चर्चित यात्राकथाएं...

चर्चित यात्राकथाएं

दिल्ली में1

शाहनामा3

सूरत का कहवाघर7

भारत-यात्रा : कुछ नोट्स11

बनारस का सूर्यग्रहण14

1758 से पहले की ब्राह्मण-कथा20

भवानी जंक्शन22

आलिया के मन्दिर में27

शवदाह32

दिल्ली में

इब्नबतूता

इब्नबतूता (1304-1368-69) मोरक्को का निवासी, 22 वर्ष की आयु में यात्रा पर प्रस्थान। 28 वर्ष तक अरब, पूर्वी अफ्रीका, भारत, चीन, फारस, दक्षिणी रूस, मिस्र, फलासतीन् , स्पेन आदि का भ्रमण।

अगले दिन हम सुलतान मुहम्मद शाह की अनुपस्थिति में देहली पहुँचे। यह हिन्दुस्तान का महानगर है। एक विशाल और शानदार शहर। खूबसूरत और शक्तिशाली। यह चारों ओर एक ऐसी दीवार से घिरा हुआ है जिसके समान संसार में कोई दीवार नहीं। यह हिन्दुस्तान का ही सबसे बड़ा शहर नहीं है, बल्कि सभी मुस्लिम राज्यों में सबसे बड़ा शहर है। मैं 8 जून 1334 को सुलतान तिलबेट के दुर्ग से लौट आया जोकि राजधानी से सात मील दूर था। वजीर ने हमें सुलतान के पास जाने का आदेश दिया। घोड़ों, ऊँटों, फल, तलवारों आदि के उपहारों के साथ दुर्ग के द्वार पर पहुँचे। हरेक का सुलतान से परिचय कराया गया और प्रत्येक की स्थिति के अनुसार उसे सुलतान ने उपहारों से सम्मानित किया। जब मेरी बारी आयी, मैंने देखा कि सुलतान एक कुरसी पर विराजमान हैं। जब मैं दो बार सलाम कर चुका तो सुलतान के अमीर ने कहा-बिस्मिल्लाह मौलाना बदरुद्दीन। हिन्दुस्तान में मुझे बदरुद्दीन के नाम से बुलाया जाता था। और मौलाना शब्द आदर के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। मैं सुलतान के निकट पहुँचा। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। मेरे हाथ को हौले से दबाया और मेरा हालचाल पूछा।

सुलतान ने काफी सुलतान किया और मेरे व्यय के लिए बारह हजार दीनार देने का वादा किया। यह बारह हजार दीनार पाने के लिए छह महीने तक इन्तजार करना पड़ा और इस बीच मुझ पर पचपन हजार का ऋण हो गया। ऋणदाता अपने रकम की माँग करने लगे। मैं बेफिक्र था क्योंकि मुझे मालूम था कि जब सुलतान यह बात सुनेगा तो मेरा कर्जा चुका देगा। वहाँ का रिवाज था कि ऋणदाता महल के द्वार पर ऋणी की प्रतीक्षा करता है। पर हाय! सुलतान के दुश्मन मेरे पीछे पड़ गये। कहने लगे-तुझे सुलतान के सर की कसम, जब तक मेरा ऋण नहीं चुकाएगा, महल के भीतर प्रवेश नहीं करेगा। ऋणी तब तक वह स्थान नहीं छोड़ता, जब तक ऋण चुका नहीं देता था या कुछ और मोहलत नहीं ले लेता था।

मेरे ऋणदाताओं ने ऐसा ही किया और इस पर सुलतान ने अपने एक अमीर को ऋण की रकम पूछने के लिए भेजा। ऋणदाताओं ने कहा, “पचपन हजार दीनार।” सुलतान ने फिर कहला भेजा, “माबदौलत तुमसे कहते हैं कि तुम्हारी रकम हमारे कब्जे में है। हम तुम्हारे साथ इंसाफ करेंगे। तुम अब इससे रकम नहीं माँगना।”

सुलतान ने दो अधिकारियों को ऋणदाताओं के कागजात की तस्दीक करके खजांची के पास रकम देने के लिए भेज दिया। खजांची लालची था। वह रिश्वत चाहता था। इसलिए उसने रकम अदा नहीं की, जबकि मैंने दो हजार दीनार भेजे लेकिन उसने वापस लौटा दिये। वह पाँच हजार माँग रहा था। और मैंने इतनी रकम देने से इनकार कर दिया। सुलतान के कानों में इस बात की भनक पड़ी तो उसने खजांची को कुछ समय के लिए मुअत्तल कर दिया और उसके चरित्र की जाँच का हुक्म दिया।

कुछ दिन बाद सुलतान शिकार पर चल दिया। मैं भी तैयार होकर उसके पीछे चल दिया। एक दिन सुलतान ने अपने दरबारियों से पूछा, “यह बाहर कौन है?”

एक दरबारी नसरुद्दीन ने कहा, “जनाब! वही मुराकाका मौलाना जोकि बहुत विक्षिप्तावस्था में है।”

“लेकिन ऐसा क्यों?” सुलतान ने उत्सुकता से पूछा और दरबारी ने जवाब दिया, “अपने ऋण की वजह से, क्योंकि उसके ऋणदाता अपनी रकम के लिए अभी भी उसे तंग कर रहे हैं। आपने वजीर को रकम अदा करने के लिए हुक्म दिया था लेकिन वजीर रकम चुकाने से पहले कहीं चला गया। क्या माबदौलत ऋणदाताओं को वजीर की प्रतीक्षा के लिए नहीं कह सकते या इस ऋण के भुगतान का आदेश नहीं दे सकते? अमीर दौलतशाह ने भी इस बात का अनुमोदन किया।

तब सुलतान ने कहा, “जब हम राजधानी को लौटें तो तुम खुद खजाने से यह रकम लाकर इसे दे देना।” खजांची भी वहाँ हाजिर था। वह बोला, “हुजूर! यह आदमी बहुत फिजूलखर्च है। मैंने पहले से इसे अपने मुल्क में भी फिजूलखर्ची करते हुए देखा है।” लेकिन सुलतान ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। सुलतान ने मुझे अपने साथ खाना खाने के लिए बुलाया। मुझे बिलकुल पता नहीं था कि मेरी अनुपस्थिति में क्या बात हुई है। जब मैं खेमे से बाहर निकला तो नसीरुद्दीन बोला, “दौलत शाह का शुक्रिया अदा करो।” और दौलत शाह ने व्यंग्य से कहा, “खजांची का शुक्रिया अदा करो...”

राजधानी लौटने पर खजांची ने तीन बोरियों में रकम भर भेज दी। 55 हजार दीनार ऋण के और 12 हजार दीनार वह जो सुलतान ने पहले देने का वादा किया था, लेकिन अपना दसवाँ हिस्सा जरूर काट लिया था।

***

शाहनामा

फिरदौसी

शहंशाह अकबर के जमाने में लिखी मुगलिया सल्तनत का असली दस्तावेज है - शाहनामा। इसे फिरदौसी, पूरा नाम अबुल कावीमे मंसूर, ने लिखा। फिरदौसी का जन्म खुरासान के शादाब गाँव में सन् 932 ई० में हुआ था।

कन्नौज के राजा कैद ने लगातार दस रातों तक दस सपने देखे। दसों सपने देखकर वह बहुत पसोपेश में पड़ा, जब कुछ भी समझ में न आया तो उसने अपने दरबार में विद्वान तपस्वी मेहराम को बुलवाया और दसों सपने सुनाये-

पहला सपना: एक बड़ी इमारत थी, महल की तरह। पर उसका दरवाजा बहुत छोटा था। उस पतले दरवाजे में एक बहुत बड़ा और मरखना हाथी फँसा हुआ था। पर वह विशाल हाथी उस दरवाजे से बड़े आराम से निकल आया। सिर्फ उसकी सूँड भीतर टूटकर रह गयी। बस, फिर सुबह हो गयी।

दूसरा सपना: वही महल था और मैं उसमें रह गया था, कि मेरी मौत हो गयी। मुझे हटाकर एक तरफ कर दिया गया। और एक नया राजा सिंहासन पर बैठ गया। उसका मुकुट हीरों-सा चमक रहा था। बस, फिर सुबह हो गयी।

तीसरा सपना: कपड़े की एक बहुत बड़ी सफेद चादर थी, उसे चार कोनों पर चार आदमी पकड़े हुए अपनी-अपनी तरफ खींच रहे थे। खींचते-खींचते उनके चेहरे नीले पड़ गये पर कपड़े की वह चादर नहीं फटी। बस, फिर सुबह हो गयी।

चौथा सपना: एक पतली-सी नदी के पास एक बहुत प्यासा आदमी खड़ा था। उसे प्यासा देखकर नदी की एक मछली निकली, ऊपर उछली और उस पर उसने पानी डाल दिया। आदमी ने यह देखा तो उछलकर सूखी जगह में खड़ा हो गया। पानी बहकर उसके पास पहुँचा, पर वह प्यासा आदमी भागने लगा। पानी उसके पीछे-पीछे बहता रहा। बस, फिर आँख खुल गयी।

पाँचवाँ सपना: एक शहर था जिसके रहने वाले सबके सब अन्धे थे। पर कोई परेशान नजर नहीं आता था। शहर में खूब तिजारत और कामधाम चल रहा था। बस, फिर आँख खुल गयी।

छठा सपना: एक शहर देखा, जिसमें सब बीमार थे। एक तन्दुरुस्त आदमी वहाँ कहीं से आया और वह बीमारों से तन्दुरुस्त रहने की दवा पूछता फिरता रहा। बस, फिर आँख खुल गयी।

सातवाँ सपना: एक घोड़ा था, जिसके चार पाँव पर दो सिर थे। वह मैदान में खूब घास चर रहा था। पर उसके पीछे फारिग होने का रास्ता नहीं था। बस, फिर आँख खुल गयी।

आठवाँ सपना : तीन घड़े रखे थे। दो लबालब पानी से भरे थे। एक खाली था। दो आदमी उनमें भर-भरकर पानी डाल रहे थे, पर न तो भरे घड़ों का पानी फैलता था न खाली घड़े में नमी आती थी। बस फिर आँख खुल गयी।

नौवाँ सपना: एक तन्दुरुस्त गाय आराम से घास पर लेटी थी। उसके पास एक मरी हुई बछिया पड़ी थी। वह तन्दुरुस्त गाय उस मरी बछिया का दूध पी रही थी। बस, फिर आँख खुल गयी।

दसवाँ सपना: एक महल देखा - उसके मैदान में चश्मा था। पूरा मैदान पानी से भरता जा रहा था। पर चश्मा बिलकुल सूखा था। बस, फिर आँख खुल गयी।

दसों सपने सुनकर विद्वान तपस्वी मेहराम ने कन्नौज के राजा कैद से कहा कि सिकन्दर नाम का एक राजा हमला करने वाला है, उससे तुम लड़ना मत। तुम अपनी सुन्दरी पुत्री; और वह दार्शनिक जिसने तुम्हें दुनिया के रहस्य बताये हैं, और वह वैद्य जो तुम्हारे राज्य में सबसे विख्यात है, और वह अद्भुत प्याला, जिसमें पानी पीने से कभी समाप्त नहीं होता - चारों चीजें सिकन्दर को देकर दोस्ती कर लेना। इसी में तुम्हारी भलाई है।

और इतना कहकर मेहराम ने सपनों के अर्थ बताने शुरू किये - “राजन् पहले सपने का वह महल यह धरती है, और वह मरखना हाथी है - एक दुष्ट राजा। जिसके पास सिर्फ नाम ही नाम है और कुछ नहीं।

दूसरा सपना यह बताता है कि दुनिया की यही रीति है। एक राजा जाता है दूसरा आता है।

तीसरा सपना जिसमें सफेद कपड़ा नहीं फटता - वह सफेद कपड़ा है आदमी की आस्था और चारों कोनों से उसे खींचने वाले हैं धर्मों के वे पुरोहित जो अपने को ही सही मानते हैं। एक अग्निपूजक है, दूसरा देहकान, तीसरा यहूदी और चौथा है अरब - ये सब एक-दूसरे के पूरक हैं पर विरोधी बने हुए हैं।

चौथा सपना बताता है कि एक वक्त आएगा जब बुद्धिमान आदमी, जिसने ज्ञान का पानी पिया है, तुच्छ समझा जाएगा। बदमाश लोग उसे और प्यासा जानकर पानी के पास बुलाएँगे पर उसके साथ ठीक से व्यवहार नहीं करेंगे। वे उसे लांछित और अपमानित करेंगे और पानी ऐसे देंगे कि वह पी न सके।

पाँचवाँ सपना बताता है कि अन्धों का जो खुशहाल शहर है, एक दिन दुनिया ऐसी ही हो जाएगी। तब विद्वान सेवक होंगे और मूर्ख मालिक। ज्ञानवृक्ष भी तब फल नहीं देंगे। विद्वान मूर्खों की सेवा करेंगे ताकि दुनिया खुशहाल रहे पर वे सेवा करते हुए भी यह जानते रहेंगे कि वे एक झूठा नाटक खेल रहे हैं।

छठा सपना कहता है कि एक वक्त ऐसा आएगा जब अमीर गरीबों को हिकारत से देखेंगे यानि तन्दुरुस्त आदमी व्यंग्य से मरीज से तन्दुरुस्त रहने की दवा पूछेगा पर जब गरीब उनसे सेवा करने का मौका चाहेगा तो वे नहीं देंगे।

सातवें सपने का मतलब है कि दो सिर वाला घोड़ा वक्त का प्रतीक है - वह वक्त ऐसा होगा जब गरीब आदमी को उसके लायक खाना नहीं मिलेगा और कुछ आदमी इतने स्वार्थी हो जाएँगे कि वे अपने अलावा किसी और के बारे में नहीं सोचेंगे। न गरीब को खाना मिलेगा न ज्ञान।

आठवें सपने के अर्थ हैं कि एक वक्त ऐसा आएगा जब पानी से भरे हुए बादल सूरज को ढँक लेंगे और गरीब उसे नहीं देख पाएगा। अमीर-अमीर दोस्त होंगे - दोनों भरे घड़ों की तरह। पर गरीब खाली घड़े की तरह नमी भी नहीं पाएगा।

नौवें सपने में जहाँ तन्दुरुस्त गाय मरी बछिया का दूध पी रही है, वहाँ यह अर्थ है कि जब शनि तुला राशि में प्रवेश करेगा तो दुनिया शक्तिवान के पैरों तले कुचल दी जाएगी। गरीब और बीमार दुखी ही रहेंगे। लोग बातें करेंगे पर उनके दुखों को दूर करने की न कोशिश करेंगे न अपना धन देंगे।

दसवें सपने में जहाँ सोता सूखा है और मैदान पानी से भरा है, उसका अर्थ यह है कि एक जमाने में एक मूर्ख राजा होगा। उसकी आत्मा काले पश्चात्तापों से भरी रहेगी। वह बहुत धन जमा करेगा पर जो कष्ट उसके कारण प्रजा पर पड़ेंगे, उनसे धरती का चेहरा काला पड़ जाएगा। वह अपने सिंहासन को बचाने के लिए सेनाएँ बनाता जाएगा पर अन्त में न सेनाएँ रहेंगी न सिंहासन!”

