लौट आओ दीपशिखा - 4

लौट आओ दीपशिखा

उपन्यास

संतोष श्रीवास्तव

अध्याय चार

“तुम्हारा बदन जैसे साँचे में ढला हो..... पत्थर कीशिला को तराशकर जैसे मूर्तिकार मूर्ति गढ़ता है|” वह रोमांचित हो उठी थी| अपने इस रोमांच को वह चित्र मेंढालने लगी| एकयुवती गुफ़ा के मुहाने पर ठिठकी खड़ी है| युवती पत्थर की मूर्ति है मगरचेहरेझौंकोंज़िन्दग़ी को पा लेने की आतुरता है| आँखों में इंतज़ार.....ज़िन्दग़ी का..... उसने शीर्षक दिया ‘आतुरता’..... उसे लगा मानो उसकी आतुरता मुकेश तक पहुँची है|वह समंदर के ज्वार सा उसकी ओर बढ़ा चला आ रहा है|पीछे-पीछे फेनों की माला लिए लहरें और रेत में धँस-धँस जाते मुकेश के क़दम..... वह मुड़कर समंदर के बीचोंबीच लाइट हाउस को देख रहा है जो तेज़ ऊँची-ऊँची लहरों पर डोलते जहाज़ों के नाविक को राह दिखाता है|

फिर दौड़ा है मुकेश..... अब की बार उसका लम्बा कुरता, बाल हवा के तेज़ झौंकों में उड़ रहे हैं और वह किसी रोमन सा नज़र आ रहा है..... फिरखुद को उकेरा दीपशिखा ने..... दीपशिखा मुकेश की बाहों में झूल गई है और ज्वार से भरी ऊँची-ऊँची लहरों ने उन्हें भिगो दिया है और समंदर के अंतिम छोर सेचाँदझाँका, हँसा और बादलों में समा गया मगर रुपहली चाँदनी फिर भी फूटी पड़ रही है बादलों से..... समंदर रजत होउठा है|

दीपशिखा ने पूरे हफ़्ते चित्र बनाए| वॉटर कलर्सके साथ-साथ उसने ग्रेफाइट, क्रेयोंस और ऑइल कलर्स का भी इस्तेमाल किया| हल्के-हल्के रंगों की छटा ने उसके चित्र जीवंत कर दिए..... जास्मिन, सना, शादाब, आफ़ताब, एंथनी अवाक़ थे|

“दीपशिखा..... यार, गज़ब के जीवन्त चित्र बनाए हैं| कमाल हो गया..... हम भोपाल की आर्ट गैलरी बुक करवा ही लेते हैं| दिसंबर में जब मौसम खुशनुमा होगा और बाज़ार क्रिसमस के उपहारों से लदा होगा|”

“मगर एंथनी?”

“तो क्या? २५ दिसंबर क्रिसमस के लिए हमेशा से तय तारीख है| हम दिसंबर का पहला हफ़्ता बुक कराते हैं| अभी तो दो महीने बाकी हैं|”

दीपशिखा मुकेश को फोन लगा-लगा कर थक गई पर नॉट रीचेबल..... पहुँच के बाहर|

“मुकेश का घर कहाँ है आफ़ताब?” दीपशिखा बेचैन थी|

“यू.पी. मेंहै..... सुल्तानपुर हैशायद|”

“बताता कहाँ है कुछ अपने बारे में|”

सूरज ढलते ही परिंदे घोंसलों की ओर लौटने लगे| स्टूडियो बंद कर दीपशिखा अनमनी सी घर लौटी| दाई माँ की ज़िद्दके कारण उसे दो निवाले हलक़के नीचे उतारने पड़े| बिस्तर पर लेटी तो लगा सेज काँटों की है, मुकेश ख़ामोश क्यों है? फोन क्यों नहीं करता? बताता क्यों नहीं किवहाँ कौन सी उलझन में है..... कहीं वह धोखा तो नहीं दे रहा? उसे पा लेने की तड़प में वह इतने लम्बे अरसे तक उसके आगे पीछे घूमता रहा और अब..... जब दोनों एक हो गये..... संग-संग जीने मरने की कसमें खा लीं तो वो कौनसा राज़ है जिसे मुकेश उससेछिपारहा है..... नहीं..... नहीं..... वह दीपशिखा को धोखा नहीं दे सकता| ज़रूर किसीमुश्किल से गुज़र रहा होगा| वह सोते-सोते चौंककर उठ बैठती| एस.एम.एस. करती तो फेल हो जाता| ट्राई अगेन..... ट्राई अगेन..... कॉल करती तो नॉट रीचेबल..... आख़िरहुआ क्या है?

