लौट आओ दीपशिखा - 2

लौट आओ दीपशिखा

उपन्यास

संतोष श्रीवास्तव

अध्याय दो

“ठीक है, शेफ़ाली भी अगले महीने आ जाएगी तब तुम शायद होमसिक नहीं होगी| सुलोचनाटेंशन में आ जाती हैं-तुम्हारे अकेलेपन को सोचकर|”

दाई माँ ने नाश्ता मेज पर लगा दिया था- “पापा..... माँ की लाड़ली बिटिया हूँ न.....इसीलिए| वैसे यहाँ मेरे सभी दोस्त बहुत मददगार हैं..... मुकेश तो घर तक छोड़ने आता है|”

कह तो दिया था उसने फिर सकपका गई| यूसुफ़ ख़ान के भी कान खड़े हुए- “ये मुकेश कौन है?”

“मेरा दोस्त पापा..... चित्रकार है, फोटोग्राफ़ी भी करता है| बहुत अच्छा कलाकार है| मिलवाऊँगी आपसे|” भोलेपन से दीपशिखा बोली|

लेकिन यूसुफ़ ख़ान ने इस बात को भोलेपन से नहीं लिया| उन्होंने बाल्कनी में जाकर सुलोचना को फोन लगाया- “तुम्हारीबेटी के दोस्तों में लड़के भी हैं| ऐसे में कुछ ऊँचनीच न हो जाए| तुम कुछ दिनों के लिए यहाँ आकर रहो| माहौल देखो, दीपू को समझो..... ये ज़रूरी है|”

सुलोचना ने ख़ामोशी से सुना| यूसुफ़ ख़ान के शक्की स्वभाव से वे परिचित थीं| कोई सुलोचना की तारीफ़ कर दे या बार बार उससे मिलने आये तो उन्हें शक़ हो जाता था| फिर ये तो बेटी का मामला है|बेटी मेंआए बदलावों को सुलोचना समझाना चाहती थीं| तय हुआ कि यूसुफ़ ख़ान के लौटते ही वे मुम्बई जायेंगी| दाई माँ को ताकीद की गयी किदीपशिखा के आने, जाने मिलने जुलने वाले लोगों पर नज़र रखें और पल-पल की ख़बर उन तक पहुँचाएँ|

लेकिन दीपशिखा के क़दमों को अब कोई रोक नहीं सकता था|भले ही पंख न हों पर हौसले हैं और यही हौसले तो परवाज़ हैं जो अकाश को चूमेंगे|

“क्या रखा है आकाश में दीप.....”

दीपशिखा के स्टूडियो में एक ढलती शाम मुकेश ने खूब मीठी कड़क चाय पीते हुए कहा- “वहाँ न घर बना सकते, न फूल खिला सकते, न ही छै: ऋतुओं का आनंद ले सकते| बड़ीशून्य सी कल्पना है आकाश को चूमने की|”

दीपशिखा कैनवास पर रंगों के कोलाज में डूबी थी| चौंक पड़ी..... “क्या कहा तुमने? शून्यकल्पना!! हुज़ूर, शून्य ही तो सबको विस्तार देता है|”

“मेरे कैमरे को नहीं..... मेरे कैमरे में शून्य समा ही नहीं सकता|”

“फोटोग्राफ़रमहाशय जी..... आप चाहें तो क्या-क्या बना दें शून्य को..... साधारण औरत को अप्सरा बना दें.....”

“भला ऐसा क्यों? जबकि मेरे पास अप्सरा है|”

“सुनूँ तो..... कौन है वह?”

