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Published On : 01-May-2026 08:33pm19 views
भाव कर्म?
“पैसों से ही 'ऑब्लाइज़' किया जा सके, ऐसा नहीं है। वह तो देने वाले की शक्ति पर आधारित है। सिर्फ मन में भाव रखने हैं कि, 'कैसे मैं ऑब्लाइज़ करूँ', इतना ही रहा करे, बस वही देखना है।”: परम पूज्य दादा भगवान (आप्तसूत्र # 792)
दादा भगवान के अक्रम विज्ञान के अनुसार भाव कर्म को समझना जीवन की गुत्थी को सुलझाने जैसा है। सामान्यतः हम समझते हैं कि जो हम हाथ-पैर से क्रिया कर रहे हैं या जो शब्द बोल रहे हैं, वही कर्म है; लेकिन दादाश्री कहते हैं कि ये बाहरी क्रियाएं तो केवल 'द्रव्य कर्म' या पिछले जन्मों का 'डिस्चार्ज' (फल) हैं। असली कर्म तो वह सूक्ष्म बीज है जो क्रिया के दौरान आपके भीतर 'भाव' के रूप में पड़ता है। इसे हम 'इरादा' या 'Inner Intent' कह सकते हैं।
जब हम कोई कार्य करते हैं, तो उस समय हमारे भीतर जो मान्यता होती है कि "यह मैं कर रहा हूँ", यही कर्ता-भाव नए कर्म का बीज यानी भाव कर्म है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति किसी की मदद कर रहा है, तो बाहरी दुनिया को लगेगा कि वह पुण्य कमा रहा है। लेकिन यदि उस मदद के पीछे उसका आंतरिक भाव अहंकार से भरा है या दिखावे का है, तो वह उसी अनुसार भविष्य के लिए कर्म बाँध रहा है। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति मजबूरी में कोई बुरा काम कर रहा है, लेकिन भीतर से उसे उस कार्य का गहरा पछतावा है और उसका भाव शुद्ध है, तो उसका भाव कर्म उसे भविष्य में सुधार की ओर ले जाएगा।
दादा भगवान स्पष्ट करते हैं कि हमारी बाहरी क्रियाएं हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, वे तो पिछले जन्म के 'प्लान' के अनुसार ऑटोमैटिक हो रही हैं। जैसे एक बार फिल्म शूट हो जाए, तो पर्दे पर उसे केवल देखा जा सकता है, बदला नहीं जा सकता; वैसे ही यह जीवन 'द्रव्य कर्म' का प्रदर्शन मात्र है। असली शक्ति हमारे 'भाव' में है। यदि हम अपने भावों को सुधार लें, तो हम अपने भविष्य के निर्माता स्वयं बन जाते हैं।
जब मनुष्य को आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है और वह यह अनुभव करता है कि "मैं तो शुद्ध आत्मा हूँ और ये क्रियाएं तो केवल प्रकृति का हिस्सा हैं", तब वह 'कर्ता-भाव' से मुक्त हो जाता है। कर्ता-भाव छूटते ही नए भाव कर्म बनना बंद हो जाते हैं। जब नए बीज नहीं पड़ते, तो केवल पुराने फल (द्रव्य कर्म) ही शेष रह जाते हैं, जिनके पूर्ण होते ही आत्मा जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करती है। सरल शब्दों में, भाव कर्म हमारे विचारों के पीछे छिपी वह गहरी नीयत है, जो हमारे आने वाले कल की रूपरेखा तैयार करती है।
Youtube: https://youtu.be/bS0SQPDCASY?si=98Vh71un6yzC0jQj
#DadaBhagwan #SelfRealization #AkramVignan #Shuddhatma #GnanVidhi #DadaBhagwanFoundation
“पैसों से ही 'ऑब्लाइज़' किया जा सके, ऐसा नहीं है। वह तो देने वाले की शक्ति पर आधारित है। सिर्फ मन में भाव रखने हैं कि, 'कैसे मैं ऑब्लाइज़ करूँ', इतना ही रहा करे, बस वही देखना है।”: परम पूज्य दादा भगवान (आप्तसूत्र # 792)
दादा भगवान के अक्रम विज्ञान के अनुसार भाव कर्म को समझना जीवन की गुत्थी को सुलझाने जैसा है। सामान्यतः हम समझते हैं कि जो हम हाथ-पैर से क्रिया कर रहे हैं या जो शब्द बोल रहे हैं, वही कर्म है; लेकिन दादाश्री कहते हैं कि ये बाहरी क्रियाएं तो केवल 'द्रव्य कर्म' या पिछले जन्मों का 'डिस्चार्ज' (फल) हैं। असली कर्म तो वह सूक्ष्म बीज है जो क्रिया के दौरान आपके भीतर 'भाव' के रूप में पड़ता है। इसे हम 'इरादा' या 'Inner Intent' कह सकते हैं।
जब हम कोई कार्य करते हैं, तो उस समय हमारे भीतर जो मान्यता होती है कि "यह मैं कर रहा हूँ", यही कर्ता-भाव नए कर्म का बीज यानी भाव कर्म है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति किसी की मदद कर रहा है, तो बाहरी दुनिया को लगेगा कि वह पुण्य कमा रहा है। लेकिन यदि उस मदद के पीछे उसका आंतरिक भाव अहंकार से भरा है या दिखावे का है, तो वह उसी अनुसार भविष्य के लिए कर्म बाँध रहा है। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति मजबूरी में कोई बुरा काम कर रहा है, लेकिन भीतर से उसे उस कार्य का गहरा पछतावा है और उसका भाव शुद्ध है, तो उसका भाव कर्म उसे भविष्य में सुधार की ओर ले जाएगा।
दादा भगवान स्पष्ट करते हैं कि हमारी बाहरी क्रियाएं हमारे नियंत्रण में नहीं हैं, वे तो पिछले जन्म के 'प्लान' के अनुसार ऑटोमैटिक हो रही हैं। जैसे एक बार फिल्म शूट हो जाए, तो पर्दे पर उसे केवल देखा जा सकता है, बदला नहीं जा सकता; वैसे ही यह जीवन 'द्रव्य कर्म' का प्रदर्शन मात्र है। असली शक्ति हमारे 'भाव' में है। यदि हम अपने भावों को सुधार लें, तो हम अपने भविष्य के निर्माता स्वयं बन जाते हैं।
जब मनुष्य को आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है और वह यह अनुभव करता है कि "मैं तो शुद्ध आत्मा हूँ और ये क्रियाएं तो केवल प्रकृति का हिस्सा हैं", तब वह 'कर्ता-भाव' से मुक्त हो जाता है। कर्ता-भाव छूटते ही नए भाव कर्म बनना बंद हो जाते हैं। जब नए बीज नहीं पड़ते, तो केवल पुराने फल (द्रव्य कर्म) ही शेष रह जाते हैं, जिनके पूर्ण होते ही आत्मा जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करती है। सरल शब्दों में, भाव कर्म हमारे विचारों के पीछे छिपी वह गहरी नीयत है, जो हमारे आने वाले कल की रूपरेखा तैयार करती है।
Youtube: https://youtu.be/bS0SQPDCASY?si=98Vh71un6yzC0jQj
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