और इतना बताकर विद्वान तपस्वी मेहराम उठ खड़ा होता है और चलते-चलते फिर राजा कैद को आगाह करता है कि सिकन्दर नाम का विश्वविजेता आने वाला है... राजा कैद को उसका स्वागत करके अपनी बहुमूल्य चारों चीजें उसकी नज़र कर देनी चाहिए।

***

हिन्दुस्तान पर मेरी नजर तैमूर लंग

मैंने हिन्दुस्तान को जीतने के लिए अपने लश्कर के सेनापतियों से मशवरा किया, चुनांचे उन्होंने मुझे विभिन्न मशवरे दिये। अमीरजादा पीर मुहम्मद ने हिन्दुस्तान को फतह करने और वहाँ धन-दौलत को हासिल करने की तजवीजें पेश कीं। अमीरजादा मुहम्मद सुलतान ने वहाँ के मजबूत किलों का जिक्र किया और कहा कि हाथियों का भी बन्दोबस्त होना चाहिए। सुलतान हसीन ने कहा कि अगर हम हिन्दुस्तान पर कब्जा कर लें तो दुनिया का एक चौथाई हिस्सा हमारा हो जाएगा। कई सरदारों ने कहा कि अगर हमने हिन्दुस्तान फतह कर लिया और वहाँ स्थायी तौर पर रहने लगे तो हमारे बेटे और पोते अपनी फौजी तंजीम से खारिज हो जाएँगे और इस तरह हमारी नस्ल बरबाद हो जाएगी। लेकिन चूँकि मैं अपने दिल में हिन्दुस्तान को फतह करने का दृढ़ संकल्प कर चुका था, इसलिए मैंने यह कहकर उनका मुँह बन्द कर दिया कि मैं कुरान मजीद से फाल निकालता हूँ और जो फाल निकली, उसके अनुसार अमल किया जाएगा।

फाल मेरे पक्ष में निकली और मैंने हमला की तैयारियाँ शुरू कर दीं। सबसे पहले मैंने अमीरजादा जहाँगीर को, जो काबुल का हुक्मरान था, यह हुकुम दिया कि वह तीस हजार सवारों के साथ कोहे-सुलेमान के रास्ते से हिन्दुस्तान जाए और मुलतान सूबा को फतह कर ले। सुलतान मुहम्मद को मैंने हुक्म दिया कि वह कोहे-कश्मीर के दामन से लाहौर पर हमला करे। मैं स्वयं तीस हजार सवारों का लश्कर लेकर हिन्दुस्तान की ओर बढ़ा।

मेरे हिन्दुस्तान पहुँचने की खबर सुनकर सुलतान महमूद हाकिम-देहली पचास हजार फौज और एक सौ बीस जंगली हाथियों समेत दिल्ली के किले में हलका-बन्द हो गया। उसे किले से निकालकर खुले मैदान में लाने की तदबीर मैंने यह सोची कि एक छोटी-सी फौज दुश्मन के मुकाबले के लिए रवाना कर दी और उन्हें यह ताकीद कर दी कि वह दुश्मन के मुकाबले में स्वयं को कमजोर जाहिर करके पराजय अख्तियार करें, चुनांचे ऐसा ही किया गया। नतीजा यह हुआ कि दुश्मन ने यह सोचकर कि दुश्मन की संख्या उनके मुकाबले में बहुत कम है और उसको आसानी से शिकस्त दी जा सकती है, किला खाली कर दिया और मैदान में आ गया। मैं पहले ही से कैम्प लगाकर और उसके इर्द-गिर्द खन्दक खोदकर मौके के इन्तजार में था। जब मैंने दुश्मन को अपनी तरफ आते और जंग में पहल करते देखा तो अपनी फौज को आम हमला करने का हुक्म दे दिया। नतीजा यह हुआ कि दुश्मन गलतफहमी में ही मारा गया और शिकस्त खाकर पहाड़ों की ओर भाग निकला। इस जंग में बेशुमार माल और साजो-सामान मेरे सिपाहियों के हाथ आया। बाकी हिन्दुस्तान की फतह करने में मुझे एक साल लगा। उसके बाद मैं, समरकन्द वापस लौट आया...

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सूरत का कहवाघर

लेव तोल्सतोय

सूरत नगर में एक कहवाघर था जहाँ अनेकानेक यात्री और विदेशी दुनिया भर से आते थे और विचारों का आदान-प्रदान करते थे। एक दिन वहाँ फारस का एक धार्मिक विद्वान आया। पूरी जिन्दगी ‘प्रथम कारण’ के बारे में चर्चा करते-करते उसका दिमाग ही चल गया था। उसने यह सोचना शुरू कर दिया था कि सृष्टि को नियन्त्रण में रखनेवाली कोई उच्च सत्ता ही नहीं है। इस व्यक्ति के साथ एक अफ्रीकी गुलाम भी था, जिससे उसने पूछा-बताओ, क्या तुम्हारे खयाल में भगवान है? गुलाम ने अपने कमरबन्द में से किसी देवता की लकड़ी की मूर्ति निकाली और बोला - यही है मेरा भगवान जिसने जिन्दगी भर मेरी रक्षा की है। गुलाम का जवाब सुनकर सभी चकरा गये। उनमें से एक ब्राह्मण था। वह गुलाम की ओर घूमा और बोला - ब्रह्म ही सच्चा भगवान है। एक यहूदी भी वहाँ बैठा था। उसका दावा था - इस्रायलवासियों का भगवान ही सच्चा भगवान है, वे ही उसकी चुनी हुई प्रजा हैं। एक कैथोलिक ने दावा किया - भगवान तक रोम के कैथोलिक चर्च द्वारा ही पहुँचा जा सकता है। लेकिन तभी एक प्रोटेस्टेण्ट पादरी जो वहाँ मौजूद था, बोल उठा - केवल गॉस्पेल के अनुसार प्रभु की सेवा करने वाले प्रोटेस्टेण्ट ही बचेंगे। कहवाघर में बैठे एक तुर्क ने कहा - सच्चा धर्म मोहम्मद और उमर के अनुयायियों का ही है, अली के अनुयायियों का नहीं, हर कोई दलीलें रख रहा था और चिल्ला रहा था, केवल एक चीनी ही, जोकि कॅन्फ्यूशियस का शिष्य था, कहवाघर के एक कोने में चुपचाप बैठा था और विवाद में हिस्सा नहीं ले रहा था। तब सभी लोग उस चीनी की ओर घूमे और उन्होंने उससे अपने विचार प्रकट करने को कहा।

कन्फ्यूशियस के शिष्य उस चीनी ने अपनी आँखें बन्द कर लीं और क्षण भर सोचता रहा। तब उसने आँखें खोलीं, अपने वस्त्र की चौड़ी आस्तीनों में से हाथ बाहर निकाले, हाथों को सीने पर बाँधा और बड़े शान्त स्वर में कहने लगा:

मित्रगण, मुझे लगता है लोगों का अहंकार ही उन्हें धर्म के मामले में एक-दूसरे से सहमत नहीं होने देता। अगर आप ध्यान से सुनें तो मैं आपको एक कहानी सुनाना चाहता हूँ, जिससे दृष्टान्त के रूप में यह बात साफ हो जाएगी।

मैं यहाँ चीन से एक अँग्रेजी स्टीमर से आया। यह स्टीमर दुनिया की सैर को निकला था। ताजा पानी लेने के लिए हम रुके और सुमात्रा द्वीप के पूरबी किनारे पर उतरे। दोपहर का वक्त था। हममें से कुछ लोग समन्दर के किनारे ही नारियल के कुंजों में जा बैठे। निकट ही एक गाँव था। हम सब लोगों की राष्ट्रीयता भिन्न-भिन्न थी।

जब हम बैठे हुए थे तो एक अन्धा आदमी हमारे पास आया। बाद में हमें मालूम हुआ कि सूर्य की ओर लगातार देखते रहने के कारण उसकी आँखें चली गयी थीं। वह यह जानना चाहता था कि सूर्य आखिर है क्या ताकि वह उसके प्रकाश को पकड़ सके।

यह जानने के लिए ही वह सूर्य की ओर देखता रहता। परिणाम यही हुआ कि सूर्य की रोशनी से उसकी आँखें दुखने लगीं और वह अन्धा हो गया।

तब उसने अपने आपसे कहा - सूर्य का प्रकाश द्रव नहीं है। क्योंकि, यदि यह द्रव होता तो इसे एक पात्र से दूसरे पात्र में उँड़ेला जा सकता था; तब यह पानी और हवा की तरह चलता भी। यह आग भी नहीं है, क्योंकि अगर यह आग होता तो पानी से बुझ सकता था। यह कोई आत्मा भी नहीं है क्योंकि आँख इसे देख सकती है। यह कोई पदार्थ भी नहीं है क्योंकि इसे हिलाया नहीं जा सकता। अतः, क्योंकि सूर्य का प्रकाश न द्रव है, न अग्नि है, न आत्मा है और न ही कोई पदार्थ, यह कुछ भी नहीं है।

यही था उसका तर्क। और, हमेशा सूर्य की ओर ताकते रहने और उसके बारे में सोचते रहने के कारण वह अपनी दृष्टि और बुद्धि दोनों ही खो बैठा। और जब वह पूरी तरह अन्धा हो गया, तब तो उसे पूरी तरह विश्वास हो गया कि सूर्य का अस्तित्व ही नहीं है।

इस अन्धे आदमी के साथ एक गुलाम भी आया था। उसने अपने स्वामी को नारिकेल-कुंज में बैठाया और जमीन से एक नारियल उठाकर उसका दीया बनाने लगा। उसने नारियल के रेशों से एक बत्ती बनायी, गोले में से थोड़ा-सा तेल निचोड़ कर खोल में डाला और बत्ती को उसमें भिगो लिया।

जब गुलाम अपने काम में मस्त था, अन्धे आदमी ने आह-सी भरी और उससे बोला - तो दास भाई, क्या मेरी बात सही नहीं थी। जब मैंने तुम्हें बताया था कि सूर्य का अस्तित्व ही नहीं है। क्या तुम्हें दिखाई नहीं देता कि अँधेरा कितना गहरा है? और लोग फिर भी कहते हैं कि सूर्य है... अगर है तो फिर यह क्या है?

मुझे मालूम नहीं है कि सूर्य क्या है - गुलाम ने कहा - मेरा उससे क्या लेना-देना। पर मैं यह जानता हूँ कि प्रकाश क्या है। यह देखिए, मैंने रात्रि के लिए एक दीया बनाया है जिसकी मदद से मैं आपको देख सकता हूँ और झोंपड़ी में किसी भी चीज को तलाश सकता हूँ।

तब गुलाम ने नारियल का दीया उठाया और बोला - यह है मेरा सूर्य।

एक लँगड़ा आदमी, जो अपनी बैसाखियाँ लिये पास ही बैठा था, यह सुनकर हँस पड़ा - लगता है तुम सारी उम्र नेत्रहीन ही रहे - उसने अन्धे आदमी से कहा - और कभी नहीं जान पाये कि सूर्य क्या है, मैं तुम्हें बताता हूँ कि यह क्या है, सूर्य आग का गोला है, जो हर रोज समन्दर में से निकलता है और शाम के समय हर रोज हमारे ही द्वीप की पहाड़ियों के पीछे छुप जाता है, हम सबने इसे देखा है और अगर तुम्हारी नजर होती तो तुमने भी देख लिया होता।

एक मछुआरा जो यह बातचीत सुन रहा था, बोला - बड़ी साफ बात है कि तुम अपने द्वीप से आगे कहीं नहीं गये हो। अगर तुम लँगड़े न होते और अगर तुम भी मेरी तरह नौका में कहीं दूर गये होते तो तुम्हें पता चलता कि सूर्य हमारे द्वीप की पहाड़ियों के पीछे अस्त नहीं होता। वह जैसे हर रोज समन्दर में से उदय होता है, वैसे ही हर रात समन्दर में ही डूब जाता है। मैं तुम्हें सच बता रहा हूँ, मैं हर रोज अपनी आँखों से ही ऐसा होते हुए देखता हूँ।

तब एक भारतीय, जो हमारी ही पार्टी का था, यों बोल उठा-मुझे हैरानी हो रही है कि एक अकलमन्द आदमी ऐसी बेवकूफी की बातें कर रहा है। आग का कोई गोला पानी में डूबने पर बुझने से कैसे बच सकता है? सूर्य आग का गोला नहीं है, वह तो देव नाम की दैवी शक्ति है, और वह अपने रथ में बैठकर स्वर्ण-पर्वत मेरु के चारों ओर चक्कर लगाता रहता है। कभी-कभी राहु और केतु नाम के राक्षसी नाग उस पर हमला कर देते हैं और उसे निगल जाते हैं, तब पृथ्वी पर अन्धकार छा जाता है।

तब हमारे पुजारी प्रार्थना करते हैं ताकि देव का छुटकारा हो सके - तब वह छोड़ दिया जाता है, केवल आप जैसे अज्ञानी ही, जो अपने द्वीप के बाहर कभी गये ही नहीं, ऐसा सोच सकते हैं कि सूर्य केवल उनके देश के लिए ही चमकता है।

तब वहाँ उपस्थित एक मिस्री जहाज़ का मालिक बोलने लगा - नहीं, तुम भी गलत कह रहे हो। सूर्य दैवी शक्ति नहीं है और भारत और स्वर्ण-पर्वत के चारों ओर ही नहीं घूमता। मैं कृष्ण सागर पर यात्राएँ कर चुका हूँ। अरब के तट के साथ-साथ भी गया हूँ, माडागास्कर और फिलिप्पिंस तक हो आया हूँ। सूर्य पूरी धरती को आलोकित करता है, केवल भारत को ही नहीं, यह केवल एक ही पर्वत के चक्कर नहीं काटता रहता, बल्कि दूर पूरब में उगता है - जापान के द्वीपों से भी परे-और दूर पच्छिम में डूब जाता है-इंग्लैण्ड के द्वीपों से भी आगे कहीं, इसीलिए जापानी लोग अपने देश को ‘निप्पन’ यानी ‘उगते सूरज का देश’ कहते हैं। मुझे अच्छी तरह मालूम है क्योंकि मैंने काफी दुनिया देखी है और अपने दादा से काफी कुछ सुना भी है, जो सभी समन्दरों की यात्रा कर चुका है।

वह बोलता चला गया होता अगर हमारे जहाज के अँग्रेज मल्लाह ने उसे रोक न दिया होता, वह कहने लगा-दुनिया में और कोई ऐसा देश नहीं है जहाँ के लोग सूर्य की गतिविधियों के बारे में उतना जानते हैं जितना इंग्लैण्ड के लोग, इंग्लैण्ड में हर कोई जानता है कि सूर्य न तो कहीं उदय होता है, न अस्त ही। वह हर समय पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता रहता है। यह सही बात है क्योंकि हम भी पूरी धरती का चक्कर लगा चुके हैं और कहीं भी सूर्य से टकराये नहीं। जहाँ कहीं भी हम गये सुबह सूर्य निकलता और रात को डूबता दिखाई दिया-यहाँ की ही तरह।

तब अँग्रेज ने एक छड़ी ली और रेत पर वृत्त खींचकर यह समझाने का प्रयत्न किया कि कैसे सूर्य आसमान में चलता रहता है और पृथ्वी का भी चक्कर लगाता रहता है, पर वह ठीक तरह समझा नहीं पाया और फिर जहाज के चालक की ओर इशारा करते हुए बोला - यह आदमी मुझसे ज्यादा जानता है। वह ठीक तरह समझा सकता है।

चालक, जो काफी समझदार था, चुपचाप सुनता रहा था, अब सब लोग उसकी ओर मुड़ गये और वह बोला - आप सब लोग एक-दूसरे को बहका रहे हैं। आप सब धोखे में हैं। सूर्य पृथ्वी के चारों ओर नहीं, पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है और चलते-चलते अपने चारों ओर भी घूमती है और चौबीस घण्टों में सूर्य के आगे से पूरी घूम जाती है - केवल जापान, फिलिप्पिंस, सुमात्रा ही नहीं, अफ्रीका, यूरोप और अमरीका तथा कई अन्य प्रदेश भी साथ घूमते हैं। सूर्य किसी एक पर्वत के लिए नहीं चमकता, न किसी एक द्वीप या सागर या केवल हमारी पृथ्वी के लिए ही, यह अन्य ग्रहों के लिए भी चमकता है। अगर आप अपने नीचे की जमीन से नजरें उठाकर जरा आसमान की तरफ देखें तो आपको सब समझ में आ जाएगा। तभी आप समझ पाएँगे कि सूर्य सिर्फ आपके लिए ही नहीं चमकता।

आस्था के मामलों में भी - कनफ्यूशियस के शिष्य चीनी ने कहा - अहंकार ही है जो लोगों के मन में दुराव पैदा करता है। जो बात सूर्य के सम्बन्ध में निकलती है, वही भगवान के मामले में सही है। हर आदमी अपना खुद का एक विशिष्ट भगवान बनाये रखना चाहता है - या ज्यादा से ज्यादा अपने देश के लिए हर राष्ट्र उस शक्ति को अपने मन्दिर में बन्द कर लेना चाहता है जिसे विश्व भी बन्द नहीं कर सकता।

क्या उस मन्दिर से किसी भी अन्य मन्दिर की तुलना की जा सकती है जिसकी रचना भगवान ने खुद सभी धर्मों और आस्थाओं के मानने वालों को एकसूत्र में बाँधने के लिए की है?

सभी मानवीय मन्दिरों का निर्माण इसी मन्दिर के अनुरूप हुआ है, जोकि भगवान की अपनी दुनिया है। हर मन्दिर के सिंहद्वार होते हैं, गुम्बज होते हैं, दीप होते हैं, मूर्तियाँ और चित्र होते हैं, भित्ति-लिपियाँ होती हैं, विधि-विधान-ग्रन्थ होते हैं, प्रार्थनाएँ होती हैं, वेदियाँ होती हैं और पुजारी होते हैं : पर कौन-सा ऐसा मन्दिर है जिसमें समन्दर जैसा फव्वारा है; आकाश जैसा गुम्बज है, सूर्य, चन्द्र और तारों जैसे द्वीप हैं और जीते-जागते प्रेम करते मनुष्यों जैसी मूर्तियाँ हैं? भगवान द्वारा प्रदत्त खुशियों से बढ़कर उसकी अच्छाइयों के ग्रन्थ और कहाँ हैं, जिन्हें आसानी से पढ़ा और समझा जा सके? मनुष्य के हृदय से बड़ी कौन-सी विधान-पुस्तक है? आत्म-बलिदान से बड़ी बलि क्या है? और अच्छे आदमी के हृदय से बड़ी कौन-सी वेदी है जिसपर स्वयं भगवान भेंट स्वीकार करते हैं?