मुकेश ने कैमरा दीपशिखा के चेहरे पर लाकर क्लिक किया और स्क्रीन पर दिखाया- “ये|”

दीपशिखा का चेहरा आरक्त हो उठा| उसे लगा जैसे उसका दिल धक् से हुआ है और जिसकी आवाज़ अब भी उसे सुनाई दे रही है| शाम का जादुई तिलिस्म धीरे-धीरे स्टूडियो में भी उतर आया| न जाने कैसे..... बस इसी एक लम्हे में मुकेश ने झुककर आहिस्ता से दीपशिखा के होठ चूम लिए|पहले प्यार का पहला स्पर्श..... जैसे बाहर लगे बाँस के झुरमुट में हवा के चंचल झोंके की बीन बज उठी हो|

सुलोचना का आना दीपशिखा को चकित कर गया| न कोई सूचना, न तयशुदा कार्यक्रम, न यूसुफ़ ख़ान ने ही इसके संकेत दिये| शाम के झुटपुटे में जब वह मुकेश से बिदा ले घर आई तो दरवाज़ा खुलते ही सुलोचना को सोफ़े पर बैठे पाया- “माँऽऽ..... तुम?”

वह दौड़कर उनके गले लग गई- “अचानक कैसे? कहीं सपना तो नहीं?”

सुलोचना ने दीपशिखा को बाँहों में भरकर उसके गाल, माथा चूम लिये- “माँ तो हक़ीक़तहोती है दीपू, सपना नहीं| लेकिन तुम ज़रूर सपनों की उम्र से गुज़र रही हो|”

दीपशिखा सोफ़े पर माँ के बाजू में बैठ गई- “देखो माँ, तुम्हारी बेटी कितना काम करती है| सुबह की निकली हूँ|”

“तो फिर लंच वग़ैरह?”

“अरे माँ..... दाई माँ ब्रेकफ़ास्ट के नाम पर ब्रंच करा देती हैं और काम के जूनून में भूख किसे लगती है?”

कहते हुए दीपशिखाकपड़े चेंज करने के लिए उठी|दाई माँ ने नज़दीक आकर कहा- “जल्दी फ्रेश हो जाओ बिटिया| मूँग की दाल में मेथी के पत्ते डालकर मुंगौड़ियाँ बनाई हैं|साथ में अदरक वाली चाय भी न? फटाफटले आती हूँ|"

जींस, टी शर्ट उतारकर वह बाथटबमें जा घुसी| कुनकुने पानी में सारी थकान पिघलने लगी| चेहरा धोते हुए ऊँगलियाँ होठों पर आकर टिक गईं..... वो प्रथम चुम्बन! उसके अंदर जैसे कुछ पिघलने सा लगा, नसोंमें तीव्र गति से दौड़ने लगा| क्या था वह..... प्यार..... प्यार का जमा हिमखंड जो मुकेश के होठों की आँचसे पिघलनेलगा था,पिघलकरनसों में दौड़ रहा था और वह समूची खिंची जा रही थी मुकेश की ओर..... नहाने के दौरान ही उसने मुकेश को एस एम एस किया- “मैंने ये दावा कब किया कि तुम मेरे हो|तुम्हारी आँखों ने खुद ही बता दिया|”

जवाब आया- “मेरी आँखें अब वो नींद न लें जिसके सपनों में तुम मौजूद न हो|”

“मुझेसपना नहीं हक़ीक़त बनाओ मुकेश|”

“मेरी दीप..... तुम मुझमें हो और मैं तुममें हूँ, तो ये हक़ीक़त ही तो है|”

धीरे से दरवाज़ा खटका- “दीपू, कितनानहाओगी?”

“आई माँऽऽ.....” और आज का आख़िरी एस एम एस.....

“मेरे होठों पर तुम्हारे होठों की छुअन..... एक ज़िन्दा एहसास कि तुम मेरे क़रीब हो| गुड नाइट|”

सोने से पहले सुलोचना दीपशिखा के सिरहाने आकर बैठ गईं- “दीपू अब तो तुम बड़ी चित्रकार हो गई हो|देखी मैंने तुम्हारी पेंटिंग्स..... मुझे तुम पर गर्व है|”