कई हफ़्ते बीत गये| भोपाल की प्रदर्शनी के दिन नज़दीक आ गये|दीपशिखा ने अपने चित्रों में प्रेम का संसार रच दिया था| पहले वह गुनगुनाते हुए चित्र बनातीथी इसलिए आसपास की आवाज़ें सुनाई नहीं देती थीं| अबख़ामोशी मुकेशकी ग़ैर मौजूदगी को बढ़ा देती है| उसके ब्रश में से प्रेम के सातों रंग उभर आतेहैं- प्रेम, विश्वास, आतुरता, जुनून, घृणा, तिरस्कार, धोखा.....और उसका ब्रश जुनून से छलाँग मारकर सीधाधोखे पर आ जाता है| आफ़ताब सना के कान के पास फुसफुसा रहा था- “ख़बर पक्की है, मुकेश ने शादी कर ली है|”

जैसे दिल में घूँसा सा लगा हो| कानों में पहुँची इस फुसफुसाहट से पूरे बदन में सनसनी तारी हो गई..... वह नहीं ऽऽ की चीत्कार के संग बिखरे रंगों पर ढेर हो गई|

“दीपू..... सम्हालो खुद को| यह तुम्हें क्या हुआ?” शेफ़ाली भी चीख़ी| पल भर को वक़्त स्तब्ध रह गया|

बंद आँखों में भी मानो हर दृश्य उभर रहा था| पापा आये हैं| वह हवाई जहाज से पीपलवाली कोठी लाई गई है|उसका अपना कमरा..... सामने बालकनी की ग्रिल पर चमेली की उलझी उलझी सी लतर पर खिले फूलों की खुशबू नथुनों में समा गई|माली काका गुलाब की छँटाई कर रहे थे| उसकी ऐसी हालत देख कैंची उनके हाथ में धरी की धरी रह गई..... माँ सिरहाने खड़ी डॉक्टर के हर सवाल का जवाब देतीं| डॉक्टर के जाने के बाद लगभग दो घंटे बेहोशी की नींद सोती रही दीपशिखा|उठी तो चिंतातुर माँ को सामने पाया- “मुझे क्या हुआ था माँ?” पूछना चाहा पर तभी सुलोचना बोल पड़ीं- “अब कैसी हो दीपू?”

वह हथेली की टेक लेकर उठी| सुलोचना ने तकियों के सहारे उसे बैठा दिया..... उसने पूछना चाहा क्योंकि अब कोई शंका शेष नहीं थी इसलिए कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ माँ?

“तुम्हारेसारे चित्र बिक गये दीपू..... शेफाली का फोन था कि प्रदर्शनी बहुत सफल रही|”

“सचऽऽऽ..... माँ.....” खुशी की लहर ने उसके चेहरे को खिला दिया|

“तुमने मेहनत भी तो बहुत की थी| तुम्हारे पापा बता रहे थे कि चित्र बेहद कलात्मक थे| वे तो मोहित हैं तुम्हारी चित्रकारी से|”

भर आई आँखों के बावजूद वह मुस्कुरा पड़ी|

“माँ, मैं कुछ दिन बिल्कुल अकेले रहना चाहती हूँ| खुद का मंथन करना चाहती हूँ, पहचानना चाहती हूँ|”

“हाँ..... तो रहो न इधर|”

“इधर?..... इधर तनहाई कहाँ है, मैंलद्दाख़ जाना चाहती हूँ| बस आठ दस दिन के लिए|”

“पहले पूरी तरह स्वस्थ हो जाओ फिर चली जाना| वहाँ का इंतज़ाम दौलतसिंह से करवा देंगे|”

दरवाज़े के परदे पर टँगी घंटियाँ टुनटुनाईं- “कैसी है मेरी शहज़ादी? ये देखो, पेपर में तुम्हारी तस्वीर|”

“मेरी तस्वीर?”