जितना ऊँचा आदमी का विचार भगवान के बारे में होगा, उतना ही बेहतर वह उसे समझ सकेगा। और जितनी अच्छी तरह वह उसे समझेगा, उतना ही उसके निकट वह होता जाएगा - उसकी अच्छाई, करुणा, मानव के प्रति प्रेम की नकल करता हुआ।

इसीलिए जो आदमी सूर्य की रोशनी को पूरे विश्व में फैला देखता है, उसे अन्धविश्वासी को दोष नहीं देना चाहिए, न ही उससे घृणा करनी चाहिए कि वह अपनी मूर्ति में उस रोशनी की एक किरण देखता है, उसे नास्तिक से भी नफरत नहीं करनी चाहिए कि वह अन्धा है और सूर्य को देख ही नहीं सकता।

ये थे कनफ्यूशियस के शिष्य चीनी विद्वान के शब्द। कहवाघर में बैठे सभी लोग शान्त और खामोश थे। फिर वे धर्म को लेकर नहीं झगड़े, न ही उन्होंने विवाद ही किया।

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भारत-यात्रा : कुछ नोट्स

मार्क ट्वेन

अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन (1835-1910) अपनी हास्य रचनाओं के लिए विश्व-विख्यात हैं। लेकिन हास्य का यह माद्दा उनकी अपनी जिन्दगी की भी सबसे बड़ी खासियत था। ‘टॉम सॉयर’ और ‘हकलबेरी फिन’ जैसे उपन्यासों का रचयिता यह लेखक पहले दर्जे का घुमक्कड़ भी था।

20 जनवरी 1896! बड़ा रोशन दिन था। यों भी बम्बई में सर्दी नहीं होती पर जाड़ों के दिन बेहद खुशनुमा होते हैं। रोशनी और गुलाबी खुनकी। ऐसे ही खुशनुमा दिन एक लहीम-शहीम, शक्ल-सूरत से आर्य दिखने वाला व्यक्ति बम्बई में उतरा। वह सफेद सूट पहने था और स्ट्रा का हैट लगाये था। वह भारत घूमने और व्याख्यान देने आया था।

यह विशिष्ट व्यक्ति कोई और नहीं, अमरीकन गद्य का पिता सैमुएल लैंगहॉर्न क्लीमेंस था जिसे पूरी दुनिया मार्क ट्वेन के नाम से जानती थी। मार्क ट्वेन के साथ उनकी पत्नी और दो पुत्रियाँ भी थीं। यह सही है कि मार्क ट्वेन यात्रा पर निकले थे, पर जिन दारुण परिस्थितियों में इस महानतम लेखक को अपने देश से विश्वयात्रा पर निकलना पड़ा, वे अब अमरीका में तो मौजूद नहीं हैं पर विश्व के विकासमान देशों में अब भी वही परिस्थितियाँ मौजूद हैं।

मैंने जुलाई 1895 में अपना घर छोड़ा और कनाडा, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, दक्षिण अफ्रीका आदि के अलावा भारत भी आया। मैं इलाहाबाद भी गया और बनारस भी। कलकत्ता और दार्जिलिंग शहरों को बड़ी आत्मीयता से देखा। भारत के शहरों के कुछ भावभीने अंश :

इलाहाबाद : उन दिनों माघ मेला चल रहा था। कड़ाके की सर्दी, लाखों लोगों की भीड़, कल्पवास करते हुए लोग। धर्माधीशों के अखाड़े, गंगा के जल पर उड़ती हुई सुबह-सुबह की भाप और उधर मन्थर गति से बहती आती जमुना।

इतने लाख लोग किस आस्था के मातहत आते हैं। क्यों आते हैं, कैसे आते हैं इस माघ मेले पर! इस विराट मेले का आयोजन कैसे होता है? यदि अमरीका में यह हो तो करोड़ों डालर विज्ञापन पर खर्च करने पड़ें तब कहीं इतने लोग जमा हों, पर सुना है कि एक पैसे का हिन्दू पंचांग छपता है... या कोई पण्डित सिर्फ बता भी देता है - बस लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ गंगातट पर जमा हो जाती है।

अपार श्रद्धालु भीड़ को जनवरी की कटकटाती सर्दी में जमा होते देख आश्चर्य होता है। सचमुच यह अद्भुत है! किसी धर्म में लोगों की इतनी आस्था भी हो सकती है, इस पर तब तक विश्वास नहीं किया जा सकता जब तक आदमी खुद खुली आँखों से देख न ले। वृद्ध, बच्चे, जवान, अपंग, अन्धे, स्वस्थ-सभी तरह के लोग सैकड़ों मील की यात्रा करके चले आते हैं, बिला शिकायत, बिला अहसान के। यहाँ सब स्वतन्त्र हैं। किसी को मेले में आने का संकोच नहीं है। यह सबका मेला है, यह सब अपार प्रेम के वशीभूत होकर लोग करते हैं या भय से - मुझे नहीं मालूम पर जो भी हो, वह चाहे प्यार हो या भय, जो लाखों लोगों को यहाँ खींच लाता है - वह अद्वितीय है और अद्भुत! हम जैसे पश्चिमी लोगों की कल्पना से नितान्त परे!

बनारस : इलाहाबाद में मामूली जनता की श्रद्धा दिखाई दी पर इस अमिट श्रद्धा का स्रोत क्या है? वह कौन से नैतिक आध्यात्मिक बन्धन हैं जो इस जनता को बाँधते हैं, गहन आध्यात्मिक अनुभवों को कैसे इतना सरल कर लिया जाता है कि वे जनता तक पहुँच सकें! यह आश्चर्य की बात है। इसे अन्धविश्वास कैसे कहा जा सकता है? करोड़ों लोगों का विश्वास अन्धविश्वास कैसे हो सकता है? और फिर जो सदियों से चला आ रहा है।

बनारस का साधु : वह साधु सचमुच साधना और ज्ञान की सीमा तक पहुँच गया था, शायद यही आनन्द की स्थिति होती हो! मैं बेहद प्रभावित हुआ यह देखकर कि एक आदमी अपनी आन्तरिक शक्तियों को यहाँ तक विकसित और एकत्रित कर सकता है कि आदमी एकान्त में चला जाए, एक झोंपड़ी में रहे और पवित्र ज्ञान ग्रन्थों का अध्ययन मनन करे। नीति, नैतिकता और आत्मिक पवित्रता पर विचार करे और उसे प्राप्त भी करे।

हिन्दू धर्मशास्त्र मेरे लिए एक उलझी हुई चीज है, मेरी समझ से परे, पर हिन्दुओं में कुछ ऐसा है जो बेहद विशुद्ध है, प्रामाणिक है और विशिष्ट! हिन्दुओं के कर्मकाण्ड, परम्पराएँ और रीतिरिवाज सचमुच आकर्षण का विषय हैं।

उन साधु महात्मा को, जिनसे वे बनारस में मिले, मार्क ट्वेन ने अपनी पुस्तक ‘हकलबेरी फ़िन’ अपने हस्ताक्षर करके उन्हें दी... क्योंकि वे पुस्तकें पढ़ने में रुचि लेते थे। वे धर्मग्रन्थ पढ़ते थे और अपनी विशिष्ट वृत्ति में उन्होंने कहा - साधु-महात्मा को अगर ‘हकलबेरी फ़िन’ पुस्तक से कोई लाभ नहीं होगा, तो इतना मैं जानता हूँ कि कोई नुकसान भी नहीं होगा!

दार्जिलिंग : कलकत्ता से दार्जिलिंग जाना हुआ। दार्जिलिंग से खूबसूरत जगह दूसरी नहीं है। शान्त, सौम्य, रम्य और प्रकृति के निकट। अपराजेय हिमालय की गोद में चमकता हुआ मोती। कोहरा और उससे छनकर आती हुई सवेरे की धूप। पर्वत श्रेणियाँ और आसमान को छूते हुए पेड़। आँखमिचौली खेलते हुए जंगल और जंगलों में तरह-तरह के रंग-बिरंगे पक्षी।

दार्जिलिंग से कुछ खूबसूरत पक्षी वे अमरीका भी ले गये और अपने इस दार्जिलिंग प्रवास और छोटी-सी यात्रा के बारे में मार्क ट्वेन ने मोहासिक्त होकर लिखा -

इस धरती पर यदि सबसे खूबसूरत दिन मैंने कोई बिताया है तो वही दिन है जो दार्जिलिंग की यात्रा में बीता है... मन में ज्वार उठते थे, दिशाओं में मधुर संगीत था और प्रकृति में तल्लीनता! हिमालय की निचली श्रेणियों तक पहुँचना एक अनुभव था। जैसे सब कुछ दोषहीन था। अमलिन था और अपने में पूर्ण। सिवा इसके कि यह यात्रा-पथ सिर्फ पैंतीस मील का है... काश, यह पाँच सौ मील का होता, हजार मील का होता, अनन्त होता!

मार्क ट्वेन भारत में करीब तीन महीने रहे। इससे ज्यादा वे नहीं रुक पाये। पर वे खूब घूमे। अँग्रेजों की नजरों से उन्होंने भारत को नहीं देखा - वे अपनी दृष्टि से सब कुछ देख रहे थे और भारत की आत्मा को आत्मसात् कर रहे थे। उन दिनों भारतीय ग्रामों में पनघट एक ऐसी संस्था थी, जहाँ गाँव की हर स्त्री मिलती थी और गप्पें लड़ती थीं। बड़े-बड़े रिश्ते वहीं पनघट पर तय हो जाते थे। वचन लिये और दिये जाते थे। जब ऐसी ही किसी जगह से मार्क ट्वेन गुजरे तो उन्होंने भारतीय नारी को जिस वेश में देखा, उसके बारे में व्यक्त किया-

भारतीय नारी में बड़ी शालीनता है... इतनी उन्नत सीधी! और चाल में एक लय। सहज सुन्दरता और गरिमा से भरपूर। वक्र बाँहों में अटका हुआ घड़ा... जैसे उससे तस्वीर पूरी हो जाती हो। मुझे दुख है कि हमारे यहाँ की कामकाजी महिलाएँ भारतीय नारी की इस पूर्ण तस्वीर को सड़कों की शोभा बढ़ाने के लिए इस्तेमाल नहीं कर पाएँगी।

और इस व्यंग्य के बाद मार्क ट्वेन भारतीयों के बारे में भी कुछ याद करते हैं :

वे खुशदिल और धीरजवाले लोग हैं। बहुत दयालु। उनके चेहरों और तौर-तरीकों में एक प्रकृत आत्मीयता है। सहजतया भारतीयों में कोई बुरे दिल का आदमी भी हो सकता है, यह विश्वास नहीं होता। सचमुच - मुझे तो यह सोचकर ताज्जुब ही होता है कि यहाँ ठग होते थे। मन नहीं मानता कि ठग एक सच्चाई थे, लगता है वह कल्पना ही रही होगी।

भारतीय चरित्र और इतिहास, उनके रीति-रिवाज और धार्मिक विश्वास तथा विधि-विधान-पहेलियाँ प्रस्तुत करते हैं। यानी उनका सामना करना और समझना एक पहेली है। और इन्हें समझने की कोशिश की जाए, या जब कोई इन पहेलियों को समझाता है तो ये और भी उलझ जाती हैं। यानी ये पहेलियाँ ‘उस स्पष्टीकरण’ से ज्यादा सरल हैं!

भारतीय इतिहास की विरासत बहुत महान है। समस्त सभ्य दुनिया में जो चीजें शुरू हुईं उनकी शुरुआत भारत से ही हुई। पहली सभ्यता का उदय भारत में हुआ। भौतिक समृद्धि और आर्थिक सम्पन्नता का पहला युग भारत में आया। भारत हमेशा गम्भीर चिन्तकों से भरा रहा, सूक्ष्म बुद्धिवाद का स्रोत रहा। और इतना ही नहीं... इसकी खानें धातुएँ उगलती हैं, जंगल धनी हैं और धरती अमित फलदायी है...

यह देश मेरी कल्पना में अटका रहा था। इस परीदेश को मैं देखना चाहता था... एक स्वप्नदेश! एक ऐसा देश जो चाँदनी और कविता का देश है... जो हमारी उस दुनिया से, जहाँ हम रहते हैं, एक अविश्वसनीय तथ्य लगता है... और दूरवर्ती रहस्य!

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बनारस का सूर्यग्रहण

ऐल्डस हक्सले

ऐल्डस हक्सले का जन्म 1894 में हुआ। पहले पत्रकारिता की और फिर आलोचना लिखने लगे। ‘लिम्बो’ (कहानी संग्रह) ‘क्रीम मेलो’ (उपन्यास), ‘प्वाइण्टकाउण्टर प्वाइण्ट’ उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। उन्होंने कई देशों की यात्राएँ कीं। यह यात्रा-वृत्त उनकी कृति ‘दि जेस्टिंग प्लेट’ से लिया गया है।

सुना था कि बनारस में सूर्यग्रहण दिखाई देगा। पर उसे देखने के लिए धुँधले काँच से भी ज्यादा आस्था की पैनी आँखों की जरूरत थी। चूँकि ये हमारे पास नहीं थीं, इसलिए ग्रहण अनदेखा ही रह गया। हमें इस बात का अफसोस रहा हो, ऐसा भी नहीं। दरअसल उस दिन सुबह-सुबह नाव लेकर निकलने के पीछे हमारा उद्देश्य सूर्य पर पड़ती चन्द्रमा की छाया को देखना नहीं, बल्कि ग्रहण देखते हुए हिन्दुओं को देखना था, और सचमुच यह दृश्य कहीं ज्यादा दिलचस्प था।

वे लोग संख्या में दस लाख के आसपास रहे होंगे। किनारे पर बने घाटों के इर्द-गिर्द, सड़क की धूल में नंगे पाँव चलते हुए, कन्धों पर खाने के सामान और बर्तनों की गठरियाँ लटकाये, नये कपड़ों में सजे सैकड़ों, हजारों, लाखों हिन्दू उनमें से कई बहुत दूर से आ रहे थे, अनेक पर बुढ़ापा लदा था, और कई एक की पीठों पर बच्चे थे। वे सब ग्रहण लगे सूर्य के सम्मान में स्नान करने आये थे।

कुछ ही देर में अजगर सूर्य को निगल जानेवाला था। या यों कहें कि निगल जाने की कोशिश करने वाला था। इस खौफनाक दुश्मन के विरुद्ध भगवान की मदद करने के लिए बनारस में दस लाख हिन्दू औरतें और आदमी इकट्ठे हुए थे।

लगभग फर्लांग भर तक फैली सीढ़ियों के रूप में ये घाट गंगा में उतर जाते हैं। सारी सीढ़ियाँ खचाखच भर गयी थीं। मँझधार में आहिस्ता-आहिस्ता बहते हुए हम किनारे की ढलान पर बिखरे उस लम्बे-चौड़े जनसमूह को देखते रहे।

छोटे और अपेक्षाकृत अपवित्र घाटों पर भीड़ कुछ कम थी। ऐसे ही एक घाट पर हमने एक राजकुमारी को गंगा में उतरते देखा। सुनहरी झालरों और परदों से सजी एक पालकी लाल पगड़ी वाले छह कहारों के कन्धों पर सवार होकर भीड़ को काटती हुई सामने आयी। पानी के किनारे पर एक बजरा था, जिसकी खिड़कियों पर सुर्ख पर्दे टँगे थे। तेज चिल्लाहट के साथ छड़ी को हवा में हिलाते हुए एक खानसामानुमा नौकर रास्ता बनाता गया और आखिरकार डगमगाती हुई वह पालकी धीरे से जमीन पर उतरी। देखते-ही-देखते पालकी से लेकर बजरे के दरवाजे तक कैनवस की दीवारों का एक रास्ता तैयार हो गया। और तब अश्लील निगाहों से अपने आपको बचाते हुए वह राजकुमारी और उसकी सहेलियाँ पालकी से निकलकर बजरे तक पहुँचीं। पर जब बजरा नदी में धकेल दिया गया तो वे ही महिलाएँ उन सुर्ख परदों को हटाकर बेबाक नजरों से गुजरती नावों और हमारे कौतूहल भरे कैमरे को देखती रहीं। बेचारी राजकुमारियाँ। वे अपनी साधारण और आजाद बहनों के साथ गंगा में नहा भी नहीं सकती थीं। उन्हें बजरे के गन्दे पानी में ही डुबकी लगानी थी। खुले आसमान के नीचे बहती हुई पवित्र धाराएँ ही काफी मैली थीं। एक पुराने बजरे की अँधेरी तलहटी में जमा रहकर वह पानी और कितना गन्दा हो गया होगा।

हम लोग जलते हुए घाटों की ओर बढ़ चले, साफ-सुथरी चिताओं पर फैली तीन-चार लाशें आहिस्ता-आहिस्ता जल रही थीं, उनके इर्द-गिर्द सिर्फ सुलगती हुई लकड़ियाँ थीं। उनके पैर चिता से बाहर निकले हुए थे, गोया वे अपनी लम्बाई से छोटे बिस्तरों पर मैले-कुचैले कम्बल ओढ़े सोयी हों।

