Hindi Short Stories Books and stories free PDF

    ऐसी वाणी बोलिए…
    by Saroj Prajapati
    • (7)
    • 107

    राजेंद्र जी एक साधारण किसान परिवार से थे। बहुत कम उम्र में उनके पिता का निधन हो गया तो बड़ा बेटा होने के कारण सारी जिम्मेदारी उनके कंधों पर ...

    आदिनिधन
    by Bhargav Patel
    • (1)
    • 104

    आदिनिधननेत्र अनिमेष, देख रहे एक वृक्ष। और जो सोया है उसकी छाँव में। जानते हैं नेत्र उसे... सहज पहचानते हैं। और वृक्ष बन वहीं खड़ी वह रह गयी। ज्यों ...

    शिवानी का टुनटुनवा
    by Upasna Siag
    • (3)
    • 211

    शिवानी आज सुबह से मन ही मन बहुत खुश थी। रात को अच्छे से नींद भी नहीं आयी फिर भी एक दम तरो-ताज़ा लग रही थी। पूजा पाठ में भी ...

    बिग बैंग
    by Pritpal Kaur Verified icon
    • (1)
    • 152

    फाइल पर आख़िरी टिप्पणी कर के अपने हस्ताक्षर चिपकाये, झटके से फाइल बंद की और अपनी झुकी हुयी गर्दन सीधी की. सामने दीवार पर लगी घड़ी पर नज़र डाली ...

    एक जंगल एक भाषा
    by Siraj Ansari
    • (8)
    • 224

    एक बार जंगल की सत्ता सियारों के हाथ लग गयी। उन्होंने "हुआ-हुआ" की आवाज़ को ही जंगल की राष्ट्रभाषा घोषित करने का निश्चय किया और अंदर ही अंदर जंगल ...

    हुस्न कि तख़लीक़
    by Saadat Hasan Manto Verified icon
    • (18)
    • 370

    कॉलिज में शाहिदा हसीन-तरीन लड़की थी। उस को अपने हुस्न का एहसास था। इसी लिए वो किसी से सीधे मुँह बात न करती और ख़ुद को मुग़्लिया ख़ानदान की ...

    ख़्वाब....जो बता न सके
    by Satender_tiwari_brokenwords
    • (11)
    • 238

    नैना की नौकरी विदेश में लग गयी थी। घर वाले खुश तो थे लेकिन वही बात है ना कि लड़की है कैसे रह पाएगी ? वही समाज के चार ...

    हारता चला गया
    by Saadat Hasan Manto Verified icon
    • (13)
    • 235

    लोगों को सिर्फ़ जीतने में मज़ा आता है। लेकिन उसे जीत कर हार देने में लुत्फ़ आता है। जीतने में उसे कभी इतनी दिक़्क़त महसूस नहीं हुई। लेकिन हारने में ...

    बाबा मेरे बच्चे कैसे हैं ?
    by Upasna Siag
    • (8)
    • 303

    बाबा, मेरे बच्चे कैसे हैं ? ............. बोलो बाबा ! हर बार मेरी कही अनसुनी कर देते हो ...., अब तो बोलो ! ...

    सबूत
    by Dr Narendra Shukl
    • (7)
    • 163

    सबूत सुच्चा सिंह , ये तू किन्हें उठा लाया है ?  सामने खड़े , दुबले-पतले से दिखने वाले ग्रामीण युवक तथा पास खड़ी , सांवले - मंझोले कद - ...

    हामिद का बच्चा
    by Saadat Hasan Manto Verified icon
    • (10)
    • 178

    लाहौर से बाबू हरगोपाल आए तो हामिद घर का रहा ना घाट का। उन्हों ने आते ही हामिद से कहा। “लो भई फ़ौरन एक टैक्सी का बंद-ओ-बस्त करो।” हामिद ने ...

    ऐक लड़की की कहानी
    by Savu Baleviya
    • (12)
    • 263

    मे ऐक छोटे से गांव में रहती हूं .  मेरे गांव का नाम विरपुर है मुझे बसपन से कुछ बड़ा बनने का सपना है मेरे गांव के लिए कुछ ...

    हाफ़िज़ हुसैन दीन
    by Saadat Hasan Manto Verified icon
    • (10)
    • 167

    हाफ़िज़ हुसैन दीन जो दोनों आँखों से अंधा था, ज़फ़र शाह के घर में आया। पटियाले का एक दोस्त रमज़ान अली था, जिस ने ज़फ़र शाह से उस का ...

    इंतक़ाम
    by Shakuntala Sinha
    • (9)
    • 235

          कहानी  - इंतक़ाम    गर्मी की एक दोपहर में अर्चना के फ्लैट का कॉल बेल बजा  . वह अपनी विधवा बूढी माँ के साथ उस छोटे से ...

    मुश्किल घड़ी न देखन दई
    by Swatigrover
    • (9)
    • 141

    पंचायत  का  फ़ैसला  आ  चुका  था। स्कूल  की  ज़मीन को पंचायत ने ख़रीद  लिया। और इस ज़मीन पर मंदिर, मस्ज़िद और  गुरुद्वारा  बनेगा ईसाई की संख्या गॉंव में न ...