दीपशिखाने सुलोचना के सीने में अपना चेहरा छुपा लिया| “ओहमाँ, रीयली!!! मैं अमृता शेरगिल जैसी तो नहीं पर उनकी चित्रकारी मुझे अपील करती है| माँ..... एक बात बताओ..... कलाकार छोटी उम्र क्यों लेकर आते हैं दुनिया में? जैसे अमृता शेरगिल, जैसे पाश, सुकांत भट्टाचार्य, हेमंत| हेमंत भी चित्रकार और कवि दोनों था न माँ..... पर ये कलाकार कवि बाईस, तेईस साल ही जिये| माँ, मैं मरना नहीं चाहती|”

“पगली|” सुलोचना ने उसकी पीठ थपथपाई- “यह सब हमें नहीं सोचना है, हर एक का मरण का दिन तय है..... हमें सिर्फ जीने और कुछ कर गुज़रने की बात सोचनी चाहिए|”

“हाँमाँ, मैं पेरिस में एग्ज़ीवीशन लगानाचाहती हूँ| अंतरराष्ट्रीयस्तर पर अपने चित्र प्रदर्शित करना चाहती हूँ पर पहले मुम्बई, दिल्ली और भोपाल में..... है न माँ|”

सुलोचना दीपशिखा की आँखों में आकाँक्षाओं का समंदर ठाठें मारते देखती रहीं| वे सहम गईं|बचपन से ही दीपशिखा में असाधारण बातें उन्होंने देखीं|छोटी सी उम्र से चित्रकारी, ग़ज़ल, कविता की समझ..... लेकिन दोनों ही कलाओं में कहीं बचपना नहीं दिखा| प्रौढ़ता दिखी, गंभीरता दिखी| मुम्बई में पढ़ने, अकेले रहने के उसके फैसले के आगे जो वे झुकीं थीं उसकी वजह जहाँ एक ओर उनकी अपनी सोच थी कि वे भी तो ऐसा ही जोश भरा खून अपनी नसों में दौड़ता महसूस करती थीं और इसी कारण वे अपने माता पिता की मर्ज़ी के बिना मुसलमान लड़के से शादी करने की हिम्मत जुटा पाईं थीं, वहीं दूसरी ओर उसकी प्रौढ़ता और गंभीरता भी थी| लेकिनआकाँक्षाएँ यदि पूरी न हों तो सर्वनाश कर डालतीहैं इंसान का| उन्होंने दीपशिखा में जो आकाँक्षाओं का अथाह समंदर देखा..... उन्हें लगा कहीं कुछ ग़लत हो रहा है..... कहीं कुछ ऐसा जिसे होने देने से रोकना है लेकिन जिसकी अनिवार्यता की जड़ें भी गहरी-गहरी हैं| उन्होंने ऊँघती दीपशिखा का सिर तकिये पर रखा- “अब सो जाओ, गुडनाइट|”

“गुडनाइट माँ|”

दीपशिखा के कमरे की दूधिया चाँदनी सी रोशनी से बाहर निकलते ही सुलोचना को तेज़ बल्बों की चकाचौंध ने दबोच लिया| वे घबराई हुईतो थीं ही..... उत्तेजितभी हो गईं..... “महेश, लाइट क्यों जल रही है अब तक?” एकख़ामोशआहट..... कमरा अँधेरे में कैद हो गया और उससे भी गहन अँधेरे में सुलोचना..... क्या होगा दीपू का? आकाँक्षाओं का भँवरजालन ले डूबे कहीं? देर रात तक सुलोचना अपने बिस्तर पर करवटें बदलती रहीं| तीन बजे के क़रीब नींद आई होगी और सुबह छै: बजे खटपट से नींद खुल भी गई|देखा, बाल्कनी में दीपशिखा प्राणायाम कर रही थी और दाई माँ जूसर में से लौकी का जूस निकाल रही थी|महेश दीपशिखा के कपड़ों में आयरन कर रहा था| सब कुछ व्यवस्थित..... दीपशिखा भी सधी-सधी सी, प्राणायामके बाद वह वॉकर पर आ गई|

“हाय माँ..... गुडमॉर्निंग, नींद अच्छी आई? इधर आइए बाल्कनी में| समंदर की ताज़ी हवा के संग उड़ते परिंदों को देखिए..... वाओ..... ब्यूटीफुल..... अब बताइए, पीपलवाली कोठी से दिखता है ऐसा नज़ारा?”