कुछ आगे चलकर हमने साधुओं की एक कतार देखी। वे पानी के नजदीक एक चट्टान पर समाधि लगाकर बैठे थे। जिस मुद्रा में वे बैठे थे, उसे भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता में सुझाया था। शायद भगवान कृष्ण को आत्मसाधना की कला के बारे में सभी कुछ पता था। उनके द्वारा सुझाये गये आसन को किसी भी तरह सुधारा नहीं जा सकता था। इकट्ठे हुए लाखों लोगों का शोर हवा में था, पर कोई भी आवाज उन ध्यानमग्न योगियों की साधना को तोड़ नहीं सकती थी।

तभी एकाएक शायद आस्था की आँख ने उस दैत्याकार अजगर द्वारा सूर्य का कुतरा जाना देख लिया, पानी के नजदीक खड़े हुए सभी लोग एक साथ डुबकी लगाने, कुल्ले करने, नाक साफ करने और मन्त्र उच्चारित करने में जुट गये। पुलिसवालों का एक दल निश्चित समय बाद उन्हें पानी से बाहर निकालने की कोशिश करने लगा ताकि दूसरे लोगों को भी स्नान करने का अवसर मिल सके। सामने के लोगों की कतार हजारों गज लम्बी रही होगी, और फिर भी उनके पीछे लाखों व्यक्ति इन्तजार कर रहे थे।

वक्त गुजरता गया। अजगर धीरे-धीरे सूर्य को कुतरता रहा। हम नाव में से तस्वीरें खींचते गये। उस अजगर के बावजूद हमारी गरदनों पर सूरज की तेज धूप पड़ रही थी। जब थकान और धूप बर्दाश्त से बाहर हो गयी तो हम आखिरकार किनारे पर लौट आये। घाटों को मुख्य सड़कों से जोड़नेवाली सभी सँकरी गलियाँ भिखमंगों से भरी हुई थीं। वे सब अपनी झोलियाँ और बर्तन सामने फैलाये जमीन पर बैठे थे। हर आने-जाने वाला उनके बरतनों में एक-एक मुट्ठी चावल डाल रहा था। भीड़ को धकेलते हुए हम लोग धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे, तभी सामने के दरवाजे से एक साँड़ बाहर निकल आया। शायद वह कोई पवित्र साँड़ था। बाहर निकलकर उसने नजदीक ही ऊँघते हुए एक भिखारी के बर्तन में मुँह डाला और सारी भीख हड़प ली। भिखारी बेखबर ऊँघता रहा, गम्भीरता से मुँह चलाता हुआ वह पवित्र हिन्दू जानवर वापस मुड़ा और जिधर से आया था, उधर ही गायब हो गया।

बेवकूफ और कल्पनाहीन होने के बावजूद जानवर कभी-कभी इनसानों से ज्यादा समझदारी दिखाते हैं। स्वभावतः वे सही वक्त पर सही काम करते हैं। भूख लगने पर खाते हैं, प्यास लगने पर पानी पीते हैं और मौसम आने पर काम-क्रीड़ा में जुटते हैं। इनसान चूँकि समझदार और कल्पनाशील हैं, इसलिए हर काम को करने से पहले आगे और पीछे देखते हैं, देखी हुई हर चीज के लिए वे कोई-न-कोई तर्कसंगत कारण हमेशा ढूँढ़ निकालते हैं। उनकी समझदारी कभी-कभी उन्हें खासा बेवकूफ भी बना देती है। उदाहरण के तौर पर कोई भी जानवर इतना समझदार और कल्पनाशील नहीं हो सकता कि सूर्यग्रहण को देखकर समझे या कहे कि अजगर सूर्य को निगलने की कोशिश कर रहा है। ऐसे, अद्भुत स्पष्टीकरण सिर्फ इनसान को सूझ सकते हैं, और सिर्फ इनसान ही अपने स्वयं के लाभ के लिए धार्मिक क्रियाओं द्वारा बाहर की दुनिया को प्रभावित करने की बात सोच सकता है।

साँड़ को भिखारी के कटोरे में से चावल साफ करते देखकर मैं यही सब सोचता रहा। एक तरफ दस लाख लोग दूर-दूर से चलकर तकलीफें, भूख और असुविधाएँ झेलते हुए कमरे तक के गन्दे पानी में नहाने सिर्फ इसलिए आये थे कि नौ करोड़ मील दूर स्थित नक्षत्र का भला हो सके, और दूसरी तरफ एक साँड़ आराम से विचरता हुआ सामने दीख पड़ने वाली पहली चीज से अपना पेट भर रहा था। शायद अपनी बुद्धिहीनता के कारण ही वह साँड़ अपने मालिकों से ज्यादा समझदारी दिखा रहा था।

मेरे ख्याल से अगर सूर्य को अपने हाल पर भी छोड़ दिया जाए तो कोई हर्ज नहीं है। पर फिर भी उसकी रक्षा करने के लिए गंगा के किनारे दस लाख हिन्दू इकट्ठे हुए थे। गलियों में फैली भीड़ को कन्धों से धकेलते हुए मैं सोचता रहा कि अगर भारत की रक्षा करने की नौबत आ पड़े, तो इनमें से कितने लोग इकट्ठे होंगे?

***सूरत शहर में

निकोलाई मनूची

निकोलाई मनूची का जन्म सन् 1639 के आसपास वीनस (इटली) में हुआ बताते हैं। वह चौदह साल की उम्र में घर से भागकर समरकन्द होते हुए ईरान पहुँचा, फिर हिन्दुस्तान। प्रस्तुत हैं निकोलाई मनूची के कुछ संस्मरण, जो हमारी कथा यात्रा को समृद्ध करते हैं।

मैं अपने अँग्रेज स्वामी के साथ जो अब मुझे नौकर नहीं, अपना बेटा समझता था, 12 जनवरी, 1653 को सूरत पहुँचा। जैसे ही जहाज सूरत की बन्दरगाह पर खड़ा हुआ, मेरे स्वामी ब्लामाउण्ट ने मुझसे कहा कि मैं सामान की देखभाल करूँ। वह अकेला किनारे पर उतरेगा और सबसे पहले किसी हमदर्द अँग्रेज व्यापारी से मुलाकात करेगा। मेरा स्वामी बहुत परेशान था। उसको इंग्लैण्ड के राजा ने जो राजदूतक पत्र दिये थे, वे नष्ट हो चुके थे और उसके पास यात्रा-व्यय भी लगभग खत्म हो चुका था।

मेरे स्वामी मुझे जहाज पर छोड़कर चले गये थे। चार घण्टे बाद जब मिस्टर ब्लामाउण्ट वापस आये तो वह खुश थे। वह सूरत के मुगल गवर्नर से मुलाकात कर चुके थे और उसे बता चुके थे कि वह इंग्लैण्ड के राजदूत के रूप में हिन्दुस्तान आये हैं और सम्राट शाहजहाँ से मुलाकात करना चाहते हैं। सूरत में उसी दिन हमारे ठहरने का उचित प्रबन्ध कर दिया गया।

दूसरे दिन मैं सूरत की सैर को निकला। लोग अधिकतर सफेद कपड़े पहने हुए दिखाई दिये। हिन्दू स्त्रियाँ बेपरदा थीं और मुसलमान औरतें कहीं नजर नहीं आती थीं। जिससे यह पता चल सकता कि अरब और ईरान की तरह यहाँ की मुसलमान औरतें भी अपना चेहरा छुपाती हैं या नहीं। सूरत में मैंने हर व्यक्ति को खून थूकते हुए देखा। शुरू में मैंने यह समझा कि शायद यहाँ के लोगों को दाँतों की कोई बीमारी है लेकिन बाद में मुझे यह पता चला कि ये लोग पान खाते हैं और यह खून नहीं, बल्कि उसी पान की पीक है। एक दिन मैंने भी एक पान खाया। पान खाते ही मेरा सिर चकराने लगा। चेहरे का रंग सफेद हो गया और मैं अर्द्धचेतावस्था में धरती पर बैठ गया। एक अँग्रेज स्त्री उस समय मेरे निकट मौजूद थी, उसने मुझे नमक चटा दिया।

सूरत में हम 75 दिन ठहरे। इस नगर की कुल आय शाहजहाँ की बड़ी लड़की जहाँआरा को, जिन्हें आमतौर पर बेगम साहिबा कहा जाता है, पानदान के खर्च के लिए मिलती है। मुझे यह नगर बहुत पसन्द आया और इसकी खूबसूरती और सफाई देखकर मुझे स्वयं अपना नगर वीनस याद आ गया।

यहाँ मेरी कई फ्रांसीसी व्यापारियों से भी मुलाकात हुई। जान नाम का एक अँग्रेज व्यापारी, जो मेरे स्वामी की आर्थिक सहायता कर रहा था, से भी मुलाकात हुई। आखिर वह दिन भी आ गया, जब हमें आगरा चलना था।

पन्द्रह दिन की यात्रा के बाद हम बुरहानपुर पहुँच गये। बुरहानपुर एक छोटा-सा नगर है जिसके चारों ओर फसील नहीं है। यहाँ बहने वाला दरिया का पानी साफ और मीठा है। बुरहानपुर में ईरानी और आरमेनी व्यापारी काफी संख्या में रहते हैं। यहाँ बहुत नफीस और उम्दा कपड़ा बुना जाता है।

बुरहानपुर में फल बड़ी अधिकता से पैदा होते हैं। विशेषतः आम तो बहुत मात्रा में होता है। नगर के चारों ओर जो जंगल हैं, उनमें जानवर भी बड़ी अधिकता से पाये जाते हैं, लेकिन सैलानियों को चाहिए कि वे हरगिज इन जंगलों में प्रवेश न करें क्योंकि जैसे ही वे जंगल में प्रवेश करेंगे, डाकू या ठग उनको लूट भी लेंगे और उनकी हत्या भी कर देंगे। स्वयं मेरे साथ भी ऐसा होते-होते रह गया था।

मैं अपने काफिले के साथ जा रहा था कि मुझे एक मोर नजर आया। मैं घोड़े से उतरकर उस मोर की ओर दबे पाँव बढ़ने लगा। बन्दूक मेरे हाथ में थी। सहसा मैंने देखा, कि दो आदमी धनुष-बाण लिये मेरी ओर दौड़ते चले आ रहे हैं। मैं लपककर अपने घोड़े पर सवार हो गया और मैंने उन पर एक फायर कर दिया। फायर की आवाज सुनते ही वे रुक गये और मुझ पर बाण चलाने लगे, लेकिन उस समय तक मैं अपना घोड़ा सरपट दौड़ा चुका था।

मैं अब तक ईरान और तुर्की का भ्रमण कर चुका हूँ, लेकिन इन दोनों मुल्कों में मुझे कहीं भी यात्रा की वह सुविधा नहीं नजर आयी जो यहाँ मुगल हिन्दुस्तान में मिलती है। यहाँ हर जगह बादशाह ने यात्रियों के ठहरने के लिए सरायें बना दी हैं। ये सरायें एक छोटे-मोटे दुर्ग की तरह होती हैं। सराय का इंचार्ज सरकारी नौकर होता है जो सूरज डूबने के बाद सराय का फाटक बन्द कर देता है। सराय में केवल यात्रियों को ठहरने की इजाजत होती है। फौजी सिपाही उसमें नहीं ठहर सकते। मैंने रास्ते में कई सरायें इतनी बड़ी देखीं कि उनमें हजार-हजार यात्री ठहरे हुए थे। उनके साथ उनके घोड़े, खच्चर, ऊँट और हाथी भी थे। सराय में क्रय-विक्रय के लिए एक बाजार भी होता है और औरतों का हिस्सा मर्दों से अलग होता है। सराय का सारा खर्च बादशाह बर्दाश्त करता है।

चलते-चलते कई रोज बाद हम ग्वालियर पहुँचे। जहाँ एक बहुत भव्य दुर्ग है। इस दुर्ग में मुगल बादशाह अपने सम्मानित और शाही कैदियों को रखते हैं। दुर्ग कुछ इस अन्दाज में एक पहाड़ी पर बना है कि उस पर किसी ओर से हमला नहीं किया जा सकता। और यहाँ का कोई कैदी फरार नहीं हो सकता है। ग्वालियर में फूलों से इत्र निकालने का काम होता है।

ग्वालियर में संगीतकार बहुत अधिकता में रहते हैं। यहाँ गाने का शौक आम है। प्रसिद्ध है कि यहाँ जो पहाड़ हैं, वहाँ से ही देवताओं ने पहली बार दुनिया को राग-रागनियों का पाठ दिया था। ग्वालियर से तीन दिन के सफर के बाद हमें चम्बल नदी मिली और उसके बाद धौलपुर। उसी जगह 1658 में औरंगज़ेब और दाराशिकोह में एक निर्णयात्मक युद्ध हुआ था। मैं भी उस लड़ाई में दारा के साथ शामिल था।...

चार दिन के बाद हम आगरा पहुँचे। यहाँ के गवर्नर ने जब सुना कि इंगलैण्ड का राजदूत आया है तो उसने हमें रहने के लिए एक शानदार मकान दे दिया। जैसे ही नगर में हमारे आगमन की खबर फैली, आगरा में रहने वाले अँग्रेज मेरे स्वामी से मिलने के लिए पहुँच गये। हर रोज दावतें हुईं जिनमें मेरे स्वामी को उपहार भी दिये गये। आगरा में उस समय बादशाह नहीं ठहरे हुए थे, वह दिल्ली में थे। इसलिए मेरे स्वामी दिल्ली की ओर चल दिये।

काश! मुझे उस समय पता लग जाता कि मुझपर उस किशोरावस्था में क्या मुसीबत पड़नेवाली है तो मैं... हरगिज-हरगिज आगरा से न जाता और न अपने स्वामी को जाने देता।

यह हिन्दुस्तान में मेरी पहली मुसीबत थी।

मुसीबतें मुझ पर इसके बाद भी बेहद पड़ीं। मैं यहाँ हफ्तों भूखा रहा, महीनों आवारागर्दी करता रहा। कभी मैं नकली हकीम बना और कभी तोपखाने का उच्चाधिकारी लेकिन आगरा और देहली के बीच मुझे जिस संकट का आकस्मिक सामना करना पड़ा, वह सदा याद रहेगा।

अभी हमें आगरा छोड़े हुए केवल तीन ही दिन हुए थे। शाम करीब थी। हमें दूर से सराय नजर आ रही थी कि सहसा मेरे स्वामी पीड़ा से चिल्लाने लगे और उन्होंने मुझसे पानी माँगा। मैं अभी पानी लेकर उसके पास पहुँचने भी न पाया था कि वह उसी जगह गिरे और मर गये। उस समय शाम के पाँच बजे थे। 20 जून 1653 का दिन खत्म हो रहा था। किसी तरह मैं अपने स्वामी का शव सराय तक ले आया। सराय के इंचार्ज को जब यह मालूम हुआ कि यह शव ब्रिटिश राजदूत का है तो उसने तत्काल स्थानीय मुगल अफसर को सूचना दी। सूचना मिलते ही वह अफसर वहाँ पहुँच गया और उसने राजदूत के सारे सामान पर सील लगा दी।

सारा दिन मैं रोता रहा। सुबह कुछ आदमियों की सहायता से मैंने अपने स्वामी की कब्र खोदी। जिस समय मैं शव कब्र में उतार रहा था, शव का पेट गरमी की तीव्रता से फट गया। इतनी दुर्गन्ध फैली कि कुछ आदमी उसी स्थान पर बेहोश हो गये।

शाम तक मेरे स्वामी के सारे नौकर मुझे छोड़कर चले गये। सामान मुगल अफसर जब्त कर ही चुका था। मैं बिलकुल अकेला सराय के फर्श पर बैठा रोता रहा। किसी ने मुझे दिलासा तक न दिया। संयोगवश एक आदमी आगरा जा रहा था। मैंने उसे एक अँग्रेज के नाम पत्र दिया जो आगरा में एक कारखाना चलाता था, और उसे सारी कहानी लिख दी।

आठ दिन तक मैं उसी सराय में पत्र के उत्तर की प्रतीक्षा करता रहा। नौवें दिन दो अँग्रेज सराय में आये। ये दोनों मुगल फौज का लिबास पहने हुए थे और घुड़सवार फौज के कप्तान लगते थे। उन दोनों ने आते ही मुझसे कहा कि वे दोनों सम्राट के आदेशानुसार राजदूत का सारा सामान अपने अधिकार में लेने आये हैं, क्योंकि यहाँ जब कोई अमीर या राजदूत मरता है तो उसका सारा सामान शाही सम्पत्ति घोषित कर दिया जाता है। मैंने कहा कि राजदूत के सामान में मेरा सामान भी शामिल है जो मुझे दे दिया जाए लेकिन उन्होंने हँसकर मेरी बात टाल दी।

