लौट आओ दीपशिखा - 6

लौट आओ दीपशिखा

उपन्यास

संतोष श्रीवास्तव

अध्याय छह

“पोंपेदूसेंटर? यह क्या बला है?”

“नील, बला नहीं यह बीसवीं शताब्दी का संग्रहालय है| जिसे फ्रांस के राष्ट्रपति जॉर्ज पोंपेदू ने बनवाया था इसलिए इसका नाम पोंपेदू सेंटर के रूप में फ़ेमस हुआ|”

“चलिए मैम..... फिलहाल तो होटल आबाद करिए|”कार खूबसूरत बगीचे वाले लॉन के एक ओर पार्किंग प्लेस पर रुकी| ऊँची-ऊँची चॉकलेटी बुर्जियों वाला गिरजाघर जैसादिखता होटल| बेहद भव्य रिसेप्शन..... उतना ही भव्य उनका स्वागत| कोचपहले ही पहुँच चुकी थीं और पूरी यूनिट बाकायदा अपने-अपने कमरों में बंद हो चुकी थीं| नीलकांत के और दीपशिखा के सुइट कीचाबियाँ लेकर होटल बॉय पहुँचचुका था| सुइट आजू-बाजू ही थे|

“तुम फ्रेश हो लो..... कॉफ़ी ऑर्डर करते हैं|” वह अपने कमरे में आ चुकी थी| उसने दरवाज़ा अंदर से लॉक किया और पर्स टेबिल पर रखते हुए फिरकी सी घूमी..... ‘एनईवनिंग इन पेरिस..... नाउ, आय एम इन पेरिस|'

गुनगुनाते हुए उसने टब बाथलिया| कॉफ़ी बनाकर पी और सुलोचना को फोन लगाने लगी- “माँ, तुमकल्पना भी नहीं कर सकतीं, पेरिस कितना खूबसूरत है|” फिर शेफ़ाली से बात की- “जल्दी आजा शेफ़ाली..... यार, रहने लायक जगह है| कुछ दिन बिना किसी तनाव के आईमीनचित्रकारी के बिताएँगे|”

तभी इंटरकॉम बजा- “कॉफ़ी आ गई है| मैं बालकनी में इंतज़ार कर रहा हूँ|”

वह पतँग में लगी डोर सी खिंचती चली आई नीलकांत के पास| इस बार उसने पहल की| लपककर उसके गले में बाहें डाल दीं- “आई लव यू नील|”

नीलकांत की बाहों में मानो आसमान से चाँद उतर आया, खलबली मच गई, जिस्म के सितारे कानाफूसी करने लगे| नीलकांत ने हौले-हौले उसके चेहरे के हर पोर को चुम्बनों से नहला दिया फिर आहिस्ते से उसे सोफ़े पर बैठाकर केतली से कॉफ़ी निकालने लगा|

“तुम्हारी स्वीकृति भरी मोहर ने मुझे ज़िन्दग़ी जीने की वजह दी..... बड़ी बेवजह ज़िन्दग़ी जा रही थी|”

“मेरी नहीं नील..... मेरी ज़िन्दग़ी में अगर प्यार नहीं था तो चित्रकारी थी|”

नीलकांत ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा- “झूठी प्यार करता हूँ तुम्हें, इतना भी नहीं समझूँगा|”

उसने शरमाकर पलकें झुका लीं|

हलकी-हलकी बूँदाबाँदी हो रही थी| कोई ज़िद्दी बादल था जिसने आधा किलोमीटर तक दीपशिखा और नीलकांत की कार का अपनी नन्ही-नन्ही बूँदों से पीछा किया और कार जब सेन नदी के पार्किंग प्लेस पर रुकी तो अच्छी ख़ासी धूप छिटक आई थी| दोनों सेन नदी के सफ़र के लिए क्रूज़ पर आ बैठे, नीलकांत उसका हाथ पकड़कर टैरेस पर ले आया| हवा हलकी, खुशबूदार थी| परफ़्यूम का शहर जो ठहरा| फ्रांस में चारों ओर फूल ही फूल..... वादियों में खिले फूलों का अंबार| यहाँ की मुख्य खेती फूल ही हैं| बहारोंके गुज़र जाने पर सारे फूल तोड़कर कांसग्रेम में परफ़्यूमफैक्टरी में भेज दिये जाते हैं| नदी की शांत लहरों पर क्रूज़ का चलना पता ही नहीं चल रहा था|फ्रेंच और अंग्रेज़ी भाषा में कमेंट्री का कैसेट बज रहा था जिसमें बताया जा रहा था कि दाहिने और बाएँ कौन-कौन सी इमारतें हैं| आईफिल टॉवर, ढेर सारे पुल, पुलों के खंभों पर राजा महाराजाओं की मूर्तियाँ जड़ी थीं सफ़ेद पत्थर से बनी|पत्थर के पक्के सीढ़ीदार तट पर कईजोड़े मस्ती कर रहे थे| आज पेरिस में छुट्टी का दिन है| सेन के किनारे कुछ युवा समूहबनाकरनृत्य कर रहे थे| संगीत और ऑर्केस्ट्रा बज रहा था| एक अकेला आदमी सुनसान किनारे पर खड़ा वायलिन बजाता अपने आप में खोया था|दीपशिखा ने उस ओर इशारा किया- “नील, देखोकितनीतल्लीनता से अकेलेपन को एन्जॉय कर रहा है|”