पसीने से लथपथ वह फर्श पर ही बैठ गई..... नेपकिन से पसीना सुखाते हुए बोली- “माँ..... देखो ये चार लाइनें कविता की सुबह-सुबह लिखीं| दाई माँ, जूसऽऽऽ”

सुलोचना अब तक एक शब्द भी नहीं बोली थीं| दीपशिखा के रूटीन वर्क को मुग्ध हो निहार रही थीं| बदलाव तो आया है बेटी में| पर इतना और इस तेज़ी से आयेगा, उन्होंने सोचा न था|

अगली सुबह शेफ़ाली ने सरप्राइज़ दिया- “हम आ गये हैं मुम्बई|”

“अरेवाह, अच्छासरप्राइज़ दिया| इसीलिएदो दिन से चुप थी तू|”

“तूने कौन सा फोन किया? तू भी तो.....”

“अरे यार, माँ आई हैं|”

“पता है मुझे..... आरही हूँ बारह बजे तक| तू अपना पता एस एम एस कर|दीदी ने आज से नौकरी ज्वाइन कर ली| अभी हम वर्किंग वुमन हॉस्टल में हैं|” शेफ़ाली ने पूरा समाचार एक ही साँस में कह डाला| दीपशिखा ने फोन रखते ही माँ से कहा- “माँ, शेफ़ाली और दीदी आ गई हैं| दाई माँ..... आज बैंगन का भरताज़रूर बनाना, शेफ़ाली को बहुत पसंद है|”

अपनी प्राणों से भी प्यारी सखी के स्वागत में वह और भी कुछ सोचती कि सुलोचना ने कहा- “अच्छा हुआ शेफ़ाली आ गई..... मैं भी कल लौट रही हूँ| अब निश्चिंतता रहेगी|”

निश्चिंतता रहेगी!! दीपशिखा के मन में कुछ खटका..... तो क्या माँ उसके इस महानगर में अकेले रहने की वजह से चिन्तित हैं? मगर क्यों?

बारह बजे उसने शेफ़ाली को अटैंड किया..... दिन भर गपशप, खानापीना| शाम को स्टूडियो भी ले जाकर दिखाया| मुकेश से भी मिलवाया लेकिन वह ‘क्यों’ उसके ज़ेहन में दिन भर अटका रहा| अगर वह माँ की जगह होती तो वह भी शायद ऐसा ही सोचती लेकिन माँ के लहज़े में ‘कुछऔर’ की बू भी थी जिसके लिए वह खुद को मना नहीं पा रही थी| उसके हर क़दम का माँ ने, पापा ने साथ दिया..... फिर? सुलोचना के जाने के बाद भी कई दिनों तक वह बेचैन रही..... टुकड़ों-टुकड़ों में बँटकर उसने रूटीन तो निभाए पर हर बार वह उन मौकों पर मन से ग़ैरमौजूदरही|

अद्भुत दुनिया से परिचित हो रही थी दीपशिखा|चित्रकला,रॉकपेंटिंग, फोटोग्राफ़ी| फोटोग्राफ़ी में भी छायाचित्रों को मिलाजुलाकर अनोखे दृश्य प्रस्तुत करना| मुकेश को इसमें कमाल हासिल था| रॉकपेंटिंग में शेफ़ाली बेजोड़ थी|शेफ़ाली दीपशिखा के साथ उसके स्टूडियो में चार पाँच घंटे काम कर लेती थी| जास्मिन, सना, एंथनी, शादाब, आफ़ताबसब अच्छे दोस्त बन गये थे| सबका मक़सद एक था, लगन एक थी..... हौसले एक थे पर चुनौतियों को झेलने की ताक़त अलग-अलग थी|दीपशिखा को बहुत आनंद मिलता था, इन सबों के बीच| शेफ़ाली का मानना था-“रॉक पेंटिंगप्रकृति से सीधा साक्षात्कार कराती है| अजंता की गुफाओं पर की कला आदिम युग में मानव की मूर्तिकला की सबसे पहली साक्षी कही जा सकती हैं| ऊर्जा का स्रोत जो प्रागैतिहासिक युग के रहस्यों को अपने में छुपाए है|” दीपशिखा कैनवास पर गढ़े चित्रों को रहस्यमय समझती थी जिसकी एक-एक रेखा न जाने कितने रहस्यों से भरी है|