ये दोनों अँग्रेज सामान सहित दिल्ली की ओर चल दिये। मैं भी उनके साथ-साथ चलता रहा। राह में कई बार मैंने उनसे प्रार्थना की कि वह कम से कम मेरा सामान मुझे दे दें, जिस पर स्मिथ ने मुझसे कहा - ज्यादा जबान न चलाओ, नहीं तो हम तुम्हारा घोड़ा भी छीन लेंगे और तुम्हारी बन्दूक भी। इस धमकी के बाद मैं चुप हो गया, लेकिन मैंने उनका पीछा न छोड़ा।

मैं दिल्ली पहुँच गया। वहाँ मैंने अपने सामान की वापसी के लिए सम्राट शाहजहाँ के दरबार में फरियाद की। सम्राट ने दोनों अँग्रेजों को गिरफ्तार कर लिया और मेरा सामान मुझे वापस दिला दिया। इसी समय मुझे एक बार लालकिले में जाने का अवसर मिला। जहाँ मेरी मुलाकात दाराशिकोह से हुई। अब मैं जवान हो चुका था। दाराशिकोह ने दया करके मुझे तोपखाने में गोलन्दाज के रूप में नौकर रख लिया और मेरी तनख्वाह अस्सी रुपये माहवार निश्चित कर दी। लेकिन 1658 में दारा को औरंगजेब के मुकाबले धौलपुर के स्थान पर पराजय हो गयी। वह भागकर आगरा आ गया और वहाँ से दिल्ली फरार हो गया। मैं भी भागी हुई फौज के साथ आगरा आ गया था और यहाँ फँसकर रह गया था। मेरा दिल चाहता था कि मैं किसी-न-किसी तरह आगरा से भागकर अपने स्वामी दारा के पास पहुँच जाऊँ, अतः जिस दिन औरंगज़ेब अपने लश्कर को लेकर दिल्ली रवाना हुआ, उसी दिन मैंने भी एक फकीर का भेष बदला और मुगल फौज में शामिल होकर दिल्ली की ओर बढ़ने लगा।

दिल्ली पहुँचा तो दारा वहाँ से भी भाग चुका था। मैंने जब यह सुना कि दारा लाहौर चला गया है तो मैं भी लाहौर की ओर चल दिया। जब मैं लाहौर पहुँचा तो दारा वहाँ मौजूद था। वह मुझे देखकर बहुत खुश हुआ और उसने मेरी वफादारी को स्वीकार करते हुए मुझे पाँच सौ रुपये और एक सरापा इनाम दिया। मुझे उसने एक घोड़ा भी दिया और मेरी तनख्वाह बढ़ाकर सौ रुपये माहवार कर दी।

लाहौर से दारा के साथ मैं मुलतान गया और वहाँ से भक्कर। भक्कर में मुझे तोपखाने का उच्चाधिकारी नियुक्त किया गया। भक्कर में ही दारा को आखिरी शिकस्त हो गयी। वह गिरफ्तार हो गया और उसकी फौज ने हथियार डाल दिये। अब दारा की फौज के सभी फिरंगी कर्मचारी नयी नौकरी की खोज में दिल्ली चले गये, लेकिन मैंने अपने स्वामी दाराशिकोह के हत्यारे की नौकरी करना पसन्द नहीं किया और दिल्ली जाने की बजाय पूर्व की ओर चल दिया...

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1758 से पहले की ब्राह्मण-कथा

वाल्तेयर

कुरुमण्डल तट की सीमाओं में आजकल कुछ ऐसे ब्राह्मण भी देखने में आते हैं जिन्होंने परम्परागत आलस्य को तजकर फ्रांसीसी और अँग्रेज नागरिकों के साथ लेन-देन शुरू कर लिया है और ये दोनों, या दोनों में से एक भाषा सीखकर दुभाषिये का काम करने लगे हैं।

मानवीय अस्तित्व का सम्पूर्ण वैभव और करुणा आदि ब्राह्मणों व उनके उत्तराधिकारी नये ब्राह्मणों की कहानी में झलक उठती है। एक ओर तो विविध श्लेषोपमाओं से अलंकृत, फन्तासी - किन्तु ठोस, एक ऐसे दर्शन का वे पोषण करते हैं जो नाना दुरूह निषेधों व दमनोपचारों के माध्यम से आत्मन् की श्रेष्ठता स्थापित करता है, हिंसा से विरत व जीवात्मा के प्रति दयाशील रहना सिखाता है। दूसरी ओर त्रासदी मिथ्यास्थाएँ हैं। मूलतः शान्तिपूर्ण होने के बावजूद इस कट्टरपन्थ के कारण सदियों से वे सतीप्रथा को प्रोत्साहित करते रहे।

ईश्वर हमसे केवल शुभ व पुण्य कर्मों की ही इच्छा करता है : आस्था सम्भरण के ब्राह्मणों के इस प्रसिद्ध व्यवसाय में आत्मन् की महानता और धर्मान्धता के अतिरेक के ये परस्पर विरोधी तत्त्व आज भी साथ-साथ पाये जाते हैं। स्कैफ्टन बताते हैं कि उनके मतानुसार ईश्वर चाहता है कि विभिन्न देशों में विभिन्न धर्म हों। यह मत निस्सन्देह निर्लिप्ति की ओर ले चलता है; उनका यह उत्साहपूर्ण विश्वास है कि संसार में केवल उन्हीं का धर्म सत्य है, केवल उन्हीं का धर्म ईश्वर प्रदत्त है।

चलने से श्रेयस्कर है बैठे रहो, बैठे रहने से श्रेयस्कर है लेट जाओ, जगे रहने से श्रेयस्कर है सो जाओ, और जीने से श्रेयस्कर है मर जाओ! अपनी प्राचीन पुस्तकों से यह निष्कर्ष-रेखा निकाल लेने के बाद वे अधिकतर कष्टहीन व असंवेद्य जीवन व्यतीत करने के आदी हो गये हैं। कुरुमण्डल तट की सीमाओं में आजकल कुछ ऐसे ब्राह्मण भी देखने में आते हैं जिन्होंने परम्परागत आलस्य को तजकर फ्रांसीसी और अँग्रेज नागरिकों के साथ लेन-देन शुरू कर लिया है और ये दोनों, या दोनों में से एक भाषा सीखकर दुभाषिये का काम करने लगे हैं। पूरे तट का एक भी ऐसा बड़ा व्यापारी नहीं है जिसके पास अपना ब्राह्मण न हो और जो उससे पारिश्रमिक न पाता हो। वे वफ़ादार, हाजिरजवाब व चतुर हैं जिन्होंने विदेशियों के साथ सम्बन्ध नहीं बनाये, उन्होंने अपने पूर्वजों की तरह ही अपनी आत्मा की शुद्धता व श्रेष्ठता कायम रखी है।

स्क्रैफ़्टन ने, और बहुतेरे दूसरों ने, इनके पास कुछ नक्षत्रीय गणक देखे थे जिनके आधार पर ये ब्रह्माण्ड के विषय में करोड़ों वर्ष भविष्य तक के फल-मान बता देते हैं। इनके बीच पहुँचे हुए गणितज्ञ और ज्योतिर्विज्ञ मिल जाते हैं किन्तु इसी स्तर पर ये, चीन और फ़ारस के कतिपय लोगों की भाँति, हास्यास्पद किस्म की विधि (भाग्य) सम्बन्धी ज्योतिर्वाणियाँ भी ठोंकते रहते हैं। इन स्मृतियों के सूत्रकार ने राजा के पुस्तकालय को ‘कर्मवेद’ की एक प्रति भेजी थी जिसमें वेदों के ‘भाष्य’ थे। यह पुस्तक वर्ष के प्रत्येक दिन के प्रति भविष्यवाणियों से भरी हुई थी और तदनुसार प्रत्येक दिन के प्रत्येक क्षण के लिए भाँति-भाँति के धार्मिक अनुष्ठानों का ब्यौरा दिया हुआ था। आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि दो सौ वर्ष पूर्व तक ऐसी ही ख़ब्तों के शिकार हमारे ज्योतिर्विज्ञानी व राजे-महाराजे भी थे, और पागलपन की इसी सीमा तक थे। ये ब्राह्मण, जिनके पास ये गणक हैं, अवश्य ही पहुँचे हुए सिद्ध, विज्ञ व दार्शनिक होंगे। कहते हैं कि व्यक्ति को छलना (संसार) में रहकर भी निस्पृह रहना चाहिए। कहते हैं, प्राचीन ब्राह्मण भी कहते थे, चन्द्र की जिन ग्रन्थियों पर ग्रहण लगता है, वह राहु और केतु का विभक्त शेष वस्तुतः एक अजगर का सर और धड़ है; और यह वही अजगर है जो सूर्य और चन्द्र पर क्रमशः आक्रमण करता है। यही अस्पष्ट वक्तव्य चीन में प्रचलित है। भारत में करोड़ों ऐसे लोग हैं जो ग्रहण के दिन गंगा में स्नान करते हैं और उक्त घातक अस्त्र की कठोरता को क्षत करने के लिए नाना अस्त्रों को आपस में टकराकर भयंकर निनाद उत्पन्न करते हैं। कमोबेश, यह इसलिए होता है कि धरती पर नाना विकारों का बोझ बढ़ गया है।

एकाधिक ब्राह्मणों ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हित के लिए मिशनरियों के साथ समझौते किये हैं, किन्तु धर्म का प्रश्न फिर भी, दोनों में कभी नहीं उभरा।

भारत आने के बाद, कहना ही पड़ेगा, इन मिशनरियों ने यह लिखने में अवांछनीय अविलम्बता बरती कि ब्राह्मण राक्षस-पूजा करते हैं, किन्तु शीघ्र ही उन्हें ईसाई मतावलम्बी बना लिया जाएगा। न तो कोई ब्राह्मण ईसाई बनाया जा सका और न ही कोई भारतीय राक्षस-पूजा करता पाया जा सका। रूढ़िवादी ब्राह्मणों को हमारे उन पादरियों से एक अनिर्वचनीय भय लगता था, जो मांस खाते थे, मदिरा पीते थे और घुटनों पर सिमटी नौजवान लड़कियों से ‘कन्फ़ैशंस’ लेते थे। अगर इनके रीति-रिवाज उन्हें मूर्तिपूजा के हास्यास्पद उदाहरण प्रतीत होते थे तो उन्हें इनके रीति-रिवाज अपराध प्रतीत होते थे।

आश्चर्य तो इस बात पर है कि सिवा चीनियों की कुछेक पुस्तकों के प्राचीन ब्राह्मणों की किसी भी पुस्तक में, न मिस्री मैनेथन में, न सैंकोनियॉटन अंशों में, न बैरोज में, न यूनानियों के यहाँ, न तुरकनों के यहाँ, कहीं भी उस यहूदी धार्मिक इतिहास का जिक्र नहीं मिलता जो कि वस्तुतः हमारा ईसाइयों का इतिहास है। नोडाह के बारे में एक शब्द नहीं, जिसे कि हम मानवीय वंश का रक्षक मानते हैं; उस आदम के बारे में भी नहीं जिसे हम मानव जाति का पिता मानते हैं; उसके प्राथमिक उत्तराधिकारियों में से किसी का नहीं। ऐसा कैसे हो सकता है कि इनकी पैतृकता तक किसी ने इसमें से एक घटना तो क्या एक शब्द तक न पहुँचाया हो? क्यों इतने सारे प्राचीन देश इसके विषय में कुछ नहीं जानते, और मेरे जैसे नये व नन्हे राष्ट्र को सब मालूम है?

इस महा आश्चर्य की तरफ थोड़ा ध्यान जरूर देना पड़ेगा, अगर हमें आशा है कि हम तह तक पहुँच जाएँगे तो पूरा भारत चीन, जापान, तार्तार और तीन चौथाई अफ्रीका नहीं जानते कि वह केन हुआ था या कैनान, जेअर्ड या मन्तसलाह, जो कि करीब-करीब हजार बरस जिन्दा रहा था। और दूसरे देश भी जान पाये तो कुस्तुन्तुनियाँ के बाद ही किन्तु दर्शन के ये मणिका-कण इतिहास के लिए महज अजनबी हैं।

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भवानी जंक्शन

जॉन मास्टर्स

भारतीय शाही नौसेना की बगावत बुधवार की शाम को शुरू हुई। अगले रविवार को मैं हमेशा की भाँति बटालियन ऑफिस में काम कर रही थी। डब्ल्यू ए. सीज बटालियन हेडक्वार्टर्स में काम करने के लिए नहीं है। फिर भी मैं वहाँ रुकी थी क्योंकि मुझे इस बात से खुशी मिलती कि मैं अकेली सैनिकों के पास रहूँगी - उन्हीं की तरह।

रेलकर्मचारियों की हड़ताल के कारण मालरा पर रुकी मालगाड़ी लूट ली गयी थी। लूटनेवालों को यह पहले से ही पता था कि उसमें गोला-बारूद है। उन्हें शायद अन्दाज था कि हड़ताल शुरू होने के समय गाड़ी कहाँ होगी। कर्नल सेवेज ने वहाँ से आते ही मुझसे कलक्टर की कार में शहर के दौरे पर साथ चलने को कहा।

शहर की सँकरी गलियाँ हमेशा की भाँति भीड़-भरी थीं, परन्तु वातावरण कुछ विशेष ढंग का था। लोग जोर-जोर से बातें करते झुण्डों में खड़े थे या अपनी सामने से खुली हुई दुकानों के पीछे वाले अँधेरे हिस्सों में जमा थे। नगरवासी ठीक मूड में नहीं हैं - कर्नल सैवेज ने कहा।

“नहीं, अभी शोर इतना ज्यादा है कि गम्भीर बात नहीं हो सकती। जब शहर शान्त हो और सड़कों पर कोई भी न हो, तब आपको तैयार होना पड़ता है,” कलेक्टर ने जवाब दिया।

हम स्टेशन पहुँचे, पैट्रिक ने तुरन्त कलक्टर से आकर कहा, “अभी-अभी किसी ने डेनिस पर गोली चलायी है, हड़ताली अभी तक हम पर छिपकर पत्थर फेंकते थे, अब हमें गोलियाँ मारी जा रही हैं, आपको कुछ करना चाहिए। नहीं तो, यदि ऐंग्लो इण्डियन ड्राइवरों और गार्डों ने भी रेलों को ले जाने से इनकार कर दिया तो मुझसे कुछ मत कहिएगा।”

मिस्टर गोविन्द स्वामी चुप रहे और हम वापस कार में आकर बैठ गये और उनके बँगले की तरफ चल दिये।

मैं बँगले के बड़े हाल में टेलीफोन के पास जा बैठी। खबरों पर खबरें आ रही थीं, लैनसन कलक्टर से बात करना चाहता था। उससे बात करके चोंगा रखते हुए उन्होंने कहा-यहाँ की कांग्रेस कमेटी के चेयरमैन सूराभाई एक बड़ी भीड़ को स्टेशन की तरफ ले जा रहे हैं। भीड़ तख्तियाँ लिये है-‘विद्रोही अमर रहें’, ‘आजादी के लिए करारी चोट’, ‘भारत छोड़ो’ नारे लगाने और तितर-बितर न होने के सिवा वे पूरी तरह शान्त हैं।

अपने हाथ पीठ पीछे बाँधे वह हाल में घूमते रहे। सहसा उन्होंने रुककर कहा, “मुझे ताज्जुब है, मिस जोन्स, पता लगाओ कि क्या जिले में कोई स्पेशल गाड़ी लाइन पर है या आनेवाली है।”

मैंने टेलीफोन पर पैट्रिक से बात की। सिथरी स्टेशन पर एक ट्रुप स्पेशल थी, जिसे यहाँ करीब चालीस मिनट में आ जाना था। मैंने उन्हें बताया। वह कर्नल सैवेज की ओर मुड़े और बोले, “मुझे पूरा विश्वास है सूरा भाई और उनके साथी उस गाड़ी को रोकने का प्रयत्न करेंगे।”

“कैसे?” कर्नल सैवेज ने पूछा।

कलक्टर ने कहा, “अहिंसा। वह और उनके ढेर सारे स्वयंसेवक पटरी पर लेट जाएँगे। ऐसा पहले भी हो चुका है। और इससे निबटना बड़ा कठिन है। हमें स्टेशन तुरन्त चलना चाहिए।”

स्टेशन के बाहर का अहाता लोगों से भरा था, सभी एकदम चुप। केवल लोगों के हिलने-डुलने से झण्डे चमक उठते थे - ‘भारत छोड़ो!’ ‘आजादी के लिए एक करारी चोट!’ मिस्टर गोविन्द स्वामी सूराभाई से बात करने लगे।

तभी मैंने देखा, कुछ लोग धीरे से स्टेशन के अन्दर दाखिल हो गये। मैंने कुछ नहीं कहा। उलटे, यदि यह पेटर की गाड़ी नहीं होती तो भारतीयों के हाथों कर्नल सैवेज को मूर्ख बनते देख मुझे खुशी हुई होती। कर्नल सैवेज ने स्वयं उन आदमियों को देख लिया था और कलक्टर से पूछा कि क्या वह चाहते हैं कि स्टेशन के गेट बन्द कर दिये जाएँ?