“मैं तो हवा में सिम्फ़नी सुन रहा हूँ|”

“और मैं रोमारोलांको याद कर रही हूँ जिसकी कलम से शब्दों के फूल खिलते थे|”

“तुम कवयित्री हो न..... मैं फिल्मकार, सोच रहा हूँ फ्रांस पर एक फिल्म बनाऊँ, यहाँ के फूलों पे|”

“दीपशिखा हँसने लगी- “चलेगीनहीं क्योंकि फूलों पर फिल्म नहीं चित्र बनते हैं हुज़ूर|”

“नहीं, सच कह रहा हूँ..... फूलों पे फिल्म बन सकती है बल्किपरफ़्यूम पे|”

“परफ़्यूम पे तो बन चुकी है फिल्म ‘परफ़्यूम द स्टोरी ऑफ़ ए मर्डरर’ जिसमें नायक एक के बाद एक सुंदरियों का अपहरण कर उनकेसाथहमबिस्तर होता था और उस दौरान निकले पसीने को इकट्ठा कर उससे परफ़्यूम बनाता था| ये परफ़्यूम लोग एक्साइटमेंट के लिये लगाते थे|”

नीलकांत ने दीपशिखा के चेहरे को ग़ौर से देखा और उसकी नाक दबा कर बोला- “माई इंटेलिजेंट फ्रेंड, इसीलिए तो मैं फूलों की बात कर रहा था| जानती हो मध्यकालीन फ्रांस में खूब सजी, रंगीनपोशाकें पहनी जाती थीं मानो हर कोई राजघराने का हो| हर जगह बनाव श्रृंगार और मेकअप के क़िस्से थे लेकिन वे एक-एक पोशाक कई-कई दिन बिना नहाए पहने रहते थे| अपना मेकअप तक नहीं उतारते थे, उसी पर और पोत लेते थे| कई स्त्रियाँ तो अपनी सारी उम्र बिना नहाए ही गुज़ार देती थीं|”

“ओ माय गॉड..... ऐसा सोचना भी दूभर है|” दीपशिखा ने हैरत से कहा|

“स्त्रियाँ ही क्यों, कई पुरुष जीवन में पहली और आख़िरी बार तब नहाते थे जब वे सेना में भरती होते थे क्योंकि उस समय उनकी पूरी देह बिना कपड़ों के ही पानीमें डुबोकर परीक्षण से गुज़रती थी|”

नीलकांत बतानाचाहता था कि अमीर घरानों के फ्रांसीसीभी घरमें बड़े-बड़े गमले रखते थे और उसी में लघुशंका, दीर्घशंका कर लेते थे| उस पर मिट्टी ढँककर उसे खाद बनने को छोड़ देते थे|यानी गाँधीजी वाला टॉयलेट हर घर में मौजूद था| सामान्य घराने के लोग यह क्रिया घाट मैदान में निपटाते थे| घरों में बाथरूम, टॉयलेट होते ही नहीं थे| पर ये बात वह दीपशिखा से सहज होकर नहीं कह सकता था|

“मुझे लगता है नहाने का चलन न होने के कारण ही परफ़्यूम का जन्म हुआ..... शरीर को सुगंधित बनाए रखने के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता है जबकि फूल भी यहाँ बहुतायत से होते हैं|” दीपशिखा ने कहा|

नीलकांत ने घड़ी देखी- “चलिए मदाम, डिनर का वक़्त हो गया| क्रूज़ भी किनारे पर आ गया है|”

कार एक महँगे रेस्तरां के सामने रुकी| इस भव्य रेस्तरां में नीलकांत ने पहले से टेबिल बुक करा लिया था| खाना भारतीय था जिसकी खुशबू उन्हें भारतीय होने के गर्व से भर रही थी|

“तुमने ज्यां पाल सार्त्र का नाम सुना होगा?” नीलकांत ने सूप पीते हुए पूछा|

“हाँ अस्तित्ववाद का मसीहा था वो, दार्शनिक भी और धारा के विरुद्ध चलने वाली लेखिका सीमोन द बोउवार का प्रेमी था|”

“उनका प्रेम दुनिया जानती है|”

“जैसे अमृता प्रीतम और इमरोज़|” वह मुस्कुराई|

“औरअब हमारा जानेगी दुनिया, नीलकांत और दीपशिखा का|”

दीपशिखा सपनों में खो गई| उसने नीलकांत की हथेली में अपना हाथ दे दिया- “हम भीघर नहीं बसाएँगे, होटल में रहेंगे और रेस्तरां में भोजन करेंगे जैसे सीमोन और सार्त्र करते थे| हम भी कहवाघरों में घंटों कला पर बहस करेंगे| सारी रात सड़कों पर इस तरह हाथ पकड़े चहलक़दमी करेंगे|”

“नहीं, हम यह सब कुछ भी नहीं करेंगे| हमारेपास कला है, हम अपने प्रेम को कला के लिए समर्पित कर देंगे| खुदको बंधनों में नहीं बाँधेंगे लेकिन रहेंगे साथ| मैं भारत लौटते ही जुहू पर एक बंगला खरीदूँगा जिसमें हम रहेंगे और उस बंगले का नाम होगा.....”