“तुम्हारे सारे चित्र फिल्म डायरेक्टर नीलकांत ने ख़रीद लिये हैं| इसलिये ख़बर ने भी तीसरे पन्ने पर जगह पाई, तुम्हारे चित्र की और तुम्हारी फोटो के साथ नीलकांत की फोटो..... रातों रात तुम भी स्टार बन गईं दीपू.....”

दीपशिखा ने पापा के हाथ से पेपर लेकर पलँग पर फैला लिया|ओह सेलिब्रिटी पेज पर उसकी तस्वीर उसकी पेंटिंग, उसका नाम..... आँखें उमड़ आईं..... सच है इंसान का जब दिल टूटता है ईश्वर मलहम साथ-साथ भेज देता है| उसे लगा वह पहाड़ से गिरी ज़रूर पर फूलों की घाटी ने उसे लपक कर कोमल बिछावन दे दी|

इतने दिनों बाद दीपशिखाने सबके साथ भरपेट डिनर लिया और गहरी नींद सोई|

सुबह वह तरोताज़ा थी| उसने शेफ़ाली को फोन लगाया| वह चहकी- “अरे छा गई तू तो यार..... बम्बई, भोपाल के सारे अखबारों में तू छपी है.....नीलकांत काफ़ी बड़ी हस्ती हैं| तू जब बम्बई लौटेगी तो मिलने चलेंगे उनसे.....”

“शेफ़ाली..... अरे, मेरा हाल तो पूछ|”

“पूछना क्या..... तू अच्छी है..... तुझे और कुछ नहीं सोचना है| भूल जा उस धोखेबाज़ को..... उसने तुझे दिया ही क्या? बस..... लिया ही लिया है..... ऐसे लोग बरबाद हो जाते हैं| अब तुझे केवल और बस केवल ही..... अपनेपेंटिंग पर ध्यान देना है| तू मशहूर हो गई है| लोगों की अपेक्षाएँ बढ़ गई हैं तुझसे|”

हाँ सच..... आसमाँ पर बिठा दिया है उसेउसके फेन्स ने..... और उसे उस जगह को बरक़रार रखना है| सहसा वह ऊर्जा से भर उठी| उसे लगा जैसे आसमान उसे आमँत्रण दे रहा हो|

“माँ, कब की टिकट है लद्दाख़ की?”

“दो तारीख़ की फ्लाइट है दीपू..... तुम्हारा सारा लगेज कैनवास, ब्रश, कलर्स, पेपर्स सब कुछ दौलतसिंह लेह में होटल का कमरा बुक कराके रख आया है| एक जीप का भी इंतज़ाम हो गया है|पहाड़ीइलाक़ा है, जीप ठीक रहेगी|”

सुलोचना बताती जा रही थीं और दीपशिखा की अटैची तैयार करती जा रही थीं|

एयरपोर्टमें अंदर जाते-जाते सुलोचना और यूसुफ़ ख़ानके चीयर्स करते हाथ उनके जाने के बाद भी आँखों में कैद रहे| जाँच पड़ताल के बाद वह कुर्सीपर बैठी फ़्लाइट एनाउंस होने का इंतज़ार करती रही| मन नहीं माना तो मुकेश का नंबर डायल किया- “नॉट रीचेबल..... पहुँच से बाहर..... सच है मुकेशअबपहुँच से बाहर ही हो गया है| उसने बिना आगा पीछा सोचे मुकेश के साथ इतनाबड़ा क़दम उठा लिया, अपने भोले भाले स्वभाव के कारण उस पर भरोसा किया|रिश्तों का मतलबढूँढने निकली थी पर जहाँ मतलब होता है वहाँ रिश्ते नहीं होते| वह ज़िन्दग़ीके मेले में ठगी गई..... उसका गुनाह था प्यार करना और अगर वो गुनाह था तो वह उस गुनाह को बार-बार करना चाहेगी|फिर क्यों पीड़ा दे रहे हैं वे दिन? क्या खुद पर से भरोसा उठ गया है..... भरोसा तो मुकेश ने तोड़ा है..... और ज़िन्दग़ी भरके लिए एक पथराया मौन दिल की तहों में ज्वाला की तरह सुलग रहा है|जो हुआ उसके लिये रोये या क्यों हुआ इस सवाल से जूझे..... वह मुकेश को क्यों दोष दे?उसने भी तो यही सब चाहा था| चाहा था मुकेश के शरीर के तेज में खुद को सूरजमुखी की तरह खिला देना..... चाहा था उसकी आँखों की झील में डूब जाना..... नशीले स्वाद में..... बनैले आगोश में..... पर अधबीच में सफ़र से किनारा करलेना..... कैसे सहे दीपशिखा? उसकी आस्था, विश्वास मुकेश की क्षणवादिता के आगे चूर-चूर हो गया है..... अब याद आ रहा है उस रात के मंजर का असली रूप..... जब मुकेश ने उसे बाहों में भरकर क़रीब लिया था और वह कसमसाई थी..... मुकेश..... ये सब बिना किसी बंधन के?”