सभी चित्रकार हुसैनसे मिलने के इच्छुक थे| जहाँ एक ओर वे किंवदंतीबन चुकेहैं वहींदूसरी ओर अपनी सनक औरजूनून के लिये भी मशहूर हैं| शेफ़ाली को 'हुसैनदोशी गुफ़ा’ देखने की तमन्ना है जो अजंता की गुफ़ा के तर्ज़पर बनी है और जिसमें हुसैनकी पेंटिंग लगी हुई है|

“चलोहम देखकर आते हैं‘हुसैनीगुफ़ा'|”

सना के प्रस्ताव पर शादाब चहककर बोली- “तुम लोगों ने अभी तकहुसेनी गुफ़ानहीं देखी..... माशाअल्लाह मिरेकिल है, थोड़ी ज़मीन के नीचे है तो थोड़ी ऊपर..... मानो एकऐसा कैपसूल जो एयर स्पेस में बस छूटना ही चाहता हो| वहाँ उनके काले कटआउट कुछ इस तरह बिखरे हैं जैसे ख़ामोश, गुमनाम परछाईयाँ चल रही हों..... सन्नाटा इतना कि ख़ामोशी तकसुनाई न दे|”

“क्या बात है शादाब..... तुम तो शायरा हो सकती हो|” सना मंत्रमुग्ध हो बोली| एंथनी ने ज़ोरदार ठहाका लगाया- “ये और शायरा..... इसे तो उर्दू तक ठीक से नहीं आती..... और है मुसलमान|”

शादाब तुनक गई- “एंथनी, तुम मेरा मज़ाक मत उड़ाया करो|”

“अरे, बुरामान गईं?” एंथनी के लहज़े में माफ़ीनामा था|

“बुरा न मानने के लिए दिल को मनाना पड़ रहा है, वह कह रहा है सबको चाय समोसे खिलाओ|”

ताबड़तोड़ ऑर्डर दिया गया|

“एक ट्रीट जास्मिन की बाकी है| उसकी पेंटिंग्स काफी अच्छे दामों में बिकी हैं एग्ज़िवीशनमें|”

“हाँ तो एक ही दिन इतना नहीं खाना है और जास्मिन की ट्रीट तो शानदार होगी| चाय समोसे से काम नहीं चलेगा| समोसे गर्मागर्म थे..... सभी के बीच बहस के मुद्दे भी गर्मागर्म थे| माहौल खुशनुमा था| और खुशनुमा क्यों न होगा मशहूर हस्तियों की कला ने भी इसी इंस्टिट्यूट ने निखार पाया है|शादाब जिनकी फैन है वे हुसैनभी यहाँ चित्रकारी करते थे|इसइंस्टिट्यूट की बरसों से देखभाल करते उम्रदराज़ सैयद साहब जिन्हें सब चचा कहते हैं बताते हैं कि “हुसैनका कहना ही क्या था..... लाजवाब चित्रकार| उन दिनों उन्होंने एक फिल्म बनाई थी ‘थ्रू द आइज़ऑफ़ ए पेंटर’ जिसकी शूटिंग राजस्थान के जैसलमेर और रेगिस्तानी इलाक़ों में हुई थी|मैं भी उनके साथ था| कई दिन हम वहाँ रहे और हुसैनने एहसास नहीं होने दिया कि हम अपने घर से इतनी दूर हैं|”