"बस..... बस, पहले बंगला तो ख़रीदिये..... नामकरण भी हो जाएगा|”

"बंगला तो खरीद लिया समझो|” कहते हुए नीलकांत ने प्लेट सेटमाटर की स्लाइस उठा उसके मुँह की ओर बढ़ाई..... “और यह भी अच्छे से समझ लो दीप, तुमसे रिलेशन बनाने के पहले मैं ईश्वर को साक्षी मानकर तुम्हारीमाँग में सिंदूर भरूँगा और तुम्हें वेडिंग रिंग पहनाऊँगा|”

“क़ुबूल है..... तो अब चलें|”

दूसरे दिन से नीलकांत शूटिंग में व्यस्त हो गया और दीपशिखा घूमने में| आर्ट गैलरी बुक हो जाने की ख़बर उसने भारत में सभी दोस्तों को दे दी थी| सभी की तैयारी समाप्ति की ओर थी और वे भरपूर जोश में थे| उसने शेफ़ाली को फोन पर बताया- “आज मैंने ‘मेजोंद ला पांसे फ्रांसेज़’ में हेनरी मातीस के कोलाज देखे..... जीवन्त कोलाज| मूजेद आर मोदर्न भी गई मैं| वहाँ मैंने रुओ, ब्राक़, मातीस, शगाल आदि आधुनिक चित्रकारों के मूल चित्र देखे|”

“जब मैं आऊँगी तो दोबारा चलना इन जगहों पर| अभी तक तो इन चित्रकारों के बारे में पढ़ा ही है और उनके चित्रों की अनुकृतियाँ ही देखी हैं|”

“मैं तो मूल चित्रों को देखकर रोमांच से भर उठी हूँ..... तुम्हारा इंतज़ार है|”

दीपशिखा कला में आकंठ डूबी थी औरनीलकांत फिल्म की थका देने वाली शूटिंग में..... कभी-कभी तो डिनर भी आउट डोर लोकेशन में ही हो जाता| दीपशिखा तब अकेली होती|रात के उन ख़ास लम्हों में वहनीलकांत की ग़ैर मौजूदगी में भी उसे अपने पास ही महसूस करती| कुछ जुड़ सा गया थाउससे..... ‘दिल के बारीक तारों का गुँथन नीलकांत के दिल से| कितना अंतर है मुकेश और नीलकांत में| मुकेश उसके जिस्म को पाना चाहता था पा लिया और छोड़कर चला गया| वह उसे अपने मासूम, अल्हड़ प्यार में अपनी ज़िन्दग़ी काहिस्सामानती थी लेकिन नीलकांत उसकी ज़िन्दग़ी का हिस्सा नहीं बल्कि उसकी ज़िन्दग़ी है जिसके आते ही उसके एहसासों के पर्वतों पे जाने कितने आबशार गुनगुनाने लगे थे|’

सुबह नाश्ते के बाद वह गाड़ी लेकर निकल पड़ी पेरिस की सड़कों पर| सबसे पहले लूव्र संग्रहालय..... विश्वविख्यात सुंदरी मोनालीसा की पेंटिंग के सामने वह बुत की तरह खड़ी रही| कितना दर्द है मोनालीसा के चेहरे पर लेकिन आँखों में हँसी, जैसेकहना चाह रही हो कि दुख से भरी ज़िन्दग़ी में हँसते रहना एक ईमानदार कोशिश है| संसार की मरीचिका का एहसास दिलातीहै यह पेंटिंग| मूजे दल’म..... मनुष्य का संग्रहालय जिसमें मानव सभ्यता के गुहाकाल से अब तक के दृश्य हैं| कुछ दुर्लभ चीज़ें, कुछ तस्वीरें| इंप्रेशनिस्ट..... प्रभाववादी चित्रकला का संग्रहालय जहाँवैनगॉग का स्वनिर्मित आत्मचित्र और विश्वप्रसिद्ध चित्र 'सूरजमुखी’ और उनका कमरा है| सेजां के चित्र भीजिनके कंस्ट्रक्शन का हवाला ऑरो कार्तीए ब्रेसों ने दिया था| दीपशिखा मानो बिना पंख आसमान में उड़ रही थी| जितने दिन शूटिंग चली वह बार-बार इन संग्रहालयों में जाती| उन चित्रों की बारीकियाँ समझने की कोशिश करती, गैलरियों में चित्रों की प्रदर्शनी देखती..... रोदां कीबनाई विशाल मूर्ति देखती जो फ्रांसीसी लेखक बालज़ाक़ की थी|कितनासुंदर है पेरिस..... पूरा का पूरा कला संग्रहालय और अपार खिले फूलों से भरा| कहाँ निकल गये इतने सारे दिन?