“लेट्स एन्जॉय दीप..... ये खूबसूरत लम्हे क्या दोबारा आयेंगे? इस पल में जियो..... देह को मर्यादा से मुक्त करो,देखोज़िन्दग़ी कितनी खूबसूरत है|”

वह उलझी लता सी थरथराई थी- “मुझे अपना बना लो मुकेश, वादा करो..... कहो तुम मेरे हो|”

“मैं तुम्हारा हूँ..... यह वक़्त कह रहा है, तभी तो हम साथहैं, तभी तो मिलन के ये लम्हे नसीब हुए हैं| कुछ मत सोचो दीप..... अपनी नसों में आग सुलगा लो और खुद को मुझमें बह जाने दो..... ये लम्हा ही सच है जैसे भीतर ली साँस सच है..... जैसेदिल की ये धड़कनें सच हैं|” बौनीपड़ गई थी दीपशिखा मुकेश के तर्कों के आगे..... उसका सनातन सच, शाश्वत आस्थाएँ और अनवरत भावनाएँ लघु हो गई थीं|

लगातारछै: महीनों तक दोनों के बीच बस देह रही| वह शीशम के दरख़्त सा मज़बूतयौवन और जीवन की अनन्तसंभावनाओं से लबरेज़..... हर पल चिटख़ जाने को आतुर..... हर पल मधुदंश देने को बेकरार और वह बूँद-बूँद खुद को लुटाती, रिसती..... उसके जीवन का गुलाब तो काँटा ही काँटा रह गया|

लेह पहुँचकर वह अवाक़ थी| पहाड़ों के इतने रंग| इतनी खूबसूरती!! ईश्वर भी काबिले तारीफ़ चित्रकार है| एयरपोर्ट से बाहर उसके नाम की तख़्ती लिये जीप खड़ी थी| ड्राइवर ने सलाम किया और उसके हाथ से अटैची ले ली|होटल तक का रास्ताबर्फीली हवाओं के कारण ख़ासा लम्बा लग रहा था|

“ड्राइवर जी..... आपका नाम बताएँगे?”

“जी..... नीमा|”

शक्ल सूरत से लद्दाख़ीलगता था नीमा| लद्दाख़ी ही तो है| छोटी-छोटी आँखें, चपटी नाक| दीपशिखा के हर एक सवाल का जवाब वह मुस्कुरा कर देता तो चेहरे पर आँखें काली पतली लकीर सी दिखतीं| होटल आ चुका था| कमरे में सामान होटल के कर्मचारी ने पहुँचा दिया और इंटरकॉम पर आधे घंटे बाद डिनर के लिए बुलावा भी आ गया|

“शुबै कितना बजे आऊँ?” नीमा ने अदब से पूछा|

“ब्रेकफ़ास्ट के बाद चलेंगे साढ़े दस तक|”

“ओ.खे.” फिर सलाम|

उसके जाते ही वह पलँग पर गिर पड़ी| ओ गॉड, इतनी ठंड! चलो दीपशिखा जी पहले फ्रेश हो लेते हैं| छोड़ोयार, फ्रेश तो हैं ही..... चेंज कर लेते हैं और माँ को पहुँचने की खबरकर देते हैं| खुद से बात करते हुए उसने चेंज के लिए अटैची खोली ही थी कि पीली पोशाक पर पहली नज़र..... मुकेशको ये रंगकितना पसंद था| महाबलेश्वर के एकाकी कमरे में उसने खुद ये पोशाक उसे पहनाई थी और उसके बालों को सँवार कर तस्वीरें खींची थीं- “दीप..... पीलारंग जैसे उगता सूरज..... पीला रंग जैसे पीली उजास में बुना गयास्वप्न जाल और इस रंग में तुम मेरे दिल की मलिका..... ईश्वर ने तुम्हें अपने हाथों से गढ़ा है|”

वह लम्हा आज तक रुका है दीपशिखा के सामने|फिर जाने क्या हुआ..... पीली पोशाक उसने अटैची में सबसे नीचे डाल दी.....