सैयद चचा जब भी फुरसत मेंहोते चित्रकारों के किस्से सुनाते| दीपशिखानेजाना कि चित्रकलाएक तपस्या है जिसमें शुरूआती मेहनत और कष्ट के बाद का हासिल रोमांचक है| वह उस हासिल में दिलोजान से जुट गई|

“क्यों न हम सब एकजुट होकर एक प्रदर्शनी लगाएँ जिसमें सभी के चित्रोंकीमिलीजुली प्रस्तुति हो|” आफ़ताब के इस सुझाव पर सभी के चेहरे खिल उठे|

“अभिनव प्रयोग रहेगा यह| जहाँगीर आर्ट गैलरी में तारीख़ें देख लेते हैं कि कब वहाँ जगह उपलब्ध है और काम में जुट जाते हैं|” सना जोश में थी|

“मेरा भी एक सुझाव है|” मुकेश ने कहा|

“हाँ, बोलोन|”

हम आठों मिलकर एक आर्ट ग्रुपस्थापितकरते हैं और उसी के तहत प्रदर्शनी लगाएँगे|”

मुकेश के सुझाव पर सभी उछलपड़े- “अरे वाह यार..... क्या आइडिया है कसम से..... जहाँ को लूट लेंगे हम|”

एंथनी ने एक फ्लाइंग किस मुकेश की तरफ़ उड़ाया|

“हाँ..... तो पहले कॉफ़ी..... कॉफी के साथ ग्रुप का नामकरण होगा|”

फोन पर कॉफ़ी का ऑर्डर दिया गया|थोड़ी देर बाद सबके हाथों में कॉफ़ी के मग थे और स्टूडियो में ख़ामोशी|दीपशिखा ने पर्ची पर लिखा अंकुर ग्रुप ऑफ़ आर्ट’| सैयद चचाको बुलाया गया| नाम की पर्ची उन्हीं से निकलवाई गई और इत्तफ़ाक़कि दीपशिखा की पर्चीही सैयद चचा ने निकाली|नामकरणके साथ ही सैयद चचा नारियल और बेसन के लड्डू ख़रीद लाए| मुकेश ने नारियल फोड़कर सभीकेस्टूडियो में उसका पानी छिड़का और अगरबत्तियाँ लगाई गईं| यह एक ऐसी पहल थी जिसने सभी को जोश और उत्साह से भर दिया था| दूसरे दिन शादाब और एंथनी जहाँगीर आर्ट गैलरी जाकर प्रदर्शनी की तारीख़ पक्की कर आये और गैलरी बुक करा आये| सारा ख़र्च दीपशिखा ने दिया| सबसे पहले निमंत्रण पत्र बना|

“अंकुर ग्रुप ऑफ़ आर्ट की प्रस्तुति..... चित्रकलारॉकपेंटिंग और छायाचित्रों (ट्रांसपेरेंसियाँ) का अनूठा संगम| प्रायोजक- दीपशिखा|”

“नहीं, मेरा नाम नहीं आना चाहिए|” दीपशिखा ने विरोध किया|

“क्योंख़र्च तो तुम्हीं कर रही हो|”

“तो क्या हुआ, हम सब अंकुर के ही तो सदस्य हैं|”

“ओ.के..... ओ.के.....” मुकेश ने सबको शांत किया|

“ऐसा करते हैं जब हमारे चित्र बिकेंगे तो हम उसमें लागत शामिल करके शेयर कर लेंगे इसलिए प्रायोजक का नाम मत दो..... क्यों दीपशिखा, ठीक है न|”

फिर भी दीपशिखा भुनभुनाती रही| स्टूडियो से निकलकर सब अपनी-अपनी राह हो लिए थे| मुकेश, दीपशिखा प्रियदर्शिनीपार्क की ओर चले आये|नारियल के पेड़ों के इर्द गिर्द की चट्टानों पर बैठते हुए दीपशिखा ने सामने फैले समंदर की ओर देखा..... लहरें शांत थीं- “दीप, क्यों हर बात मन पर ले लेती हो?” मुकेश ने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया|

“मैं ऐसी ही हूँ|”