“एमेरी पागल चित्रकार..... कहाँ हो? मैं कब से होटल में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ|”

“बस, पाँच मिनट में पहुँच रही हूँ| गेट पर ही हूँ|”

नीलकांत होटल के कमरे के सामने गैलरी में चहलक़दमीकर रहा था| लिफ़्टसे बाहर निकलती दीपशिखा को उसने आलिंगन में भर लिया| नीलकांत के कमरे में वह सोफ़े पर आराम से बैठ गई|

“डिनर लिया?” नीलकांत ने उसके लिए जूस गिलास में निकाला|

“नहीं जूस नहीं पिऊँगी| कॉफ़ी ऑर्डर करो| मैं स्वादिष्ट चीज़ पीज़ा खाकर आ रही हूँ| मैंने पीज़ा को भट्टी में बनते हुए देखा|”

नीलकांतग़ौर से दीपशिखा के चेहरे को देखने लगा जिस पर नूर ही नूर था|

“ऐसे क्या देख रहे हो नील..... इसलिए कि मुझे पेरिस से प्यार हो गया है? यहाँ की फूलों भरी वादियों से, आर्ट गैलरियों से, संग्रहालयोंसे? तुम जानते हो नील जब तकतुम शूटिंग में बिज़ी रहे मैंने पेरिस की तमाम सड़कों को, गलियों को देखा| लेटिन क्वार्टर की सँकरी गलियों में मैं पैदल चली| सदियोंकी संस्कृति और इतिहास को जैसे संवाद सहित सुनाती हैं यहाँ के बेशकीमती चित्रों से भरे संग्रहालय..... आई लव पेरिस.....” कॉफ़ी आ चुकी थी| नीलकांत ने उसकी ओर प्याला बढ़ाया “मुझे तो रश्क़हो रहा है पेरिस से| एक बार इस नाचीज़ के लिए भी ऐसा ही कह दो जो तुम पर मर मिटा है|”

दीपशिखा मुस्कुराई- “दिन भर से बाहर थी..... बाथ लेकर आती हूँ|”

"छोड़ोबाथ वाथ..... फ्रांसीसी नहाते कहाँ थे?” कहते हुए नीलकांत ने उसे गोद में उठाया और बड़ी कोमलता से पलँग पर लेटा दिया| फिर उसके सैंडिल उतारने लगा|दीपशिखा अपने इस पागल प्रेमी के लिए कुर्बान हुई जा रही थी..... एक नशा सा तारी था- “आई लव यू नील, हाँ, मैं तुम्हें प्यार करने लगी हूँ, तुम्हाराहोना चाहती हूँ|” न जाने पेरिस के रोमांटिक माहौल का असर थाया फ़िज़ाओं में हर वक़्त श्रृंगार के मौसम बसंत के पहरे का या..... टूटे दिल की तड़प वह नीलकांत की ओर ऐसी उमड़ी जैसे नदी समंदर की ओर|नीलकांत भी अपनी इस पागल प्रेमिका के संग-संग पागल हो उठा|उसने दीपशिखा के बालों से क्लिपनिकालकर उसकी नोक अपने अँगूठे के सिर पर चुभो ली| खून की बूँद छलकी जिसे उसने दीपशिखा की माँग में मोती सा सजा दिया| अब वह उसकी दुल्हन थी| उस रात पेरिस के उस आलीशान होटल के शानदार कमरे में नीलकांत और दीपशिखा एक हो गये| अब उनके बीच ऐसा कुछ न था जो उन्हें दो में बाँट सके|

अलस्सुबह दीपशिखा की नींद टूटी, ठीक उसी वक़्त नीलकांत की- “कैसी है मेरी दुल्हन, नींद अच्छे से आई?”

दीपशिखा मुस्कुराने लगी| नीलकांत समझ गया- “क्या फ़र्क़ पड़ता है जानूं, और वैसे शादी के लिए दो लोगों की ज़रुरत पड़ती है और हम तो एक हैं|”

“टालो मत नील, मेरीमुँहदिखाई दो|” दीपशिखा की आँखों में नशा था|

“क्या लोगी?”

“पूछकर दोगे?”

“आज हम शॉपिंग के लिए चलेंगे..... जानूं के लिए मुँह दिखाई के ढेर सारे तोहफ़े जो ख़रीदने हैं| कल तुम्हारे दोस्त मुम्बई से आरहे हैं, फिर अकेले शॉपिंग का वक़्त कहाँ मिलेगा?”

