यक्ति था| उसने दीपशिखा से इन्टरव्यूके दौरान उसकी निजी ज़िन्दग़ी पर एक भी सवाल नहीं किया| वह सारी बातें रिकॉर्ड कर रहा था| गौतम पास ही बैठा था| दीपशिखा ने बतायाकि पहले वो रोमन, ग्रीक और ब्रिटिश चित्रकला को ही वरीयता देती थी लेकिन ज्यों ही हुसैन के चित्रों में बोल्ड और सघन रेखाओं से वह परिचित हुई वह उनकी मुरीद बन गई| मोहन सामंत के ऐब्स्ट्रेक्टचित्रों का ट्रीटमेंट भी बहुत असरदार लगता है लेकिन अब पूर्णतया अमृता शेरगिल को ही अपना आदर्श बना लिया है| उनके चित्रों में भारतीय देहातों की जीवंतता और प्रकृति से उनकी जुगलबंदी काबिले तारीफ़ है|

“और आपके चित्र? आपकी प्रदर्शनियाँ?”

“पेरिस में मेरे चित्रों का सफलतम आयोजन हुआ| मैंने बहुत कुछ सीखा वहाँ| गिरजाघरों के स्टेनग्लासके रंगों और वर्जिन मेरी या बाल ईशु को स्तनपान कराती मेडोना के चित्रों को ज़ेहन में बसाया और जब भारत लौटी तो मेरे चित्रों मेंबहुत अधिक प्रौढ़ता दर्शकों ने महसूस की|”

गज़ाला गर्मागर्म आलू पोहे, पनीर पकौड़े और चाय लाकर रख गई|

“अरे गज़ाला, रघुवीर जी को अंजीर रोल भी खिलाओ| आज आपकी मैडम का इन्टरव्यू लिया है इन्होंने, कुछ मीठा तो बनता है न?”

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