कलक्टर ने कहा, “नहीं, उन्हें अन्दर जाने दो। इसके खिलाफ कोई कानून नहीं है। इसके अलावा, एक दर्जन के लगभग लोग पहले से ही पटरी पर लेटे हुए हैं।”

मैंने सुना, उत्तेजित होकर सूराभाई कह रहे थे - “जैसा कि मैं कह रहा था मिस्टर कलक्टर, हम अपने नौसैनिक भाइयों को मौत के घाट उतारे जाने के खिलाफ अपना विरोध प्रकट करेंगे, भले ही यह गैर-कानूनी क्यों न हो। वे आपके भी नौसैनिक भाई हैं और मेरे भी, मिस्टर कलक्टर, हालाँकि आप ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के दास होने से अपने पद पर शोभा पाते हैं। हम विरोध करेंगे, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ - शान्तिपूर्ण, अहिंसक विरोध, परन्तु हम करेंगे जरूर।”

कलक्टर ने कहा, “अभी तक किसी को भी मौत के घाट नहीं उतारा गया है, सूराभाई।”

“बहादुर भारतीय नाविक!” सूराभाई ने चीखकर कहा, “उनकी आँखें निकली पड़ रही थीं। नौसेना के समुद्री लोगों पर गोलियाँ, बारूद और बम बरसाये जा रहे हैं। किसलिए? देश के झण्डे को ऊँचा उठाने के सामान्य काम के लिए, मि. कलक्टर।”

कलक्टर ने फिर कहा, “अभी तक किसी भी बागी का कुछ नहीं बिगड़ा है। सिर्फ बम्बई की सड़कों को छोड़कर कहीं भी हिंसा नहीं हुई है। वहाँ शहर के सारे बदमाश बाहर निकल आये - आपके इस जैसे विरोधों का फायदा उठाने के लिए - और उन्होंने लूट और दंगा-फसाद शुरू कर दिया।”

सहसा एक पत्थर हवा में कर्नल सैवेज को कुछ इंचों से छोड़ता, सनसनाया और एक जीप का विण्डस्क्रीन टूट गया। उसके अन्दर बैठे गोरखे भुनभुनाकर बाहर कूद पड़े और उन्होंने अपनी राइफलें व टॉमीगनें तान लीं।

कलक्टर ने कहा, “यह एक अहिंसक मिसाइल है न, सूराभाई?”

सूराभाई चुपचाप खड़ी भीड़ की तरफ मुड़े। वह चिल्लाये, “हिंसा बिलकुल नहीं, मैं प्रार्थना करता हूँ, मेरे दोस्तो! अपनी स्वाभाविक भावनाओं को अपने ऊपर हावी मत हो जाने दो।” वह कलक्टर की तरफ वापस मुड़े, “बहुत हो चुकी यह बहस! इसका कोई लाभ नहीं। अब मैं अपने साथियों का साथ देने जा रहा हूँ।” वह स्टेशन के भीतर चले गये। एक इंजिन ने लाइन पर सीटी दी, एक लम्बी और लगातार सीटी...

“अच्छा हो हम भी स्टेशन के भीतर चलें,” कलक्टर ने कहा।

कर्नल सैवेज ने कहा, “मैं सिंगवीर की पलटन को वहाँ लाता हूँ।” कलक्टर ने सहमति प्रकट की, परन्तु उनको पीछे ही रखने के लिए कर्नल से कहा, “व्यावहारिक रूप से कोई भी कुछ नहीं कर सकता, जब तक कि स्वयंसेवक थककर घर नहीं चले जाते, और यदि इसका वास्तव में कोई बड़ा भारी महत्त्व होता तो हम उन पर हौजों से पानी की तेज धार गिरवा सकते थे, या उन्हें कुचल तक सकते थे - हालाँकि मैं नहीं समझता कि हमें एक व्यक्ति से अधिक को कुचलना पड़ेगा। परन्तु यह कोई महत्त्वपूर्ण बात नहीं है।”

बीस गोरखों का एक दस्ता हमारे पीछे-पीछे प्लेटफॉर्म पर आया। कर्नल सैवेज ने उनसे कहा, “हर आदमी पूरे तीन गिलास पानी पी ले। यह हुक्म है।”

कुछ स्वयंसेवकों को छोड़कर जो प्लेटफॉर्म पर खड़े थे, अधिकांशतः आराम से रेलवे लाइन पर लेटे हुए थे। उनके सिर पटरियों का तकिया लगाये थे और हाथ पेट पर बँधे थे। वे लेटे-लेटे नारे लगा रहे थे। पेटर की सैनिक गाड़ी आ चुकी थी और स्टेशन के बीच में रोक दी गयी थी। उसका काउ कैचर सूराभाई से कुछ फीट की दूरी पर था।

कलक्टर ने प्लेटफॉर्म के किनारे पर आकर कहा, “मिस्टर सूराभाई! क्या आप जानते हैं कि यह गाड़ी जिसे आप यहाँ इतनी गरमी में रोके हुए हैं, हिन्दुस्तानी सैनिकों से भरी है जो अपनी सेवाओं की समाप्ति के लिए मद्रास जा रहे हैं?”

सूराभाई ने आँखें खोलीं - “यह कोई खास बात नहीं है। वे भी अँग्रेजों के दास हैं, आपकी तरह।”

अचानक मैंने देखा, प्लेटफॉर्म पर न जाने कहाँ से ढेर सारे लोग आ गये थे। वे धक्का-मुक्की कर हमारे पास जमा हो गये। एक पुलिसमैन ने चिल्लाकर कहा, “पीछे रहो!” और उसने अपनी लाठी पूरी ताकत से घुमायी। जैसे ही वह ठीक मेरी बगल में खड़े एक व्यक्ति के सिर में लगी, किसी चीज के टूटने की आवाज स्टेशन में चारों तरफ गूँज गयी। वह आदमी बिना किसी आवाज के आगे गिर पड़ा और उसके कान पर से होकर खून फर्श पर टपकने लगा। भीड़ गुर्रायी और पीछे हट गयी। उसमें से ईंटें और पत्थर फेंके जाने लगे, लेकिन मैं फेंकनेवालों को नहीं देख सकी।

कलक्टर ने कहा, “इंजिन पर पहुँच जाओ। जल्दी।” मैं झपटकर ऊपर चढ़ गयी और कैब की आड़ में हो गयी। पत्थर उससे आ-आकर टकरा रहे थे। बदले में फायरमैन ने बड़े-बड़े कोयले फेंकना शुरू कर दिया। पुलिस जब पूरी तरह से अपनी लाठियाँ घुमा रही थी, मैंने झाँककर देखा, कर्नल सैवेज और मिस्टर गोविन्द स्वामी अब भी वहीं खड़े थे। उसी क्षण एक ईंट का टुकड़ा मिस्टर गोविन्द स्वामी के कन्धे पर आकर लगा और वह लड़खड़ाकर पीछे हटे। कर्नल सैवेज ने उन्हें सहारा दिया।

मैं नर्वसनेस से रो पड़ने को ही थी और अपने आपको नियन्त्रण में रखने के लिए मुझे आँसू निगलने पड़ रहे थे। वे सब कितने भयानक और क्रूर थे! मैंने इसके पहले ऐसी कोई चीज नहीं देखी थी। मुँह बिचकाये लाठियाँ घुमाती पुलिस, भीड़ में खड़े आदमी, खूँखार चेहरे लिये, प्रहार करने की लालसा से भरे, मैंने एक औरत को डगमगाते देखा और चिल्लायी - ओह, नहीं! परन्तु पुलिसमैन ने उस पर दुबारा वार किया और वह गिर पड़ी। मैं आड़ में और नहीं रुक सकी और खड़ी होकर सब देखने लगी।

कर्नल सैवेज ने अपनी कार्बाइन आसमान की तरफ की और घोड़ा दबा दिया। पिस्तौल की आवाज के साथ ही अचानक शान्ति छा गयी। मिस्टर गोविन्द स्वामी हिन्दी में चिल्लाये - “मैं आप सबको तितर-बितर हो जाने का हुक्म देता हूँ। एक मिनिट में प्लेटफॉर्म खाली कराने के लिए मिलिट्री गोली चला देगी।” और उन्होंने अपनी घड़ी बाहर निकाल ली।

पटरी पर से सूराभाई चिल्लाये - “हत्यारो,” परन्तु आधे मिनट से कम में ही प्लेटफॉर्म खाली हो गया। वे घायलों को अपने साथ ले गये थे।

मैं कैब में से उतर आयी, परन्तु उसका सींखचा पकड़े रही क्योंकि मेरे घुटनों में शक्ति नहीं थी और मैं काँप रही थी। मैंने प्रार्थना की कि यह सब समाप्त हो जाए, कि हम सब घर जाएँ और उसे भूलने का प्रयत्न करें जो हमने किया है, जो हमने देखा है, पटरी पर लेटे लोगों का उद्देश्य कोई नुकसान पहुँचाना नहीं था। वे भौंदू नजर आ रहे थे लेकिन गरिमामय भी। उन्हें वहीं लेटे रहने दो! आखिरकार, वे लोग शायद ठीक ही थे। जल्दी ही, यह देश उनका होगा।

कर्नल सैवेज ने कहा, “इन लोगों का क्या होगा।”

“मुझे नहीं मालूम। मैं उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाना चाहता,” कलक्टर ने धीमे स्वर में कहा।

कर्नल सैवेज ने कहा, “ठीक है मैं उन्हें ठिकाने लगा दूँगा। मिस्टर जोन्स अपना इंजिन चलने के लिए तैयार रखो।”

सिलिण्डरों की सतह से जोर की ‘हिस्स’ की आवाज के साथ भाप निकली और विशालकाय पहिये थोड़ा घूमे! सूराभाई ने बड़ी तेजी से अपने शरीर को कड़ा कर लिया और हाथों को पहले से कसकर बाँध लिया।

मैं यह सह न सकी और विक्षिप्त-सी चिल्लायी, “नहीं। वे नहीं उठेंगे। सूराभाई नहीं उठेंगे।” पेटर ने रेगुलेटर बन्द कर दिया और पहियों का चलना बन्द हो गया। काऊ कैचर अब सूराभाई को छू रहा था।

मैंने कलक्टर की बाँह पकड़ ली, “प्लीज, पेटर को गाड़ी मत चलाने दीजिए, सर! सूराभाई नहीं उठेंगे। यह हत्या होगी।”

“तुम क्यों सोचती हो कि वह नहीं उठेंगे?” कलक्टर ने मुझसे पूछा।

मैंने कहा, “क्योंकि, उन्हें विश्वास है कि वह सही हैं, सर, और क्योंकि वह बहादुर हैं।”

“मैं उन्हें धमकाकर पटरी पर से हटाने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ, मिस जोन्स,” कर्नल सैवेज ने बीच में चिढ़कर कहा, “मैं समझता हूँ कि मिस्टर सूराभाई के चरित्र का मैं भी उतना अच्छा पारखी हूँ जितना कि तुम। यदि तुम दखलन्दाजी न करो तो मैं बता दूँगा कि मुझे अच्छी तरह पता है मैं क्या कर रहा हूँ,” और उन्होंने धीमी आवाज में जमादार सिंगवीर से कुछ बात की। जमादार मुँह-ही-मुँह में हँसा और उसने गोरखों से कुछ कहा। उन सबने खीसें निपोर दीं।

कर्नल सैवेज ने हाथ से इशारा किया और गोरखे प्लेटफॉर्म के किनारे लाइन में खड़े हो गये। कर्नल ने नम्रतापूर्वक कहा, “मिस्टर सूराभाई, क्या आप ऊँची जाति के हिन्दू हैं?”

सूराभाई ने कहा, “हाँ, परन्तु आजादी की लड़ाई में सभी जातियाँ एक समान हैं।”

“बहुत ठीक,” कर्नल सैवेज ने कहा, “क्योंकि राइफलमैन त्रिलोक वीर आले आपका प्रयोग एक पेशाबघर की भाँति करनेवाला है। उसे जोर की हाजत लगी है। वह एक तरह का हिन्दू है, परन्तु उसकी जाति कुछ नीची है! आपके पास उठ जाने और इन मद्रासियों को घर जाने देने के लिए पाँच सेकण्ड का समय है।”

सूराभाई एक झटके के साथ बैठ गये - “क्या कहा तुमने?” वह हकलाये - “तुम क्या करना चाहते हो?” उन्होंने प्लेटफॉर्म की तरफ देखा! गोरखों की पीठ मेरी तरफ थी, पर मैं कह सकती थी कि वे अपने बटन खोल रहे थे।

सूराभाई ने कहा, “ओह! तुम जानवर।”

थ्री... टू... वन... फायर! कर्नल सैवेज ने अपना हाथ गिरा दिया। स्वयंसेवक चिल्लाते हुए झपटकर खड़े हो गये या दूसरी पटरी पर लुढ़क गये। पेशाब उनके कपड़ों पर दाग छोड़ रहा था और उनके चेहरों से बह रहा था। पेटर ने पहले ही रेगुलेटर चालू कर दिया था। ट्रुप ट्रेन रफ्तार पकड़ तेजी से प्लेटफॉर्म के बाहर हो गयी।

मैं परदा रूम में चली गयी। प्लेटफॉर्म पर खून, टूटे हुए काँच, फटे हुए कपड़े और कुछ दाँत पड़े थे। रेलवे लाइन पर बिखरे हुए झण्डे और कुछ टोपियाँ और एक औरत की चप्पलें पड़ी थीं। मैंने यह सब देखा जब कि मेरे पेट में मरोड़ चलता रहा। मेरा गला फूल आया और आँखें बाहर निकली पड़ रही थीं। कै करने के बाद मैंने चेहरा धोया, सुस्ताने को थोड़ा बैठी और फिर एक बार पानी से आँखों को धो बाहर निकल आयी।

“तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं लगती है, मिस जोन्स,” कर्नल सैवेज ने कहा, “मैं तुम्हें गाड़ी में घर छोड़े देता हूँ।”

इसे छोड़कर सबकुछ! मैं एक भी मिनट और उसकी निकटता नहीं बर्दाश्त कर सकती थी। मैं उन सबको वहीं छोड़ धूप में सारे रास्ते दौड़ती घर आयी, जिससे जब मैं बिस्तर पर गिरी, मेरे कपड़ों का एक-एक तार पसीने से भीगा हुआ था।

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आलिया के मन्दिर में

डेविड रेन

29 वर्षीय डेविड रेन अँग्रेजी के युवा लेखक हैं। वह अक्सर इंग्लैण्ड और स्पेन में रहते हैं। प्रारम्भ के कई वर्षों तक आप इंग्लैण्ड और अमरीका की गुप्त पत्रिकाओं में कविताएँ लिखते रहे। आपने लन्दन के कई प्रमुख पत्रों के लिए विएतनाम और अल्जीरिया से सम्बन्धित लेख लिखे हैं। कुछ कहानियों के अतिरिक्त उन्होंने अपना पहला उपन्यास भी लिखा है।

रिजुआना का रंग हरा था। शाम की हवा में थोड़ी-थोड़ी गर्मी की खुनक थी। बड़ी खुशगवार खुनकें। सिख लड़के अपने कमर तक लम्बे काले बालों को सुखाकर कंघी करके बाँध चुके थे। उनके माता-पिता सफेद शीतल संगमरमर वाले गुरुनानक के गुरुद्वारे पर पूजा करने गये थे और हम केले की हरी-हरी चौड़ी झालरों के नीचे बैठे नशे की फूँक लगाने में डूबे हुए थे। इसे मेरा दोस्त हिरोहिको अफगानिस्तान से लाया था।

धीरे-धीरे अँधेरे की चादर फैलने लगी और रोशनी के रहे-सहे नुमाइन्दे घरों की दीवारों के अन्दर कैद होकर टिमटिमाने लगे। दिल्ली में उन दिनों ब्लैक आउट चल रहा था और हर रात यह डर खड़ा रहता था कि पाकिस्तानी बम न बरस पड़ें। हम सबमें एक युद्धपरक उत्तेजना उसाँसें लिया करती थी। करीब-करीब हर रात एकेक से गोले दगते। सर्च लाइटें रात के आसमान की छानबीन करतीं और लाखों हिन्दुस्तानी बाशिन्दे घरों से निकलकर सड़कों में जमा हो जाते। उनकी आँखें आसमान की ओर ताकती रहतीं। लेकिन हमें कभी एक भी वायुयान न दिखा और न सुनने में ही आया।

कुछ उत्साही किस्म के लोगों ने पब्लिक पार्कों में खाइयाँ खोद रखी थीं। कुछ जो उनसे ज्यादा व्यावहारिक किस्म के प्राणी थे, उन्होंने उन खाइयों को कूड़े से पाटना चालू कर दिया था।