दीपशिखा अपने कमरे में आकर तरोताज़ा होकर नीली पोशाक में नील पारी सी दिख रही थी| उसकी आँखों में गुलाबी नशातैर रहा था| उसने खुद को आईने में देखा| नीलकांतके खून की बूँद उसकी माँग में बीरबहूटीसी सजी थी|उसने आहिस्ते से उसे छुआ| उतनी ही बड़ी लाल बिंदी लगाई| बाएँ गाल का काला तिलडिठौनाबनाउसकी खूबसूरती को किसी की नज़र न लगे वाले अधिकार से और अधिक काला दिख रहा था| इंटरकॉम पर नीलकांत..... ओफ्फो..... “कितना बेताब है नील?” वह सोच ही रही थी कि डोर बेल भी बज उठी और पलभर में नीलकांत अंदर- “मैंने चीज़ ऑमलेट और एस्प्रेसो कॉफ़ी ऑर्डर की है तुम्हारे ही रूम में|” फिर ऊपर से नीचे तक दीपशिखा को देखा- “माशाअल्लाह..... जान ही निकाल ली तुमने तो.....”

और उसके माथे की बिंदी को चूम लिया- “मुझे डिप्रेस्ड व्यक्ति को तुमने ज़िन्दग़ी दे दी जानूं|”

“मुझे सम्हालना, अक्खड़ हूँ मैं|” दीपशिखा ने शरारत से कहा|

“आज हमारा हनीमून डे है| शॉपिंग के बाद हम चेंज के लिए होटल आयेंगे और फिर ‘एनईवनिंग इन पेरिस’ यानी कि पारादीलातेन शो देखने जायेंगे|”

“ये क्या बला है नील?”

“पता चल जायेगा..... सरप्राइज़ है ये|”

दोनों पेरिस के महँगे शॉपिंग मॉल में शॉपिंग करते रहे और भूख लगने पर तरीके से लंच लेने के बजाय फ्रांसीसी नाश्ते चखते रहे| शाम को होटल लौटकर दीपशिखा के लिए हुक़्मथा- सबसे बढ़िया ड्रेस और जूलरी पहनना..... जूलरीमुँहदिखाई वाली|” हँसते हुए नीलकांत ने कहा और तैयारहोने के लिए अपने कमरे में आ गया|शो के टिकट होटल के रिसेप्शन में उपलब्ध थे|

१८८९ में बना पारादीलातेन पेरिस का सबसे रोमांचक और हसीन कैबरे शो है| जहाँ शादीशुदा जोड़े शादी की ही ड्रेस में सजधजकर जाते हैं| शो के दौरान शैम्पेन और लज़ीज़ डिनर परोसा जाता है| दीपशिखा ने पहली बार शैम्पेन पी थी और वह हलकी खुमारी में थी|कैबरे शो..... यानी जवान लड़कियों के गदराये जिस्म की थिरकती, मचलती नुमाइश..... दीपशिखा सहज महसूस नहीं कर रही थी क्योंकि तमाम टेबिलों को घेरे बैठे मर्द अपनी औरतों की उपस्थिति के बावजूद नाचती लड़कियों को वल्गर इशारे कर रहे थे..... “चलें?” नीलकांत ने शो की समाप्ति तक इंतज़ार नहीं किया| पेरिस की तीखी चुभती ठंड में वह दीपशिखा को अपने से लिपटाये होटल लौट रहा था|

सुबह नौ बजे दीपशिखा के सभी दोस्त होटल पहुँच गये|सभी के नाम पहले से ही होटल के कमरे आरक्षित थे| सामान रिसेप्शन से कमरों में पहुँच चुका था और दोस्त दीपशिखा के कमरे में| सबको एक साथ देख दीपशिखा चहक उठी..... “ओ माय गॉड..... आय’म.....”

“ए चुप यार..... जबकि पता था फिर भी तू रिसेप्शन में नदारद थी|” कहते हुए शेफ़ाली ने दीपशिखा को गले से लगा लिया| दीपशिखा अन्य दोस्तों से भी गले मिली| सना मोबाइल में बिज़ी थी| उसे गले लगाते हुए दीपशिखा ने कहा- “बंद करो न मोबाइल, इंडिया बाद में फोन लगाना पहले भेंट तो कर लो|”

सना ने कान से मोबाइल सटाये हुए ही जवाब दिया- “लोकल लगा रही हूँ यार| मेराकज़िन है यहाँ तुषार..... हाँ तुषार हम यहाँ होटल..... कौन सा होटल है दीपशिखा?”

सना की हड़बड़ी से सभी खिलखिलाने लगे|दीपशिखा ने होटल का कार्ड आगे बढ़ा दिया- “सना जी, आप विदेश में अपने देश से आई हैं..... इतनी दूर..... और आपको अपने होटल का नाम तक नहीं मालूम?”