“फोन बजा|”

“पहुँच गई दीपू?”

ओह, चूक हो गई उससे| आते ही साथ पहले माँ को फोनकरना था|

“माँ, इतना खूबसूरत है लेह| अभी तो एयरपोर्ट से होटल तक के रास्ते से ही गुज़री हूँ| और माँ, बहुत कड़ाके की ठंड है..... पता है, मैंने तो कनटोपा भी पहना है| पहाड़ीभालूलग रही हूँ मैं|”

“सुलोचनाहँसती रहीं| दीपशिखा सराबोर होती रही|

डिनर के बाद गर्म पानी की थैलियाँ बिस्तर में रखकर और गुडनाइटकहकरकर्मचारी चला गया| वह लिहाफ़ ओढ़कर सुकून भरी गरमाहट में नींद का इंतज़ार करने लगी|

नीमा काफी अच्छी हिन्दी बोल रहा था| बताने लगा- मैमशाब, आपको पता है लद्दाख़ जम्मू कश्मीर का ही एक हिस्सा है| उधर तो बहुत आतंकवादी हैं..... पर लद्दाख़ में हम सुरक्षित हैं क्योंकि हमें फौज़ से बहुत हेल्प मिलती है| फौज हमसे खुश है क्योंकि जब भी सरहद पार से ख़तरा आताहै हम सब लद्दाख़ी फौज की मदद के लिए आगे आ जाते हैं|” दीपशिखाको नीमा की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी| वह तो प्राकृतिक दृश्यों में खोई हुई थी|खूबानियों से लदे पेड़ और खेतों में लहलहाती गेहूँ की फसल देख न जाने कितने चित्र वह मन के कैनवास पर उकेरने लगी| तीखीतेज़धूप में पहाड़ शीशे से चमक रहे थे| रास्ते के दोनों ओर सुनहले पत्तों से भरे यूलक के पेड़ बेहद खूबसूरत लग रहे थे|

लेह के सबसे बड़े बौद्ध मठ हेमिस में दीपशिखा की मुलाकात बौद्ध लामाओं से हुई| बच्चों से लेकर बड़ों तक जितने भी लामा थे सबके सिर घुटे हुए..... शरीरपर एक भी गरमकपड़ा नहीं..... गलेसे पैर तक कत्थई परिधान में उनके गोरे चमकते चेहरे दीपशिखा देर तक देखती रही| लामाबाल्यावस्था में ही बौद्ध धर्म में दीक्षित हो जाते हैं, शादी ब्याह का तो सोचते तक नहीं, घर-घर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करने और गरीबों की मदद करने का ये संकल्प लेते हैं|

उसने सीढ़ियों पर बैठकर मठ का और लामाओं का स्कैच बनाया|

नीमा ने सूर्यास्त तक दीपशिखा को ठिक्से मठ, शांति स्तूप आदि दर्शनीय स्थल घुमा दिये| जिनजिन रास्तों से जीप गुज़री सड़क के संग संग सिंधु नदी उसकी हमसफ़र बनी रही..... स्वच्छ पारदर्शी पानी में से तलहटीके गोल-गोल सफ़ेद पत्थर दीपशिखा के मन में नये-नये चित्ररचते गये| कविताइस बार सूझ नहीं रही थी| दो चार लाइनें दिमाग़ में आती भी तो उनमें मुकेश होता..... तो क्या उसकी काव्य प्रतिभा मुकेश के समान ही पहुँच के बाहर हो गई? मुकेश फिर मन में फाँस सा रड़कने लगा| वह होली फिश पाँड के किनारे खड़ी सुनहले धाननुमा पौधों के बीच काली सफ़ेद बत्तख़ों को निहार रही थी| क्वैं-क्वैं की आवाज़ करती वे उसके नज़दीक आ गई थीं| मुकेश ने उसका वहाँ खड़ा रहना दूभर कर दिया..... वह तेज़ी से आकर जीप में बैठ गई- “होटल चलो नीमा|”