    हरनाम कौर
    by Saadat Hasan Manto Verified icon
    • (12)
    • 222

    निहाल सिंह को बहुत ही उलझन हो रही थी। स्याह-व-सफ़ैद और पत्ली मूंछों का एक गुच्छा अपने मुँह में चूसते हुए वो बराबर दो ढाई घंटे से अपने जवान ...

    चाट
    by Pritpal Kaur Verified icon
    • (19)
    • 405

    बात सीधी सी थी, लेकिन उसकी गंध बेहद तीखी थी. तभी तो जया की ही नहीं पूरे मोहल्ले की नाकें अपने अपने ढंग से सुगबुगा गयी थी. नयी-नयी अकाउन्ट्स अफसर ...

    हतक
    by Saadat Hasan Manto Verified icon
    • (9)
    • 248

    दिन भर की थकी माँदी वो अभी अभी अपने बिस्तर पर लेटी थी और लेटते ही सो गई। म्युनिसिपल कमेटी का दारोगा सफ़ाई, जिसे वो सेठ जी के नाम ...

    एक था लकड़बग्घा
    by Siraj Ansari
    • (5)
    • 270

    एक जंगल में सभी पशु-पक्षी बड़े प्रेम से रहते थे। सभी खुश थे और एक दूसरे के दुःख दर्द में भी काम आते थे। कभी कभी हल्की आंधी तूफान ...

    अमृतसर रेल दुर्घटना विभीषिका 2018 पर 5 लघुकथाएं
    by Chandresh Kumar Chhatlani
    • (6)
    • 152

    19 अक्टूबर 2018 का दशहरा, भुलाये नहीं भुलता, जब अमृतसर में दशहरा मेला चल रहा था और रेल की पटरी पर खड़े होकर रावण दहन देखने वालों के ऊपर ...

    ड्राईवर की दवाई
    by Ajay Amitabh Suman Verified icon
    • (8)
    • 177

    भुवन का मेरठ में दवाई की दुकान चलाता था। रात को दुकान से आते आते काफी देर हो जाती थी।लिहाजा सुबह दुकान देर से जाता था। आज भी लगभग ...

    हज्ज-ए-अकबर
    by Saadat Hasan Manto Verified icon
    • (10)
    • 197

    इम्तियाज़ और सग़ीर की शादी हुई तो शहर भर में धूम मच गई। आतिश बाज़ियों का रिवाज बाक़ी नहीं रहा था मगर दूल्हे के बाप ने इस पुरानी अय्याशी ...

    पल जो यूँ गुज़रे - 16
    by Lajpat Rai Garg Verified icon
    • (8)
    • 233

    जाह्नवी के इन्टरव्यू की तिथि से चार दिन पूर्व की बात है। मुँह—अँधेरे निर्मल की नींद खुल गयी। कारण जाह्नवी को लगातार तीन—चार बहुत जोर की छींकें आर्इं। निर्मल ...

    पहला प्यार
    by Swatigrover
    • (21)
    • 320

    पहली बार ईशा को कॉलेज के  फ्रेशर्स पर गाते हुए देखकर उसके चेहरे  को   तो  कम  ही  देखा पर  उसके  गाने  को  सुनकर लगा कि इस आवाज़ को हमेशा ...

    हजामत
    by Saadat Hasan Manto Verified icon
    • (9)
    • 191

    “मेरी तो आप ने ज़िंदगी हराम कर रखी है…. ख़ुदा करे मैं मर जाऊं।” “अपने मरने की दुआएं क्यों मांगती हो। मैं मर जाऊं तो सारा क़िस्सा पाक हो जाएगा...... ...

    क्यूंकि वह आतंकी की माँ थी !
    by Upasna Siag
    • (3)
    • 194

    अँधेरा गहरा होता जा रहा था। वह अब भी डरती -कांपती सी झाड़ियों के पीछे छुपी बैठी थी। तूफान तो आना ही था। चला गया आकर ! वह अभी भी ...

    कोलाहल
    by Pritpal Kaur Verified icon
    • (3)
    • 191

    एक अनजान सी चुप्पी मेरी जुबान पर रखी दिन रात मुझे उलाहने देती रहती है. अक्सर सोचता हूँ कि इस चुप्पी को ढहा कर एक इमारत खडी कर दूँ, ...

    अवलंब
    by Dr Narendra Shukl
    • (5)
    • 119

    ‘तू आने दे ललूआ को  . . . सारी बात बताउंगी । एक टेढ़ी सी लकड़ी के सहारे चलती हुई बुढ़िया ने बहू से कहा । ‘ ‘ हां ...

    प्रेरणा
    by Rajesh Bhatnagar
    • (7)
    • 229

    पूरा टाउन हॉल लोगों की भीड़ से खचाखच भरा था । हॉल के मुख्य द्वार से स्टेज तक आने वाले रास्ते को छोड़कर दोनों ओर करीने से कुर्सियां लगीं ...

    स्वराज के लिए
    by Saadat Hasan Manto Verified icon
    • (7)
    • 133

    मुझे सन याद नहीं रहा। लेकिन वही दिन थे। जब अमृतसर में हर तरफ़ “इन्क़िलाब ज़िंदाबाद के नारे गूंजते थे। इन नारों में, मुझे अच्छी तरह याद है, एक ...