गर्मियों भर हम और डालिया आसमान में रोशनी के शहतीरों का घूमना और हवाई तोपों का दगना सुनते रहे थे। वे हमारे ज्यादा नजदीक थीं, सितारों से ज्यादा। उनसे हमें सुकून मिलने लगा था।

एक छोटा-सा ढोल बजा। हिरोहिको ने अपना माल किरमिच के एक झोले में भरा और हम तीनों गुरुद्वारे के अहाते से होते हुए खाना खाने के लिए चल पड़े। चपातियों के ऊपर हरी सब्जी रखकर सैण्डविच बनाकर खाने लगे। डालिया ने कुल्हड़ों में पानी डाला। उसका हाथ हिल नहीं रहा था और पानी ठण्डा था। साफ भी।

मुझे पता था कि कलाकार बन जाना कोई आसान बात नहीं है लेकिन डालिया की खूबसूरती भी तो गजब की थी। उसने मुझे कलाकार बनाके छोड़ा। उसके बाल क्या गजब के थे, लम्बे-लम्बे, काले कमर को चूमते हुए, चेहरे को छोड़कर कन्धों को ढके लहराते घने-घने बाल। उसका कोमल, धरती की तरह गोरा शरीर, गुलाबी रंग के पंजाबी कुर्ते और सफेद सलवार में बेहद फबता था। रात में वह केवल हल्का कुर्ता डालकर नंगे पैरों मेरे पास घास पर चलकर आती थी। यह उसके शरीर की खूबसूरती थी जो मुझे कलाकार बनाने में सहायक हुई थी।

गुरुद्वारा बहुत दूर तक फैला हुआ था। उसके बगल में कुछ सिख परिवार रहते भी थे। डालिया भी अपने बाप और भाई के साथ एक छोटे-से सफेद पुते मकान में रहती थी। उसकी माँ उसे जनमते ही स्वर्ग सिधार गयी थी। उसके भाई का नाम राजू था। राजू नहीं चाहता था कि डालिया दूसरे लड़कों से हेल-मेल बढ़ाए, इसलिए वह हमेशा डालिया के आगे-पीछे बना रहता था। लेकिन अब वह कॉलेज में था और उसका समय कॉलेज में निकल जाता था। उसकी उम्र थी अठारह साल, मगर था वह बड़ा आदर्शवादी। वही वह डालिया के साथ लागू करता था।

रात का ही समय ऐसा था जब हम दोनों मिल सकते थे और अपनी भावनाओं को सही ढंग से व्यक्त कर सकते थे।

पेड़ों के नीचे लेटकर हम धौरी गायों का चर्र-चर्र करके घास उचारना और नाराज कीड़ों की तरह गोलों का दगना सुनते रहते। दिन ढले जब हवा नम होकर भारी होने लगती, हम स्लीपिंग बैग के ऊपर लेटकर अँधेरा झुकने का इन्तजार करते। बाद में हम अन्दर जाते। हम बमों की, रोशनी की और तोपों की बातें करते - हमीं क्या, सारी दिल्ली यही बातें करती रहती थी। लेकिन कभी कोई बम नहीं गिरा। हमारा प्यार कुछ ऐसा नहीं था कि आप अपनी तरफ से छोड़ दें। और न ऐसा था कि जिन्दगी भर चल जाए। यह निश्चित था कि यह एक दिन महज एक याद बन जाएगा लेकिन याद ऐसी होगी जो काफी दिनों तक जिन्दा रहेगी।

मैं जब नार्वे के अपने शहर से चला था तो बर्फ पिघल रही थी। अपनी बोल्स बैगेन से नेपाल आया, जहाँ मेरी भेंट हिरोहिको से हुई। फिर दिल्ली हम दोनों साथ आये। काठमाण्डू में मेरी कार तीन हजार रुपये में ब्लैक मार्केट में बिकी। गर्मियों भर मैं दिल्ली में इस कोशिश में रहा कि मेरे लिए इस बेकार करेंसी का पौण्ड या डालर में एक्सचेंज मिल जाए। यह गैरकानूनी काम था, जो मुश्किल भी।

लेकिन बाहरी सिखों की शानदार मेहमाननवाजी! मैं उसी के बल पर रह सका और रामसिंह की लड़की को प्यार करने लगा।

चित्र बनाने की मेरी ख्वाहिश ने मुझे सड़क पर ला छोड़ा, ताकि मैं अपने काम को और अच्छी तरह समझ सकूँ और इतनी रुचि जाग्रत कर लूँ कि फिर उसे अपनाये रह सकूँ। डालिया से मैं इसी तरह मिला था। वह मेरे लम्बे-लम्बे बाल देखकर हँसती रही थी। उसने मुझसे कहा कि मैं सिखों की तरह साफा बाँधा करूँ ताकि बाल गन्दे न होने पाएँ। प्यार का सिलसिला बढ़ाने का यह एक अच्छा तरीका था।

एक शाम जब राजू देर तक कॉलेज में था, हमने एक स्कूटर टैक्सी किराये पर की और बेंगर्स में डिनर खाने चले गये। खाने के लिए जगह बहुत बढ़िया थी वह, लगे कि आप किसी शाही जगह में खाना खा रहे हैं। डालिया को भी जगह पसन्द आयी। मैंने हवाइयन स्टीक मँगाया और डालिया ने ‘मद्रास करी’ मँगायी। फिर हम दोनों ने आइसक्रीम की डबल प्लेटें मँगायीं। क्या लज्जत थी।

“मैं माँ बननेवाली हूँ।” उसने कहा।

उदासी का वहाँ कोई नाम नहीं। बल्कि अच्छा लगा। मुझे कोई चिन्ता नहीं हुई और मैं अपनी आइसक्रीम खाता रहा।

“कुछ समझे?” उसने पूछा, “मैं बच्चे की माँ बनने वाली हूँ, बच्चा हमारा और तुम्हारा!”

“समझा।” मैंने कहा और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर सहलाने लगा।

“बेहद प्यार करती हूँ तुम्हें!” उसकी आँखों की चमक प्यार के छलछलाये आँसुओं से दुगुनी हो गयी।

“और आइसक्रीम मँगाऊँ?” मैंने पूछा।

“नहीं, अब और नहीं खा सकूँगी।”

“तब फिर बिल मँगाता हूँ।”

हम कनाट प्लेस पार करके नेहरू पार्क में थोड़ी देर टहलते रहे।

“तुम दिल्ली से बाहर चले जाओ। यहाँ रहना तुम्हारे लिए खतरनाक है। मेरे बाप को पता चलेगा तो तुम्हें जान से मार डालेगा।”

“हम साथ-साथ नहीं जा सकते?”

“ऐसा मुमकिन नहीं है। मेरे पास पासपोर्ट नहीं है और हिन्दुस्तान में साथ रह नहीं सकती। तुम भूल जाते हो कि मैं सिख हूँ। मैं चला लूँगी किसी तरह।”

लेकिन कोई-न-कोई रास्ता तो होना ही चाहिए।

अब कहने को कुछ भी नहीं रह गया था। हम चुपचाप चलते रहे, पूरी तरह टूटे हुए। खतरे से मैं वाकिफ था। हर सिख सरदार के पीछे नाम में सिंह लगा रहता है। सिंह का मतलब होता है शेर और शेर अपने पराक्रम को बड़ी गम्भीरता से पहचानते हैं।

“तुम मुझे प्यार करते हो?” उसने पूछा और मेरे हाथ की पकड़ को भींचती चली गयी।

“मेरी गुलबन्नो, तुम्हें बेहद प्यार करता हूँ।”

उसके पूछने में कुछ बेताबी थी, अजीब-सी तड़प।

डालिया को राजू के घर पहुँचने से पहले पहुँच जाना था, इसलिए उसे टैक्सी में बैठाया और ड्राइवर को समझाकर विदा कर दिया।

पार्लियामेण्ट स्ट्रीट का टी-हाउस खचाखच भरा हुआ था। लोग सुरक्षा सेनाओं की रात्रिकालीन परेड देखने आये हुए थे। मैंने एक ठण्डी कॉफी का ऑर्डर दिया और इन्तजार करने लगा कि कोई सम्पर्क में आवे और मेरा काम बने। मैंने समझा था कि आज की रात तो मुझे कहीं-न-कहीं से एक्सचेंज मिल ही जाएगा।

“ए मिस्टर, अपना रुपया एक्सचेंज करना चाहते हो?” फटे चीथड़ों में एक आवारा-से लड़के ने कहा।

“कर भी सकता हूँ।”

“अभी दो मिनट में आया, बाहर मिल जाइए।” उसने कहा और तुरन्त गायब हो गया।

फुटपाथ में मारे भीड़ के कहीं तिल धरने की जगह नहीं, मगर मैंने इधर अपनी सीट छोड़ी और उसने मुझे आ पकड़ा।

“एक टैक्सी ले लेते हैं।”

उसने ड्राइवर को शहर के बीच से ले जाते हुए पुरानी दिल्ली में सदर बाजार से परे एक गली में टैक्सी ले चलने को कहा। गली में रोशनी रोयी-रोयी-सी थी। वहाँ पहुँचकर एक लकड़ी के बने घर में हम किनारे लगे जीने से चढ़कर ऊपर गये। ऊपर पहुँचे तो दरवाजा बिलकुल खुला हुआ था। एक स्टोव जल रहा था। उसके गिर्द दो औरतें खाना बना रही थीं। कमरे की हवा में धुएँ का नीलापन घुलकर जम गया था और चिकनाई के स्टोव पर जलने की गन्ध से पूरा कमरा भर गया था। बच्चे हर जगह उछल-कूद मचाये हुए थे।

कमरे के पीछे की ओर दो बिस्तर पड़े थे जिन पर परदे खिंचे हुए थे। लेकिन उन परदों के आर-पार बीच-बीच से सबकुछ दिखाई देता था। लगता था कि वे परदे ग्राहकों की सुविधा के लिए डाले गये थे लेकिन उससे उन्हें कोई फायदा नहीं होता था। परिवार में निस्संकोच वेश्यावृत्ति चलती रहती थी। सारा कमरा बड़ा गन्दा लग रहा था। उसी एक कमरे में दस आदमियों का रहना, खाना-पीना, उठना-बैठना और ऊपर से धन्धा चलाना। करीब बारह साल की लड़की पाँच रुपये के लिए अपना शरीर देने को मेरे पीछे लग गयी। मैंने कहा - मैं रुपया खर्च करने नहीं, बदलने आया हूँ तो उसने अपना भाव कम कर दिया और पाँच रुपये से तीन रुपये पर उतरकर जिद करने लगी।

“यहाँ आइए,” उस लड़के ने मेरी ओर इशारा करके कमरे को पार करके चले आने को कहा।

“आप नेपाली रुपया बदलना चाहते हैं?” एक बूढ़े-से आदमी ने अपने खिचड़ी बालों पर हाथ फेरते हुए कहा।

“हाँ, अगर सौदा ठीक-ठीक पट सके,” मैंने जवाब दिया।

“भाव तो बिलकुल वाजिब ही है,” उसने कहा और मेरे बैठने के लिए गद्दे की तरफ इशारा किया जो जमीन पर पड़ा हुआ था।

“एक डालर के कितने रुपये लेते हो?” मैंने पूछा।

“आपके पास कितने रुपये हैं?” उसने पूछा।

“तीन हजार।”

“निकालिए!”

मैंने कमर से मनीबेल्ट खोला और रुपयों का ढेर जमीन पर उँड़ेल दिया, उसने गिना-वातावरण में अपरिचय का तनाव बढ़ता-सा लगा। मैंने समझा कि पुलिस के डर से चिन्तित हो गये हैं।

“एक मिनट ठहरिए,” कहकर वह एक परदे के पीछे चला गया। वहाँ किसी से फुसफुसाकर बात करता रहा। फिर बाहर आकर एक डॉलर का नोट जमीन पर रख दिया।

“यह क्या तमाशा है?” मैंने अन्दर के गुस्से को थोड़ा संयत रखते हुए कहा और अपने रुपये बटोरने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि एक सिख कृपाण रुपयों की ढेरी के बीच आ गड़ा और मेरा हाथ संयोग से उसके नीचे नहीं आया।

“यह डॉलर उठाओ और रास्ता नापो।” राजू ने कहा। मैंने मुड़कर देखा तो डालिया का भाई आग-बबूला मेरे सामने था। गुस्से में मैं था ही। मैंने एक हाथ उसे रसीद करने की जी-तोड़ कोशिश की, लेकिन मेरे बाजू उनके मजबूत हाथों की पकड़ ने झुका दिये।

“चुपचाप निकलकर चले जाओ, नहीं तो जान से मार डालूँगा!” उसने दृढ़ स्वर में दाँत पीसते हुए धीमे से कहा।

“और तुम मेरा रुपया अपने कब्जे में करोगे?”

“अभी बुढ़ऊ ने कहा था न कि भाव बिलकुल वाजिब है। मेरी बहन इन सौ-दो सौ डॉलर से ज्यादा कीमती है। बोल है कि नहीं? यह एक डॉलर इसलिए है कि आज रात वह तुम्हारे पास नहीं आने की। इससे अपनी जरूरत पूरी कर लेना। हमें इज्जत करना भी आता है, मजाक भी। समझे?”

मेरे चेहरे से खून का कोई कतरा लुढ़ककर बहने को था, ऐसा मुझे साफ मालूम पड़ गया। मेरा सिर चकरा रहा था। मैं निढाल होकर गिर पड़ा।

काफी देर तक मैं अर्द्ध-बेहोशी की हालत में पड़ा रहा। सारी दुनिया मेरे सामने रफ्तार से घूमती चली जा रही थी और मुझे यह रफ्तार कहीं लिये जा रही थी, यह भी मैं जान न पा रहा था। मैंने कोशिश करके आँखें फेरीं तो देखा कि यह रफ्तार एक्सप्रेस गाड़ी की थी। सामान रखनेवाले ऊपरी हिस्से से मैंने नीचे झाँका तो कम्पार्टमेण्ट खचाखच भरा हुआ था। उन्होंने मुझे किसी बाटवाले बर्तन से मारा होगा। क्योंकि मैंने याद किया कि होश खोने के पहले ऐसी ही कोई आवाज सुनाई पड़ी थी। मेरी कमीज की ऊपर की जेब में वही एक डॉलर और कलकत्ते का टिकट पड़ा हुआ था। मैंने पड़े-पड़े महसूस किया जैसे किसी का कोमल स्पर्श मेरे चोट से भन्ना रहे सिर को सहला रहा है। मैं एक कलाकार था, यह मैं बहुत अच्छी तरह जानता था। डालिया के प्यार की यही तो देन थी - कि मैं अपनी इच्छाओं को साकार करने में लगा रह सकूँ। और मैंने उसे दी अपनी एक सन्तान!