नीमा ने मैमशाब का मुरझाया चेहरा देखा और उन्हें खुश करने के लिहाज़ से डंडीदारसुगंधित सफेद फूल उसकी ओर बढ़ाया- “आपके लिए|”

दीपशिखा ने पलभर नीमा की ओर देखा..... फिर फूल लेकर गाल से सटाया और आँखें मूँद लीं|

जीप शाम के सुरमई रास्तों पर चल पड़ी| रात भर बर्फ़ीली हवाएँ चलती रहीं| कमरा हीटर और बिस्तर की गर्म पानी की थैलियों से एकदम नॉर्मल टेम्प्रेचर पे था फिर भी टूटे दिल की चिन्गारियाँ दीपशिखाको होठों के ऊपर और माथे पर पसीने की बूँदों से बेचैन किये थीं| मुकेश की स्मृतियों के हमले से वह लड़खड़ा उठी थी..... दर्द की लहर उसकी पसलियों को चीरते हुए माथे के पठार पर रुकी फिर पाँवों केसमँदर में छलाँगलगाकर तैरने लगी|

“यह दर्द तुमने खुद चुना है दीपशिखा..... अबशिकायतकरोगी भी तो किससे?”

शायद रात के तीन बजे नींद आई हो, सुबह जब नींद खुली तो आठ बज चुके थे| धूप खिड़की के बाहर चमक रही थी| उसने खिड़की तकपहुँच कर परदा खींचने को ज्यों ही हाथ बढ़ाया नज़रें होटल के लॉन पर जमे बर्फ़ के ढेर पर गईं| तुरंत खिड़की से इधर-उधर झाँका..... बर्फ़ ही बर्फ़..... तो रात को बर्फ़बारी हुई है| उसने इंटरकॉम पर चाय का ऑर्डर दिया और फ्रेश होकर सोफ़े पर बैठ गई|चाय लाने वाले लड़के से पूछा- “क्या बहुत बर्फ़ गिरी है?”

“नहीं मैम, थोड़ीसी ही है| अभी पिघल जाएगी|”

“फिर तो रास्ते में कीचड़ मिलेगी|”

“नहीं मैम..... धूप तीखी तेज़ होती है न, घंटेदो घंटे में रास्ता सुखा देगी|”

अरेकमाल है, ठंड इतनी और धूप ऐसी?”

“हाँ मैम, साल के तीन सौ दिन धूप ऐसी ही तीखी तेज़ होती है और रात को बर्फीली हवाएँ चलती हैं|”

“अनोखा प्रदेश है लद्दाख|”

लड़का मुस्कुराता हुआ चला गया|

जीप में कैनवास और चित्रकारी का सामान लादा गया| पानी की बोतलें..... कॉफ़ी से भरा थर्मस और बिस्किट|आज चित्रकारी का पूरा मूड था दीपशिखा का| आज नीमा उसे सिंधु दर्शन के लिए ले जा रहा है| दीपशिखा ने काला लाँग स्कर्ट, मरून टॉप और मरून स्वेटर पहना है|ऊँची एड़ी की सैंडिल पहनने का मन था लेकिन घूमने में कठिनाई होगी इसलिए जूते ही पहने| वह सिंधु नदी देखने के लिए उतावली हो रही थी| पहले सिंधु दर्शन के लिए पाकिस्तान जाना पड़ता था| सिंधु नदी हिमालय से निकलकर लद्दाख़ से बहतीहुई पाकिस्तान जाती है और वहाँ से फिर भारत लौटती है|जब लोगों को यह भूगोल समझमेंआया तो लेह में सिंधु दर्शन की परम्परा चल पड़ी| अब तो बड़े ज़ोर शोर से सिंधु महोत्सव होता है|

“अरे..... यहाँ तो बड़ी भीड़ है, क्या आज ही सिंधु महोत्सव है?”