कॉफ़ी आ गई थी| सना ने भी मोबाइल ऑफ़ कर दिया था- “तुम लोगभी न..... उसी समय सब चाँव-चाँव करने लगे| अरे मेरा कज़न था तुषार..... न्यूयॉर्क सेहमारे एग्ज़िवीशन के लिए ही आया है यहाँ|”

“ओ ऽऽऽऽ” कहते हुए सब कॉफ़ी ख़त्म कर अपने-अपने कमरों में चले गये| शेफ़ाली नहीं गई| उसने दीपशिखा के चेहरे कीक़ैफ़ियत पढ़ ली थी-“मैं बेताब हूँ..... जल्दी बता अपनी प्रेम कहानी|”

दीपशिखा ने शरमाकर पलकें झुका लीं| शेफ़ाली ने समझ लिया कि उसकी सखी को साथी मिल गया है| पर वह उसी के मुँह से सुनना चाहती थी|

“आओ, लिहाफ़ ओढ़कर बैठते हैं| मुझे तो बहुत ठंड लग रही है|”

दोनों पलंग पर लिहाफ़ में घुसकर बैठ गईं| दीपशिखा सिलसिलेवार सब कुछ बताने लगी| उसकी बात की समाप्ति पर शेफ़ाली ने मुस्कुराते हुए कहा- “ज़िन्दादिल है नीलकांत| तुझे खुश रख पायेगा| मैं सचमुच तुझे लेकर रिलैक्समहसूस कर रही हूँ|”

समय काफ़ी हो चुका था| आज का डिनर नीलकांत की ओर से था| कल से वह फिर शूटिंग में व्यस्त हो जायेगा और दीपशिखा अपनी टीम के साथ चित्र प्रदर्शनी में|

डिनर भारतीय रेस्तराँ में था| नीलकांत ने दीपशिखा को लेकर उसके दोस्तों के सामने काफ़ी एहतियात बरती ताकि किसी को भी उनके सम्बन्ध पर शक़ न हो| डिनर के दौरान उसने सभी से चित्र प्रदर्शनी पर जम कर चर्चा की| सभी को नीलकांत का दोस्ताना अंदाज़ बहुत पसंद आया| तुषार भी आ गया था| सनाजैसा ही खूबसूरत, लम्बा, हँसमुख..... वह न्यूयॉर्क में अपनी मेडिकल की पढ़ाई समाप्त कर सना की चित्र प्रदर्शनी और फ्रांस घूमने के उद्देश्य से पेरिस आया था| सना ने सबसे उसका परिचय कराया| नीलकांत ने हाथ मिलाते हुए कहा- "यहीं बस जाने का इरादा है या भारत लौटेंगे?”

“एक्चुअली पेरिस मेरे लिए बहुत फ्रूटफुल रहा| हफ़्ते भर से यहाँ हूँ और यहाँ के मेडिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट से काफी शोधपूर्ण जानकारी मिल रही है मुझे| मेरे कॅरिअर में वह बड़ी सहायक होगी| भारत लौटकर अपना क्लीनिक खोलने का इरादा है|”

“किस विषय में आप स्पेशलिस्ट हैं?”

“मेरे भैया मनोरोग केविशेषज्ञ हैं और उसे फोक़स करने के लिये कड़ी मेहनत कर रहे हैं|” सना ने लाड़ से तुषार की ओर देखते हुए कहा|

“हाँ, यही मेहनत मेरा रास्ता मंज़िल तक पहुँचायेगी| फिलहाल तो मैं बिदा चाहता हूँ| आपसबसे मिलने आया था|बहुत अच्छा लगा सबसे मिलकर| आपकी फिल्म के लिए मेरी शुभकामनाएँ नीलकांत जी|”

नीलकांत ने अपनी गाड़ी से तुषार को छोड़ने की इच्छा ज़ाहिर की- “थैंक्स..... मेरा दोस्त आने ही वाला है मुझे लेने| तो चलें सना..... शेफ़ाली जी, कल मिलते हैं|”

हाथ मिलाते हुए शेफ़ाली को अपने हाथ में दबाव सा महसूस हुआ जिसे उसने देर तक महसूस किया| तुषार की आँखों में कुछ तो था..... भले ही शेफ़ाली उस वक़्त नहीं समझ पाई लेकिन जिसे शेफ़ाली और दीपशिखा दोनों ने महसूस किया|

पेरिस में प्रदर्शनी लगाना हर एक चित्रकार का सपना होता है और जब ये सपना समूह में हो तो सपनों के झरोखे अपने आप खुलते जाते हैं| पेरिस का कलावर्ग कलाकारों की बहुत क़द्र करता है यह बात कला गैलरी में प्रवेश करते ही ‘अंकुर ग्रुप ऑफ़ आर्ट’ के चित्रकारों को बखूबी समझ में आ गई थी| प्रदर्शनीपूरे हफ़्ते चली, तुषारबिलानागा आर्ट गैलरी में आता रहा| रात को गैलरी से वे सीधे सेन नदी के किनारे आ जाते और जमकर बहस करते|

“यहाँ सारे विश्व से कलाकार आते हैं और अपनी जगह और मार्केट बनाना चाहते हैं|”

एंथनी के तर्क पर सबने रज़ामंदी की मोहर लगाई|

“बहुतकम्पटीशन है और हमें अपनी ऊँचाईयों तक पहुँचना है|” शेफ़ाली सेन पर चलते क्रूज़को एकटक निहार रही थी और तुषार उसे| जब भी दोनों की आँखें मिलतीं शेफ़ाली नज़रें झुका लेती|