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शवदाह

गी द मोपास्साँ

पिछले सोमवार को इट्रेटट में एक भारतीय राजा, बापूसाहब खण्डेराव घाटगे की मृत्यु हो गयी, जो बम्बई प्रेसिडेंसी के गुजरात प्रान्त-स्थित बड़ौदा रियासत के महाराजा गायकवाड़ के रिश्तेदार थे। इसके लगभग तीन हफ्ते पहले सड़कों पर करीब दस नौजवान भारतीयों का एक दल देखा गया था, जो ठिगने कद के, नाजुक, एकदम काले थे, सिलहटी रंग के सूट पहने और कपड़े की चौड़ी-ऊँची टोपियाँ लगाये हुए थे। प्रमुख पश्चिमी राष्ट्रों की सैनिक संस्थाओं का अध्ययन करने यूरोप आये थे। इस दल में तीन राजा, एक उच्च वर्ण का मित्र दुभाषिया और तीन नौकर थे।

जिस व्यक्ति की मृत्यु हुई थी, वह इस मिशन के मुखिया, बयालीस वर्षीय बड़ौदा के महाराजा गायकवाड़ के भाई सम्पतराव काशीराव गायकवाड़ के ससुर थे। उनके दामाद उनके साथ थे। अन्य के महाराजा खाशेराव गाधव के चचेरे भाई गणपतराव शावनराव गायकवाड़, सचिव-दुभाषिया वासुदेव माधव समर्थ और उनके नौकर रामचन्द्र बाजाजी, गनू बिन पुकाराम कोकाटे, रम्भा जी बिन फौजी।

जब रुग्ण सज्जन अपने देश से रवाना हो रहे थे, तो इस बात का भरोसा हो जाने पर कि अब वह कदापि लौट न पाएँगे, दुःख से उनका हृदय भर उठा था और वह यात्रा रद्द कर देना चाहते थे, किन्तु उन्हें अपने सम्मानित सम्बन्धी बड़ौदा के महाराजा की इच्छा के आगे झुक जाना पड़ा और वह रवाना हो गये।...गर्मियों के आखिरी हफ्ते बिताने के लिए वे इट्रेटट आये और कुतूहल में भरे लोग रोज सवेरे उन्हें रोचेज ब्लांचेज बाथ्स पर नहाते हुए देखते।

पाँच या छह दिन पहले बापू साहब खण्डेराव घाटगे को मसूढ़ों में दर्द की शिकायत हुई, उसके बाद उनके गले तक सूजन फैल गयी, जो अल्सर के रूप में परिणत हो गयी। घाव सड़ गया और सोमवार को डॉक्टरों ने उनके युवक मित्र को बताया कि वह रोग-मुक्त न होंगे। इसके लगभग तुरन्त बाद ही उनकी हालत ज्यादा बिगड़ गयी। और जब ऐसा लगा कि वह अभागे आदमी आखिरी साँसें ले रहे हैं, तो उनके साथियों ने उन्हें बाँहों में ले लिया, बिस्तर से उठा लिया और टाइल वाले फर्श पर लेटा दिया, ताकि ब्रह्मा के नियमों के अनुसार वह माता पृथ्वी के सम्पर्क में प्राण त्याग सकें।

उसी दिन उन्होंने अपने धर्म के अनुसार शव को जलाने के लिए मेयर मोंसिकर बोइसाये से अनुमति माँगी। मेयर हिचकिचाये, फिर निर्देश के लिए उन्होंने प्रशासकीय अधिकारी को तार भेजा और साथ ही कह दिया कि अस्वीकृति सूचक उत्तर न मिलने पर वह शवदाह के लिए अपनी स्वीकृति दे देंगे। चूँकि रात के नौ बजे तक कोई उत्तर नहीं मिला था, यह निर्णय किया गया कि जिस रोग से उक्त भारतीय की मृत्यु हुई थी, उसके संक्रामक स्वरूप को ध्यान में रखते हुए शव को उसी रात, समुद्र-तट पर, भाटा आने पर ढलवाँ चट्टान के नीचे जला दिया जाए।

उस रात कैसिनो में नृत्य था। समय के पूर्व ही आ गयी शरद की वह प्रारम्भिक रात थी और ठण्ड थी। यद्यपि समुद्र में तूफान नहीं था, तेज हवा बह रही थी। छिटपुट बादल आसमान के आर-पार छाये हुए थे। सुदूर क्षितिज से वे ऊपर उठे और जब चाँद के पास पहुँचे, सफेद हो गये। तेजी से उन्होंने चाँद को ढँक-सा लिया और वे एक-दो सेकण्ड के लिए चाँद पर छाये रहे, किन्तु वास्तव में वे उसे छिपा नहीं सके। इट्रेटट के गोलाकार, समुद्र-तट की लम्बी ढलवाँ चट्टान, जो कि ‘गेट्स’ के नाम से पुकारे जानेवाले, वृक्षों से आच्छादित दो प्रसिद्ध मार्गों पर समाप्त होती है, चाँद की कोमल चाँदनी में प्राकृतिक दृश्योंवाले इस स्थान पर दो भारी काले धब्बे बनाती हुई छायाओं में छिपी रही। दिन भर वर्षा होती रही।

कैसिनो आर्केस्ट्रा पर वाल्जेज, पोल्काज और क्वाड्रिल्स की धुनें बज रही थीं। सहसा भीड़ में खबर फैल गयी कि होटेल डेस बेन्स में अभी-अभी भारतीय राजा मर गया है और शव को जलाने के लिए अधिकारियों से अनुमति माँगी गयी है। यह चीज हमारे रीति-रिवाजों के इतनी विपरीत है कि किसी को भी इस बात पर विश्वास न हुआ, कम-से-कम किसी का भी खयाल नहीं था कि ऐसा शीघ्र होना सम्भव है। रात अधिक बीत गयी, तो लोग अपने-अपने घर चले गये।

दोपहर से ही एक बढ़ई लकड़ियाँ काट रहा था। वह आश्चर्यचकित था कि इन लकड़ियों को छोटे-छोटे टुकड़ों में क्यों चिरवाया जा रहा है और इतना अच्छा सामान क्यों नष्ट किया जा रहा है। ये लकड़ियाँ गाड़ी पर लादी गयीं और अधिक रात बीते रास्ते में मिलने वाले राहगीरों के मन में सन्देह पैदा किये बगैर गलियों से इन्हें समुद्र तट पर ले जाया गया। समुद्र के कंकड़ोंवाले मार्ग से होती हुई गाड़ी ढलवाँ चट्टान के निचले भाग तक गयी और जब उसे खाली किया गया, तो वे तीनों भारतीय नौकर चिता तैयार करने लगे, जो उसकी चौड़ाई से ज्यादा लम्बी थी, केवल उन्होंने ही यह सारा काम किया, क्योंकि इस पवित्र कार्य में अपवित्र हाथों वाले कोई अन्य व्यक्ति उनकी मदद नहीं कर सकते थे।

जिस छोटे घर में वे ठहरे थे, उसका दरवाजा खोल दिया गया और सँकरे हाल में, जिसमें मद्धिम रोशनी थी, हमने लाश तख्ते पर रखी हुई, सफेद सिल्क में लिपटी हुई देखी। सफेद आवरण के बीच लेटा हुआ आकार स्पष्ट दिखाई देता था। भारतीय लोग उसके पैरों की तरफ खड़े थे, बिना हिले-डुले और बहुत गम्भीर, जब कि उनमें का एक व्यक्ति एक ही लय में कुछ गुनगुनाते हुए, जिन शब्दों को हम समझ नहीं सकते थे, क्रियाएँ करने लगा। वह शव के आसपास घूमा, कभी-कभी उसे स्पर्श किया, इसके बाद तीन जंजीरों से लटके एक कलश को उसने उठाया और गंगा का पवित्र जल बड़ी देर तक छिड़का।

इसके बाद उनमें से चार व्यक्तियों ने तख्ते को उठाया और उसे लेकर वे धीरे-धीरे चलने लगे। कीचड़ भरी, जनशून्य सड़कों को अँधेरे में छोड़कर चाँद अदृश्य हो गया, किन्तु रेशम इतना चमकीला था कि तख्ते पर रखा हुआ शव चमकता-सा लग रहा था। रात में आदमियों द्वारा, जिनका चमड़ा इतना काला था कि हल्के अँधेरे में उनके चेहरों और हाथों और कपड़ों के बीच किसी को कोई फर्क दिखाई नहीं दे सकता था, उठाकर ले जाये जा रहे इस शव के आकार को देखना एक प्रभावोत्पादक दृश्य था। तीनों भारतीय नौकर शव के पीछे-पीछे चल रहे थे, तभी राख के रंग का ओवरकोट पहने एक अँग्रेज की लम्बी आकृति दिखाई दी, जिसने उनकी ओर सिर और कन्धे उठाये थे। उसका व्यक्तित्व आकर्षक और विशिष्ट था। वह यूरोप में उन लोगों का मार्गदर्शक, परामर्शदाता और मित्र था।

जलवाले इस उत्तरी स्थान पर, ठण्डे, कुहरे से भरे आसमान के बीच मुझे ऐसा लगा, मानो मैं प्रतीकात्मक दृश्य देख रहा हूँ। मुझे लगा कि शवयात्रा की तरह पराजित भारतीय प्रतिमा मेरे आगे-आगे ले जायी जा रही है और राख के रंग का लबादा ओढ़े इंग्लैण्ड की विजयी प्रतिमा उसके पीछे-पीछे चली आ रही है।

अरथी उठाये हुए चारों व्यक्ति साँस लेने को एक क्षण के लिए लुढ़कते कंकड़ों पर रुके, फिर चलने लगे, अब वे बहुत धीरे-धीरे चल रहे थे और बोझ से लड़खड़ा रहे थे। अन्त में वे चिता के स्थान पर पहुँच गये, जो कि ढलवाँ चट्टान के नीचे, एक खोह में बनायी गयी थी। खोह करीब तीन सौ फुट ऊँची थी, पूरी सफेद, किन्तु रात में धुँधली-धुँधली दिखाई दे रही थी। चिता करीब तीन फुट ऊँची थी। शव को उस पर रख दिया गया और उनमें से एक भारतीय ने पूछा कि ध्रुवतारा किस दिशा में है। वह उसे दिखला दिया गया और तब मृत राजा को उनके पैर उनके देश की ओर रखते हुए लेटा दिया गया। इसके बाद शव पर बारह बोतलें पेट्रोल छिड़का गया और देवदार के तख्तों से उसे पूरी तरह ढक दिया गया। फिर घण्टे भर तक सम्बन्धी लोग और नौकर चिता पर और तख्ते रखते रहे और यह ऐसा लगने लगा, मानो बढ़इयों ने अपनी अटारियों में लकड़ियों के ढेर लगा रखे हों। फिर उस पर तेल की बीस बोतलें खाली की गयीं और सबके ऊपर लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़ों का बोरा रख दिया गया। कुछ ही फुट के फासले पर शव के लाये जाने के समय से ही जल रहे काँसे के स्पिरिट वाले लैम्प से लड़खड़ाती हुई रोशनी निकल रही थी।

क्षण आ गया था। सम्बन्धी लोग चिता में आग लगाने के लिए गये। लैम्प ठीक तरह नहीं जल रहा था, इसलिए उन्होंने उसमें कुछ तेल डाला और अचानक चट्टान की भारी दीवार को ऊपर से नीचे तक प्रकाशमान करती लपट निकली। एक भारतीय, जो लैम्प पर झुका हुआ था, अपने दोनों हाथ उठाकर और अपनी कुहनियों को मोड़कर खड़ा हो गया और विशाल सफेद ढलवाँ चट्टान पर एक विशाल काली छाया दिखाई दी, अपनी परम्परागत मुद्रा में बुद्ध की छाया। इसका इतना तीव्र और अनपेक्षित प्रभाव पड़ा कि मैंने अपने दिल की धड़कन की गति यों महसूस की, मानो कोई अलौकिक प्रेत मुझे सामने अस्पष्ट-सा दिखाई दिया हो। वास्तव में वह प्राचीन और पवित्र मूर्ति थी, जो पूर्व के हृदय से यूरोप के इस दूसरे छोर पर अपने बच्चे को देखने के लिए आयी थी, जो यहाँ जलाया जा रहा था।

छाया अदृश्य हो गयी। वे लैम्प के साथ गये। ऊपर रखे लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़ों ने आग पकड़ ली। फिर लपटें लकड़ियों में फैल गयीं और एक शक्तिशाली प्रकाश ने समुद्र-तट को, तट के चिकने पत्थरों को और रेती पर आकर समाप्त होनेवाली झागदार लहरों को प्रकाशमान बना दिया। प्रत्येक क्षण प्रकाश बढ़ता ही गया, यहाँ तक कि उसने सुदूर समुद्र में लहरों की नाचती शिखाओं तक को प्रकाशित कर दिया। समुद्र की ओर से बहनेवाली वायु प्रचण्ड रूप में प्रवाहित होने लगी, लपटों को बढ़ाने लगी, जो उठती थीं, गिरती थीं, बलखाती थीं और हजारों चिनगारियाँ फेंकती हुई उठने लगती थीं : बिजली की गति से वे ढलवाँ चट्टान पर दौड़ जाती थीं और आकाश में खो जाती थीं, जहाँ वे तारों में मिल जाती थीं और तारों की संख्या बढ़ा देती थीं। कुछ समुद्री पंछी जाग गये और टेढ़ी-मेढ़ी लम्बी उड़ानें भरते हुए, तेज रोशनी में पंख फैलाये उड़ते हुए और अन्धकार में गायब होते हुए अपनी आर्त्तभरी आवाजें निकालने लगे।

चिता बहुत जल्द ही जलती हुई विशाल अग्निपुंज बन गयी, जो लाल नहीं, पीला था, खूब चमकीला पीला, जैसे तेज हवा से सुलग उठी भट्ठी हो। एकाएक हवा के तेज झोंके से चिता हिल गयी। उसका कुछ हिस्सा डगमगाया और समुद्र की तरफ गिर गया। शव निरावरण था और अच्छी तरह दिखाई देता था, आग के बिछौने पर एक काला थीगले-सा, जो लम्बी नीली लपटों के साथ जल रहा था। जब चिता दाहिनी ओर गिर पड़ी, तो शव यों उलट गया, जैसे बिस्तर पर कोई आदमी उलट गया हो। चिता पर तुरन्त नये सिरे से लकड़ियाँ रख दी गयीं और लपटें पहले से भी ज्यादा आवाज करती हुई उठने लगीं। चिकने कंकरों पर अर्द्ध गोलाकार में बैठे हुए भारतीयों के चेहरे उदास और गम्भीर दिखाई दे रहे थे। चूँकि ठण्ड थी, हममें से शेष लोग आग के काफी नजदीक आ गये। देवदार और पेट्रोल की गन्ध के सिवा और कोई गन्ध नहीं आ रही थी।

घण्टों बीत गये और सवेरा हो आया। करीब पाँच बजे राख और अस्थियों के ढेर के सिवा कुछ भी शेष नहीं रह गया। रिश्तेदारों ने उसे बटोर लिया, कुछ भाग हवा में उड़ा दिया, कुछ हिस्सा समुद्र में बहा दिया और अस्थियों का कुछ अंश भारत वापस ले जाये जाने के लिए ताँबे के एक बरतन में रख लिया। इस प्रकार नौजवान राजा लोग और उनके नौकर बिलकुल प्रारम्भिक सामग्री से अपूर्व बुद्धिमानी और उल्लेखनीय शालीनता से अपने रिश्तेदार का शवदाह करने में सफल हुए। हर चीज उनकी धार्मिक रीतियों और नियमों के अनुसार पूरी की गयी। मृत व्यक्ति शान्ति प्राप्त कर रहा है।

अगले दिन इट्रेटट में भारी हलचल मच गयी। कुछ लोग बकवास करने लगे कि आदमी को जिन्दा जला दिया गया, अन्य लोग कहने लगे कि इस तरीके से एक अपराध को छिपाने का प्रयास किया गया है। कुछ लोग कहने लगे कि मेयर को जेल में बन्द कर दिया जाएगा। और कुछ लोग कहने लगे कि उक्त भारतीय राजा हैजे से मरा था। पुरुष लोग अचरज में भर गये और स्त्रियाँ क्षुब्ध हो उठीं। जहाँ चिता जलायी गयी थी, वहाँ दिन भर लोगों की भीड़ लगी रही और लोग वहाँ के कंकरों के बीच, जो अभी तक गरम थे, हड्डियों के टुकड़े ढूँढ़ते रहे। इतनी हड्डियाँ चुन ली गयीं कि उनसे पूरे दस अस्थि-पंजर बन सकते थे, क्योंकि आसपास रहने वाले किसान अपनी मृत भेड़ों को अकसर समुद्र में फेंक दिया करते थे। जुआड़ियों ने हड्डियों के ये विभिन्न प्रकार के टुकड़े सावधानी से अपने-अपने पर्स में रख लिये। किन्तु वास्तव में उनमें से एक के भी पास भारतीय राजा की वास्तविक हड्डी का एक भी टुकड़ा नहीं था।

उसी रात जाँच करने सरकार का एक प्रतिनिधि आया। किन्तु ऐसा लगा कि इस अजीब मामले में उसके विचार एक तर्क और बुद्धिवाले मनुष्य की भाँति ही थे। किन्तु अपनी रिपोर्ट में वह क्या कहेगा? भारतीयों ने अपने बयान में कहा कि यदि फ्रांस में उनके सम्बन्धी का शवदाह करने से उन्हें रोका गया होता, तो वे शव को किसी ऐसे अधिक स्वतन्त्र देश में ले गये होते, जहाँ वे अपने रीति-रिवाजों का पालन कर सकते।

इस प्रकार मैंने एक आदमी को एक चिता पर जलते देखा है और उसने मुझमें यह आकांक्षा उत्पन्न कर दी है कि मेरे शव को भी इसी प्रकार जलाया जाए। इस तरीके से सबकुछ फौरन समाप्त हो जाता है। प्रकृति द्वारा धीमी गति से किया जानेवाला काम इस तरीके से आदमी द्वारा जल्दी पूरा कर दिया जाता है। प्रकृति द्वारा किये जाने वाले काम के तरीके में बहुत ही बदशक्ल कफन उसे रोके रहता है, जिसमें कि सड़ने का क्रम महीनों तक चलता रहता है। शरीर मृत है और आत्मा विदा हो चुका है। अकथनीय सड़ाँध की जगह पवित्र अग्नि कुछ ही घण्टों में उसे बिखेर देती है, जोकि एक मनुष्य था। वायु वायु में मिल जाती है।

यह एक शुद्ध और स्वस्थ तरीका है। मिट्टी के नीचे उस बन्द सन्दूक में जिसमें कि शव सड़-गलकर गूदा बन जाता है, काला दुर्गन्धपूर्ण गूदा, सड़ाँध का यह तरीका घृणास्पद और अत्यन्त दुष्ट हो जाता है। कफन, जो एक कीचड़वाले गड्ढे में उतारा जाता है, दिल में दर्द पैदा कर देता है, किन्तु चिता में, जिसकी लपटें आसमान तक उठती हैं, महानता, सुन्दरता और पवित्रता का एक तत्त्व रहता है।

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