“नहीं..... मैमशाब..... फिल्म का शूटिंग चल रहा है| आज सिंधुदर्शन नहीं हो सकता..... नो एंट्री है|”

दीपशिखा नेदेखा खूब लम्बे चौड़े पक्के चबूतरे पर कैमरे ही कैमरे..... दौड़ते-भागते लोग..... एक आदमी फिल्म डायरेक्टर के सिर पर धूप से बचने के लिए छतरी ताने खड़ा था..... वह जीप से बाहर निकली..... शूटिंगदेखने के बहाने चबूतरे पर सीमेंट से बनी गेरूरंग की छतरी के नीचे जाकर खड़ी हो गई| हीरोइन ने सिंधु जल अंजलि में भरकर होठों से लगाया और पास खड़े दस ग्यारह बरस के लड़के से कहा- “आओ बेटा..... आचमन कर लो|”

कैमरे चमके और शॉट ओ.के. ..... पैकअपकी घोषणा, फिल्म डायरेक्टर गदबदे बदन का चालीस पैंतालीस बरस का होगा| वह सिंधु नदी का जल स्पर्शकरने के लिए सीढ़ियाँ उतर ही रही थी कि कानों में सुनाई दिया- “दीपशिखाऽऽऽ”

वहपलटी..... सामने फ़िल्म डायरेक्टर- “आप चित्रकार दीपशिखा ही हैं न?”

“जी..... आप मुझे कैसे जा.....”

“हम तो आपके मुरीद हो गये हैं| भोपाल में लगी एग्ज़ीवीशन से आपके सारे चित्र ख़रीदे हमने| वाह, आपके हाथों में जादू है|”

“आप नीलकांत ठक्कर!!” वह अवाक़ थी| शूटिंग देखने आई भीड़ अब नीलकांत के साथ-साथ दीपशिखा के भी ऑटोग्राफ़ लेने लगी|

“आप कहाँ रुकी हैं?”

होटल का नाम बताने पर अब चौंकने की बारी नीलकांत की थी- “हम भी तो उसी होटल में अपनी टीम सहित रुके हैं| क्याइत्तिफ़ाक़ है|” दोनों मुस्कुराये|

“अगर कोई और प्रोग्राम न हो तो हम साथ में डिनर लें?”

दीपशिखा के पास इंकार करने की कोई वजह नहीं थी| उसका कद्रदान कोई मामूली इंसान तो न था| इतना बड़ा फिल्म डायरेक्टर..... हिट फिल्मों का नामवर आदमी.....

“आई डोंट माइंड|”

नीलकांत के ड्राइवर ने कार का दरवाज़ा खोला| इस बीच नीमा को दीपशिखा ने वापिस लौट जाने को कह दिया| कार में वह नीलकांत के बाजू में बैठी| तेज़ परफ़्यूम की खुशबू कार में समाई थी|नीलकांत की उँगलियों में हीरा, नीलम, पन्ना चमक रहा था| सूरज ढल चुका था| सुरमई अँधेरा पहाड़ों कोक्षितिज के कैनवास पर चित्रित कर रखा था| नीलकांत ने सनग्लासेज़ उतार दिए| उसकी आँखें नीली थीं जो उसके गोरे चेहरे पर खूब फब रही थीं|

“मैं आपको थीम दूँगा, क्या आप उस पर पेंटिंग बनाएँगी|” नीलकांत ने ख़ामोशी तोड़ी|

“फिलहाल तो मैं फ्रांस में अपने चित्रों की एग्ज़ीवीशन प्लानकर रही हूँ|”

“ओ ग्रेट..... और कहाँ-कहाँ लग चुकी है आपके चित्रों की प्रदर्शनी?”

रेस्तराँआने तक दीपशिखा ने नीलकांत के सारे सवालों के जवाब दे दिये| रेस्तरां के केबिन में दोनों बैठे तो ऐसा एकांत दीपशिखा को असहज कर गया|वह संकोच से भर उठी| न जाने क्या सूझी कि एक अजनबी के साथ यूँ डिनर पर चली आई| वो भी फिल्मी आदमी| इन पर भरोसा भी तो नहींकिया जा सकता? तो क्या मुकेश भरोसेमंद साबित हुआ? नहीं..... नहीं, सारे मर्द एक जैसे नहीं होते|

“क्या लेंगी..... ठंड बहुत ज़्यादा है थोड़ी ब्राँडी और स्टार्टर में चिकन लॉलीपॉप|”

ब्राँडी की एक छोटी बॉटल तो सुलोचना ने भी उसके बैग में रखी थी कि ठंड ज़्यादा हो तो थोड़ी सी पी लेना, गर्मी रहेगी|

“क्या सोच रही हैं? कम ऑन..... यहाँ का वैदर रात को बर्फीला हो जाता है| खुदकी सुरक्षा के लिए ब्राँडी दवा जैसी है|”

तब तक बैरा ऑर्डर की गई सामग्री रख गया था| नीलकांत के आत्मीय व्यवहार से दीपशिखा खुलती गई| इस बेहतरीन वक़्त के लिए वह किसे शुक्रिया कहे? ईश्वर को या नीलकांत को?