दीपशिखा के बालों का क्लिप मुकेश ने शरारती अंदाज़में निकाल लिया| रेशमी सुनहले बालों के संग हवाएँ सरगोशियाँ करने लगीं- “और मैं ऐसा हूँ|”

“वो तो मैं जानती हूँ|” दीपशिखा ने उसके कंधे पर अपना सिर टिका दिया- “तुम्हें जाना तभी तो तुम मेरा हाथ अपने हाथों में लेने का साहस कर पाए|”

“मैं खुशनसीब हूँ, मुझको किसी का प्यार मिला|”

“हूँऽऽ आज तुम मस्ती के मूड में हो..... जाओ..... पॉपकॉर्न लेकर आओ..... आज मैं तुम्हें अपनी कविता सुनाऊँगी|”

“माय गॉड..... पॉपकॉर्न खाते हुए कविता पाठ??”

“जाओ न यार..... भूख लगी है|”

रात दबे पाँव शमा के क़रीब आ चुकी थी| समुद्री हवाओं में खुनकी घुलने लगी थी|

“मेरे लिए सूरज का डूबना सच है क्योंकि मैं सूरज का उगना देख ही नहीं पाता|” मुकेश ने पॉपकॉर्न चबाते हुए कहा|

“क्यों? मैं तो हर सुबह सूरज को उगता देखती हूँ..... मासूम सा..... गोल..... नारंगी..... बिनाकिरनों वाला लेकिन झिलमिलाता|”

“फीमेल की यही तो फितरत है..... जो चमकदार है उसका साथ देती हैं|”

“ऐसा तुम सोचते हो| तुम मर्दों की सोच ही संकीर्ण है|”

“शुक्रिया..... शुक्रिया जानेमन..... हाँ तो मैं कह रहा था कि मेरे लिए सूरज का डूबना सच है|मैं जो देखता हूँ वही मेरे लिए सच है| सूर्योदय के समय मैं सोता रहता हूँ|सूरज को अगर समंदर में डूबते हुए देखो तो लगता है जैसे समंदर के हर क़तरे ने बड़ी शिद्दत से उसे अपने में समेट लिया है|” और कैमरे की स्क्रीन पर वह डूबते सूरज की तस्वीरें दिखाने लगा- “मैं जो प्रदर्शनी के लिएचित्रबनाऊँगा न, उसकी थीम ही रहेगी डूबता सूरज|”

“मेरी थीम आदिवासी| मैं आदिवासियों पर पहले से ही काम कर रही हूँ|”

“तुमथीम का नाम देना प्रकृतिपुत्र|”

गहराती रात में दीपशिखा और मुकेश चट्टान से उठकर तट पर टहलने लगे| सैलानियों की भीड़ के बावजूद दोनों एक दूसरे में डूबे थे| मुकेशने दीपशिखा को बाँहों में भरकर चूम लिया| समंदर का क़तरा-क़तरा पुकार उठा..... महर्बा..... महर्बा..... दोनों के दरम्यान वक़्त मानो थम सा गया| लहरें किनारों तक आकर लौटना भूल गईं, रेत में समाने लगीं| समंदर से बर्दाश्त नहीं हुआ, उसने रेत के संग ही लहरों को वापिस खींच लिया|

और दिनों की बनिस्बत आज दीपशिखा को घर लौटने में देर हो गई थी| दाई माँ पाँच छै: बार फोन कर चुकी थीं और हर बार दीपशिखा का जवाब होता..... काम में बिज़ी हूँ, लौटने में देर होगी|”

“इतनी देर कहाँलगा दी बिटिया..... मारे घबराहट के हम तो.....” दीपशिखाने झट दाई माँ के गाल चूम लिए- “क्या दाई माँ..... अब मैं बड़ी हो गई हूँ| पर तुम मुझे अभी भी तोतली गुड़िया ही समझती हो..... छोती छी..... पाली..... पाली.....”