“ऊँचाई पर तो पहुँचना हैपरसबसे अलग दिखना भी है|”

“सना, कहीं तुम निराश तो नहीं हो|”

“नहीं दीपशिखा, निराशातो मेरे अंदर के चित्रकार को मार देगी| शायद तुम मेरी उदासी को निराशाकह रही हो| तुमने देखा जब आर्ट गैलरी में पेरिस मेंहनीमून मनाने आयेकेनेडियन कपल ने मेरे चित्र केबिम्बोंकोरीझती नज़रों से देखा था| पल भर को मैं खुद को सम्पूर्ण चित्रकार मानने लगी थी|”

“तो क्या हुआ सना, इसमें उदासीकीक्या बात है?”

“यही सम्पूर्णता की सोच ही तो कला को ख़त्म कर देती है दीपशिखा|”

“मैं इस बात सेइत्तिफ़ाक़ रखता हूँ|तुमनेदेखाया शायद मुझे लगा कि मैं तुम सबकी कला के बीच आधा अधूरा हूँ|”

“नहीं आफ़ताब, तुम्हारे बनाए मेंटल लैंडस्केप चर्चा का विषय थे| तुमने सचमुच मेहनत की है| रंगों का इस्तेमाल बल्कि रंगों की सिम्फ़नी कह सकते हैं क्योंकि इसमें लयात्मकता, स्पेस, संरचना..... तमाम तत्त्व मौजूद हैं| तुम्हारी भावनाएँ अमूर्तता केबावजूद समझी जा सकती हैं|”

“एक बात तुम सबने नोट की?” दीपशिखा के सवाल पर सबकी नज़रें उसके चेहरे पर टिक गईं- “हम पेरिस आकर चिंतक भी हो गये हैं|”

“कहीं दार्शनिक न हो जायें, नहीं तो बेड़ा गर्क|”

“मेरा तो फ़ायदा हो जायेगा| मेंटल क्लीनिक चलपड़ेगा|” तुषार के कहने पर सबने एक साथ "यू ऽऽऽ” कहा और माहौल खुशगवार हो गया|

हलकी-हलकी बूँदाबाँदी शुरू हो चुकी थी|सड़केंठंडी और सुनसान थीं| पेरिस का जनसमुदाय दिन भर के काम की थकान अधिकतर सेन नदी के किनारे ही मिटाता था| अब भीड़ बढ़ रही थी इसलिए सभी होटल की ओर चल पड़े|

“जितनी दूर तक पैदल चल सकते हैं चलेंगे|” कहते हुए शेफ़ाली ने अपनी जैकेट पहन ली|

“चलना ही पड़ेगा| मजबूरी है, यहाँ गाड़ियाँ तयशुदा जगह पर ही पार्क की जाती हैं और हम पार्किंग प्लेस से दूर हैं अभी|” तुषार साथ-साथ चल रहा था..... शायद उसके दोस्त की बाइक भी पार्किंग प्लेस पर मिलेगी|

“तुषार..... कहाँ तुम हम कलाकारों के बीच फँस गये|”

“अरे..... सना, क्या तुमने बताया नहीं कि मैं रेखाचित्र बनाता हूँ| यह बात दीगर है कि मैंने उसे पेशा नहीं बनाया| मुझे दूसरों के मन को खँगालने की कला भी तो सीखनी थी न|” हँसते हुए उसने शेफ़ाली की ओर देखा, शेफ़ाली ने भी ऐनउसी वक़्त तुषार की ओर देखा और इस लम्हे में सिमट आई दोनों की बेचैनियाँ|

“रेखाचित्र में माहिर है तुषार, पोर्ट्रेट तक बना लेता है| तुषार लक्झरी लाइफ़ जीना चाहता है और सब कुछ अपने बल पर|”

“तो हम्म भी इस बात पर क्यों न सोचें कि कला को कमाई का ज़रिया कैसे बनाया जाये?” आफ़ताबकी इस बात परसभी पल भर को चौंके| एंथनी ने कहा- “हाँ, आख़िरहम कर क्या रहे हैं? हम जीवन जियेंगे कैसे?”

“बहुत से ज़रिए हैं कमाई के|”

“चित्रों से सम्बन्धितन!”

“ऑफ़कोर्स एंथनी..... कैलेंडर, पुस्तकों के कव्हर, दवाकम्पनियाँ|”

“क्योंइस समय हम इस टॉपिक पर बहस करें? इस समय जबकि हमारी आँखें पेरिस में अपने चित्रों की प्रदर्शनी के सपनों को साकार होते देख रही हैं|”

“ठीक ही तो कह रही है सना|” दीपशिखा ने पार्किंग प्लेस में प्रवेश करते हुए कहा जहाँ नीलकांत ने उनके लिए गाड़ी भेजी थी|

“कितना एक्साइटमेंट है| सोच को जैसे पंख लग गये हैं, लगता है जैसे सारा आकाश हमारा है|”

“सही फरमाया मदाम..... परड्राइवर कहाँ है?” दीपशिखा ने ड्राइवर को फोन किया| वह आसपास ही कहीं था| पलक झपकते ही आ गया| बड़ी सी गाड़ी में आठों कहाँ समा गये पता ही नहीं चला| तुषार को दीपशिखा ज़िद्द करके बैठने पर मजबूर कर रही थी- “अब तुम्हारा दोस्त नहीं आ रहा तो क्या यहीं खड़े रहोगे?”