होटललौटतेहुए उसे बदन में गरमाहट महसूस हो रही थी| ब्रांडीवाक़ई अच्छी थी|नीलकांत उसे कमरे तक छोड़ने आया..... “कल पैंगोग लेक के किनारे कुछ शॉट्स लेने हैं..... “आप चलेंगी तो मुझे खुशी होगी|”

“सुबह बताऊँगी|”

“मैं इंतज़ार करूँगा, गुडनाइट|”

नीलकांत के विदा होते ही उसने दरवाज़े को अच्छी तरह बंद किया और चेंज करके गर्म बिस्तर में घुस गई| सोचाथा तुरंत सो जाएगी पर मुकेश उसे हांट करता रहा| सोचते-सोचते आधी रात हो गई तब कहीं जाकर नींद आई|

लॉनके फूलों भरे पौधे धूप में नहा रहे थे| इंटरकॉम पर नीलकांत था- “गुडमॉर्निंग..... चल रही हैं?”

“ओ.के. ..... कितनी देर में निकलेंगे| अभी तो मैं सोकर उठी हूँ|”

“एक घंटे बाद?” नीलकांत की आवाज़ की मिश्री कानों से होठों तक लरज गई|

“ओ.के.” रिसीवर रखते ही क़दमों में फुर्ती आ गई| ब्रश करते करते उसनेचाय का ऑर्डर दिया|आज वह पीली ड्रेस पहनेगी| देखती है इन हसीन वादियों में वह पीले रंग के साथ कितना काँप्रोमाइज़ कर पाती है| आज का पूरा दिन नीलकांत के साथ गुज़रेगा| क्या वे लम्हे उसे कचोटेंगे जो पीले रंग के साथ अनायास जुड़े हैं? क्या धोखे की यादों से ठसाठस भरे दिल को पैंगोंग झील के किनारे उलीच पाएगी? शायद हाँ..... हाँ, वह कोशिश करेगी|

इत्तिफ़ाक़| नीलकांत ने भी नीलीजींस पर पीली टी शर्ट पहनी थी| उसे देखते ही मुस्कुराया- “व्हाट ए कोइंसिडेंट|”

अबउसे पीले रंग के साथ संघर्ष करना है| यानि कि जो सामने मौजूद है..... सहज है..... उसके लिए संघर्ष| आज वह कैनवास भी नहीं लाई| स्केच बुक और पेंसिल लाई है..... आजउसे खुद को सीप में पिरोना है तभी तो मुक्ता रूप पकेगा|

मनाली चायना बॉर्डर रोड पर नीलकांत की टीम का काफ़िला चल पड़ा|

“नामग्यालजी..... थोड़ा बताते चलिए, हमारेलिये तो यह जगह अननोन है|”

आशुतोष ने ड्राइवर से कहा तो वह अपने पीले दाँतों को निपोर कर मुस्कुराया-“जी शाब|”

“आपको पता है दीपशिखा जी, आज हम समुद्र सतह से १७५८६ फीट की ऊँचाई तय करने वाले हैं| वहाँ से १३९०० फीट पर है पैंगोग झील|”

“जी..... और वह १३४ कि.मी. एरिया में फैली है| १०० कि.मी. चायना में और ३४ कि.मी. भारत में|”

“अरेवाह! यानी कि आप सही मायने में टूरिस्ट हैं|” वह मुस्कुराई..... नीलकांत भी|

“शाबजी, आज ड्राई डे है|” नामग्याल ने जानकारी दी|

“यानी कि आज लेह वासी शराब नहीं पिएँगे? मगर क्यों?”

“नहींशाब जी..... वो वाला ड्राई डे नहीं| आज के दिन यानी हर सोमवार कोबी आर ओ के आदमी पत्थरों को डायनामाइट लगाकर तोड़ते हैं इसलिए गाड़ियों की आवाजाही रोक दी जाती हैं|”

“यारतुमहिन्दीअच्छी बोल लेते हो|”

नामग्यालगद्गद् हो गया|

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