उसने तुतलाकर अपनी ही नक़ल उतारी| दाई माँ लाड़ से उसे देखती रहीं| दीपशिखाको दाई माँ लगती भी बहुत सुंदर हैं| गोरा-गोरा मुखड़ा..... काली भंवरे सी ऑंखें और पतले-पतले गुलाबी होठ.....

जब सुलोचना की शादी हुई थी तो उनके साथ मायके से दहेज़ के रूप में दाई माँ ही आईं थीं- चूँकि अंतर्जातीय विवाह था बल्कि अंतरधार्मिक भी इसलिए कहीं ससुराल में सुलोचना अकेली न पड़ जाएँ तो संग कर दी गई थीं दाई माँ जो सुलोचना की ही उम्र की थी| वो भी तब जब सुलोचना के लिए मायकेका दरवाज़ा खुल गया था| शुरू-शुरू में तो वे हर दो महीने बाद छुट्टी लेकर अपने पति महेशचंद्र के पास चली जातीं पर फिर यूसुफ़ ख़ानने महेशचंद्र को अपने कारोबार में नौकरी पर लगा दिया| पीपल वाली कोठी के सर्वेंट क्वार्टर में दोनों की गृहस्थी बस गई|दो लड़कियाँ हैं उनकी| अब तो घर द्वारवाली हो गईं| दोनों की पढ़ाई-लिखाई, शादी ब्याहका ख़र्च यूसुफ़ ख़ान ने ही उठाया| बहुतसारे एहसानों का बोझ लिए दोनों मियाँ बीवी पीपलवालीकोठी के लिए समर्पित रहे| सुलोचना को और यूसुफ़ख़ान को उन दोनों पर इतना विश्वास है कि वे दीपशिखा की ओर से एकदम निश्चिंत हैं| दाई माँ को तो लगता ही नहीं कि दीपशिखा उनकी बेटी नहीं है|

टेबिल पर खाना लगाकर दाई माँ फुलके सेंकने लगीं| दोफुलके खाती है दीपशिखा जो दाई माँ हमेशा गर्मागर्महीपरोसती है उसे| खाना खाते हुए सारे दिन की घटनाओं का बयानसुने बिना दाई माँ उसे सोने नहीं देती| लेकिन दीपशिखा सावधान है| वह भूल से भी मुकेश का ज़िक्र नहीं छेड़ती| अगर बात खुल गई तो हो सकता है पाबंदियाँ शुरू हो जाएँ क्योंकि पल-पल की ख़बर दाई माँ के ज़रिए यूसुफ़ ख़ान और सुलोचना तक पहुँच जाती है|पीपलवालीकोठी में दिन की और रात की शुरुआत दाई माँ के फोन से ही होती है| दीपशिखा के जन्म के पहले सुलोचना को विशाल कोठी मानो काटने को दौड़ती थी लेकिन अब..... कोठी के हर कोने, हरवस्तु में दीपशिखा की मौजूदगी का एहसास है| एक शाम कोठी के लॉन में चायपीते हुए यूसुफ़ ख़ानने कहा भी- “तुम हर महीने एक चक्कर मुम्बई का लगा लिया करो|”

“कहो तो दीपू की शादी होने तक वहीं रह जाऊँ?”

“शादी? ये अचानक तुम्हें क्या सूझी? इस ओर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया|” यूसुफ़ ख़ान के चेहरे पर चिन्ता झलक रही थी|

“दीपू अब छब्बीस की हो गई| तुम क्या उसे बच्ची ही समझ रहे हो?सवालये उठता है कि लड़का किस कौम में तलाशा जाये|”

सुलोचनाकी आँखों की दुविधा यूसुफ़ ख़ान तुरन्त समझ गये| थोड़ा सम्हले- “लड़का मुस्लिम ही होगा|”

“ज़रूरी तो नहीं, हिन्दू भी हो सकता है| यह तो दीपू की पसंद पर निर्भर करता है|”

“यानी कि अब अपना भला बुरा वह सोचएगी? वह तय करेगी कि हिंदू में शादी हो कि मुस्लिम में..... है उसे इतनी समझ?”

***