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Published On : 07-May-2026 12:51pm

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अभिप्राय
दादा भगवान के अनुसार अभिप्राय हमारे भीतर की वह सूक्ष्म राय या धारणा है जो किसी भी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के बारे में हमारे मन में घर कर जाती है। यह अहंकार का ही एक रूप है जहाँ हम अपनी बुद्धि के आधार पर किसी को हमेशा के लिए एक सांचे में ढाल देते हैं। जब हम कहते हैं कि 'यह व्यक्ति बहुत बुरा है' या 'वह तो सुधर ही नहीं सकता', तो यह हमारे मन में उस व्यक्ति के प्रति एक गहरी गांठ बना देता है। यह धारणा इतनी मजबूत होती है कि अगर भविष्य में वह व्यक्ति अच्छा व्यवहार भी करे, तो भी हमारा पुराना अभिप्राय हमें उसकी अच्छाई देखने नहीं देता।अध्यात्म की दृष्टि से अभिप्राय को कर्म बंधन का सबसे मुख्य कारण माना गया है क्योंकि यह राग और द्वेष को जन्म देता है। जब हम किसी के प्रति अच्छा अभिप्राय रखते हैं तो राग पैदा होता है और जब बुरा अभिप्राय रखते हैं तो द्वेष पैदा होता है। दादा भगवान कहते हैं कि असली मुक्ति तभी संभव है जब हमारे भीतर से ये राय या ओपिनियन खत्म हो जाएं। हम किसी की गलती को देख तो सकते हैं, लेकिन उसे उस गलती के साथ 'लेबल' नहीं करना चाहिए। अभिप्राय एक ऐसी अदालत की तरह है जहाँ हम खुद ही जज बनकर दूसरों को सजा सुना देते हैं, जबकि असल में हर व्यक्ति अपनी प्रकृति और पिछले कर्मों के अधीन होकर व्यवहार कर रहा होता है।इस सूक्ष्म बंधन से छूटने का रास्ता यह है कि हम सामने वाले को 'शुद्धात्मा' के रूप में देखें और उसकी गलतियों को उसकी प्रकृति का हिस्सा मानकर उसे माफ करें। जैसे ही हम किसी के प्रति अपना अभिप्राय तोड़ देते हैं, हमारे मन की वह गांठ खुल जाती है और हम आंतरिक शांति का अनुभव करते हैं। यह प्रक्रिया किसी को बदलने की नहीं, बल्कि खुद के देखने के नजरिए को साफ करने की है ताकि हम किसी भी पूर्वाग्रह के बिना वर्तमान क्षण में जी सकें।

प्रतिक्रमण एक ऐसी आध्यात्मिक प्रक्रिया है जो अभिप्राय की जड़ को ही जला देती है। दादा भगवान समझाते हैं कि अभिप्राय असल में मन के भीतर लगा हुआ एक 'दाग' है, और प्रतिक्रमण उसे धोने का साबुन है। जब हम किसी के प्रति कोई राय बनाते हैं, तो वह एक सूक्ष्म बीज की तरह हमारे भीतर रोपित हो जाता है, लेकिन जैसे ही हम सजग होकर पश्चाताप करते हैं, वह बीज अंकुरित होने से पहले ही भस्म हो जाता है।जब आप किसी व्यक्ति के दोष देखते हैं या उसके प्रति मन में कोई पक्की धारणा बना लेते हैं, तो उसी समय अपने भीतर विराजमान 'शुद्धात्मा' को साक्षी रखकर उस व्यक्ति की शुद्धात्मा से माफी मांगनी चाहिए। यह माफी बाहर बोलकर नहीं, बल्कि भीतर ही भीतर मांगनी होती है। इस प्रक्रिया में तीन चरण काम करते हैं: सबसे पहले अपनी गलती को स्वीकार करना कि 'मैंने बुरा अभिप्राय रखा', फिर उस गलती के लिए सच्चे हृदय से पछताना, और अंत में यह दृढ़ निश्चय करना कि 'मैं अब ऐसा अभिप्राय दोबारा नहीं रखूँगा'।जैसे-जैसे आप बार-बार प्रतिक्रमण करते हैं, उस व्यक्ति के प्रति आपके मन में बनी हुई पुरानी 'गांठ' ढीली होने लगती है। प्रतिक्रमण करने से आपके भीतर का वह परमाणु बदल जाता है जो द्वेष या राग पैदा कर रहा था। दादा भगवान कहते हैं कि यदि आप किसी के प्रति बहुत गहरे अभिप्राय से भरे हुए हैं, तो उसके लिए शांति से बैठकर ५-१० मिनट तक 'हार्टी' प्रतिक्रमण करें। ऐसा करने से न केवल आपका मन हल्का होगा, बल्कि आश्चर्यजनक रूप से सामने वाले व्यक्ति के स्पंदन (vibrations) भी आपके प्रति बदलने लगेंगे।अभिप्राय से मुक्ति का अर्थ यह नहीं है कि आपको कुछ दिखाई नहीं देगा, बल्कि इसका अर्थ यह है कि अब आपके पास किसी को 'लेवल' करने की फुर्सत नहीं होगी। आप सामने वाले की गलती को देखेंगे तो सही, पर उसे 'गलत इंसान' नहीं मानेंगे। प्रतिक्रमण वह हथियार है जो आपको 'जज' की कुर्सी से उतारकर एक 'शुद्ध दृष्टा' बना देता है, जिससे आप कर्मों के भारी बोझ से मुक्त होकर आत्मिक आनंद की ओर बढ़ पाते हैं

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