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Published On : 30-Apr-2026 06:33pm

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मानव धर्म ?
दादा भगवान की दृष्टि में मानव धर्म कोई औपचारिक कर्मकांड नहीं बल्कि जीवन जीने की एक सहज और वैज्ञानिक कला है। इस धर्म का मूल आधार यह बोध है कि प्रत्येक जीवित प्राणी के भीतर वही शुद्ध आत्मा विराजमान है जो हमारे भीतर है, और इसी एकता के कारण किसी भी जीव को दुःख पहुँचाना वास्तव में स्वयं को ही दुःख पहुँचाने के समान है। दादाजी समझाते हैं कि मनुष्य जीवन एक महत्वपूर्ण पड़ाव है जहाँ से हमारे भविष्य की गति निर्धारित होती है। यदि हम अपने मन, वचन और काया का उपयोग दूसरों को सुख देने के लिए करते हैं, तो हमारे जीवन में सुख और शांति का स्वतः आगमन होता है, लेकिन यदि हमारे व्यवहार से किसी को ठेस पहुँचती है, तो वह अंततः हमारे ही दुखों का कारण बनता है।

दादा भगवान समझाते हैं कि मनुष्य का शरीर एक ऐसा माध्यम है जहाँ से हम तय करते हैं कि आगे का सफर कैसा होगा। वे इसे 'डेवलपमेंट' की एक सीढ़ी मानते हैं। उनके अनुसार, पशु और मनुष्य में मूल अंतर केवल आहार, भय और निद्रा का नहीं है, बल्कि 'विवेक' का है। यह विवेक ही हमें बताता है कि जिस तरह हमें कांटा चुभने पर दर्द होता है, ठीक वैसा ही दर्द दूसरे को भी होता है। जब एक इंसान इस दर्द को महसूस करने लगता है, तब उसके भीतर सही मायने में मानवता का जन्म होता है। मानवता का सबसे सरल पैमाना यह है कि हमें अपने भीतर झाँककर देखना चाहिए कि हमें दूसरों का कैसा व्यवहार पसंद आता है; जो व्यवहार हमें अपने लिए अच्छा नहीं लगता, उसे दूसरों पर लागू न करना ही सबसे बड़ी नैतिकता है। दादा भगवान का 'अक्रम विज्ञान' कहता है कि सच्चा धर्म मंदिर या मूर्तियों में नहीं बल्कि हमारे आपसी व्यवहार की शुद्धता में है। जब हम निस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा करते हैं और अपनी शक्ति का उपयोग परोपकार में लगाते हैं, तब हमारे भीतर से अहंकार कम होने लगता है और हम आत्म-साक्षात्कार के करीब पहुँचते हैं। वास्तव में, मानव धर्म वह नींव है जिस पर आध्यात्मिक मुक्ति का महल खड़ा होता है। बिना एक अच्छा इंसान बने, ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं है। इसलिए, हर परिस्थिति में दूसरों के साथ न्यायपूर्ण और करुणामयी व्यवहार करना ही उस परम तत्व की सच्ची भक्ति है जिसे दादा भगवान ने पूरी दुनिया को सिखाया है।
https://youtu.be/pXW0_ic5npI?si=xoekcDB-3GtCxv50

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