“हम भी तो दोस्त हैं आपके|” शेफ़ाली ने अपनी बड़ी बड़ी शरारती आँखें उस पर टिका दीं| वह कच्चे धागे में बँध चुका था..... प्रेम के कच्चे धागे में जिसे तोड़ना आसान है पर निभाना कठिन|गाड़ी के शीशे बता रहे थे कि बूँदाबाँदी रुक चुकी है और अब ठंडी तेज हवाओं का शोर है| फूलों से लदे दरख़्तों वाली पेरिस की सड़क पर गाड़ी तैरती सी लग रही थी|

होटल के आते ही सब अपने-अपने कमरों में दुबकने के बजाय ब्रासरी (बार) में आ गये..... एंथनी वाइन पीना चाहता था|ब्रासरीमें धीमी उत्तेजक रोशनी के दायरे मेजों के आसपास तिलिस्म रच रहे थे| एंथनी ने सबसे पूछकर वाइन ऑर्डर की हालाँकि दीपशिखा सहित सभी लड़कियों ने मना किया था पर माहौल ऐसा था कि.....

“ये हुई न बात कलाकारों वाली|” कहते हुए एंथनी ने आठ गिलासों में वाइन उँडेली| अभी शेफ़ाली ने गिलास होठों से लगाया ही था कि उसका मोबाइल बज उठा-

“एक मिनट, दीपशिखा तुम्हारे लिए फोन|”

“मेरे लिए?” फोन पर नीलकांत था- “फोन क्यों नहीं उठा रही हो, कब से ट्राई कर रहा हूँ|”

उसने तुरंत बैग में से मोबाइल निकाला, नीलकांत के चार मिस कॉल थे- “सॉरी नील, मोबाइल बैग में था|”

“होकहाँ तुम?”

“होटल में| तुम कहाँ हो?”

“आउट ऑफ़ सिटी..... लोकेशन की तलाश में जहाँ आया हूँ वह जगह बेमिसाल है| इतनी खूबसूरत और रेयर जगह पर शूट करना अपने आप में एक अनुभव है, काश..... तुम साथ होतीं|”

दीपशिखा वाइन के सुरूर में थी- “अब पेंटिंग छोड़कर तुम्हारी फिल्म की हीरोइन बन जाती हूँ| बाइ द वे..... हमलोग तो परसों फ्री हो जायेंगे और आप जनाब?”

“हमें तो दस दिन और लगेंगे लेकिन मैं परसों की शूटिंग कैंसिल करके तुम्हारे पास आ रहा हूँ|”

“ओ.के...... रखूँ?”

वाइन ख़त्म हो चुकी थी ब्रासरी से उठकर वे डाइनिंग हॉल में आगये| ज़्यादा कुछ खाने का मूड न था| हलका डिनर ले सब अपने-अपने कमरों में रात की बाहों में समा गये|

प्रदर्शनी के समाप्त होते ही ‘अंकुर ग्रुप ऑफ़ आर्ट’ के सभी चित्रकार नीस के खूबसूरत समुद्र तट पर एक रात गुज़ारने नीले समंदर की आभा में खो गये थे| नीस का समुद्र तट कहीं-कहीं चट्टानों से भरा है| छोटी छोटी फैली चट्टानें जिन पर रेतीले तट से सीधे दौड़ा जा सकता है| यूँ लगता है जैसे बड़ी-बड़ी चट्टानें तट में समा गई हैं| बस उनके उभार रह गये हैं जो उनकी मौजूदगी का बयान करते हैं|शेफ़ालीतो रॉक पेंटिंग में ही माहिर थी हालाँकि वह मेक्सिको की बहुचर्चित चित्रकार फ्रेडा केड्लो से बहुत प्रभावित रही| आत्मचित्रों के लिए प्रसिद्ध फ्रेडा अमेरिका की सबसे प्रसिद्ध सेल्फ़ पोर्ट्रेट चित्रकार रही है| भारत में आत्मचित्रों की परम्परा अमृता शेरगिल से आरंभ हुई थी| पेरिस में शेफ़ाली ने आत्मचित्रों को ही अपनी पेंटिंग के रूप में प्रस्तुत किया था और फ्रेडा और अमृता शेरगिल के साथ स्वयं को उपस्थित किया था जो अपने आप में एक अभिनव प्रयोग था|तुषार के शेफ़ाली की तरफ़ आकर्षित होने की एक वजह उसके बनाए आत्मचित्र भी थे जिनके भावों और मोहक रंगों ने तुषार को गहरे छू लिया था|

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