Hindi Thought videos by Deepak Vyas Watch Free
Published On : 16-Apr-2023 02:08pm205 views
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बहुत सटीक व तार्किक विश्लेषण
कभी-कभी विचार आता है कि
1500 ई. के बाद के ब्रिटिश कितने
साहसी और बुद्धिमान रहे होंगे, जिन्होंने
एक ठण्डे प्रदेश से निकलकर,
अनजान रास्ते और अनजान जगहों पर
जाकर लोगों को गुलाम बनाया.
अभी भी देखा जाए तो
ब्रिटेन की जनसंख्या और क्षेत्रफल
गुजरात के बराबर है, लेकिन उन्होंने
दशकों नहीं शताब्दियों तक
दुनिया को गुलाम बनाए रखा.
भारत की करोड़ों की जनसंख्या को
मात्र कुछ लाख या हजार लोगों ने
गुलाम बनाकर रखा, और केवल
गुलाम ही नहीं बनाया बल्कि
खूब हत्यायें और लूटपाट भी की.
उनको अपनी कौम पर
कितना गर्व होगा
कि मुठ्ठी भर लोग
दुनिया को नाच नचाते रहे.
भारत के एक जिले में शायद ही
50 से ज्यादा अंग्रेज रहे होंगे लेकिन
लाखों लोगों के बीच, अपनी धरती से
हजारों मील दूर आकर, अपने से
संख्या में कई गुना अधिक लोगों को
इस तरह गुलाम रखने के लिए
अद्भुत साहस रहा होगा.
अगर इतिहास देखते हैं तो
पता चलता है
कि उनके पास हम पर
अत्याचार करने के लिए लोग भी नहीं थे
तो उन्होंने हम में से ही कुछ लोगों को
भर्ती किया था,
हम पर अत्याचार करने के लिए,
हमें लूटने के लिए.
सोचकर ही अजीब लगता है कि
हम लोग अंग्रेजों के सैनिक बन कर,
अपने ही लोगों पर अत्याचार करते थे.
चंद्रशेखर, बिस्मिल जैसे मात्र कुछ
गिनती के लोग थे, जिन्हें
हमारा ही समाज
हेय दृष्टि से देखता था.
आज वही नपुंसक समाज
उन चंद लोगों के नाम के पीछे
अपना कायरतापूर्ण इतिहास छुपाकर
झूठा दम्भ भरता है.
अरब के रेगिस्तान से कुछ भूखे
जाहिल, आततायी लोग आए,
और उन्होंने भी हमको लूटा, मारा,
बलात्कार किया. और हम
वहाँ भी नाकाम रहे.
उन्होंने हमारे मन्दिर तोड़े,
हमारी स्त्रियों से बलात्कार किये, लेकिन
हमने क्या किया ?
वो दिन में विवाह में लूटपाट करते हैं,
तो रात को चुपचाप विवाह करने लगे,
जवान लड़कियों को उठा ले जाते हैं,
तो बचपन में ही शादी करने लगे और
अगर उसमें ही असुरक्षा हो, तो
बेटी पैदा होते ही मारते रहे.
बुरा लगता तो ठीक है, लेकिन
यही हमारी सच्चाई है.
हमने 1000 सालों की दुर्दशा से
कुछ नहीं सीखा.
आज एक जनसँख्या
उन्हीं अरबी अत्याचारियों को
अपना पूर्वज मानने लगी है.
कुछ उन ईसाइयों को
अपना पूर्वज मानने लगी है,
यानि हम स्वाभिमानहीन लोग हैं,
सही है कि हम ...
इतिहास से सीखने वाले नहीं हैं,
चाहे खुद इतिहास बनकर रह जाएं.
विचारणीय लेख ✍️ 👉इस संपूर्ण लेख को अपने समाज के संदर्भ में लेकर देखिए कि हम अपने समाज के लिए क्या कर सकते हैं ताकि हमारी आगामी पीढ़ियों को वैचारिक और मानसिक गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलने का रास्ता मिल पाए
ऐसे और पोस्ट देखने के लिए और विश्व सनातन सेना संगठन से जुड़ने के लिए क्लिक करें 👇👇
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बहुत सटीक व तार्किक विश्लेषण
कभी-कभी विचार आता है कि
1500 ई. के बाद के ब्रिटिश कितने
साहसी और बुद्धिमान रहे होंगे, जिन्होंने
एक ठण्डे प्रदेश से निकलकर,
अनजान रास्ते और अनजान जगहों पर
जाकर लोगों को गुलाम बनाया.
अभी भी देखा जाए तो
ब्रिटेन की जनसंख्या और क्षेत्रफल
गुजरात के बराबर है, लेकिन उन्होंने
दशकों नहीं शताब्दियों तक
दुनिया को गुलाम बनाए रखा.
भारत की करोड़ों की जनसंख्या को
मात्र कुछ लाख या हजार लोगों ने
गुलाम बनाकर रखा, और केवल
गुलाम ही नहीं बनाया बल्कि
खूब हत्यायें और लूटपाट भी की.
उनको अपनी कौम पर
कितना गर्व होगा
कि मुठ्ठी भर लोग
दुनिया को नाच नचाते रहे.
भारत के एक जिले में शायद ही
50 से ज्यादा अंग्रेज रहे होंगे लेकिन
लाखों लोगों के बीच, अपनी धरती से
हजारों मील दूर आकर, अपने से
संख्या में कई गुना अधिक लोगों को
इस तरह गुलाम रखने के लिए
अद्भुत साहस रहा होगा.
अगर इतिहास देखते हैं तो
पता चलता है
कि उनके पास हम पर
अत्याचार करने के लिए लोग भी नहीं थे
तो उन्होंने हम में से ही कुछ लोगों को
भर्ती किया था,
हम पर अत्याचार करने के लिए,
हमें लूटने के लिए.
सोचकर ही अजीब लगता है कि
हम लोग अंग्रेजों के सैनिक बन कर,
अपने ही लोगों पर अत्याचार करते थे.
चंद्रशेखर, बिस्मिल जैसे मात्र कुछ
गिनती के लोग थे, जिन्हें
हमारा ही समाज
हेय दृष्टि से देखता था.
आज वही नपुंसक समाज
उन चंद लोगों के नाम के पीछे
अपना कायरतापूर्ण इतिहास छुपाकर
झूठा दम्भ भरता है.
अरब के रेगिस्तान से कुछ भूखे
जाहिल, आततायी लोग आए,
और उन्होंने भी हमको लूटा, मारा,
बलात्कार किया. और हम
वहाँ भी नाकाम रहे.
उन्होंने हमारे मन्दिर तोड़े,
हमारी स्त्रियों से बलात्कार किये, लेकिन
हमने क्या किया ?
वो दिन में विवाह में लूटपाट करते हैं,
तो रात को चुपचाप विवाह करने लगे,
जवान लड़कियों को उठा ले जाते हैं,
तो बचपन में ही शादी करने लगे और
अगर उसमें ही असुरक्षा हो, तो
बेटी पैदा होते ही मारते रहे.
बुरा लगता तो ठीक है, लेकिन
यही हमारी सच्चाई है.
हमने 1000 सालों की दुर्दशा से
कुछ नहीं सीखा.
आज एक जनसँख्या
उन्हीं अरबी अत्याचारियों को
अपना पूर्वज मानने लगी है.
कुछ उन ईसाइयों को
अपना पूर्वज मानने लगी है,
यानि हम स्वाभिमानहीन लोग हैं,
सही है कि हम ...
इतिहास से सीखने वाले नहीं हैं,
चाहे खुद इतिहास बनकर रह जाएं.
विचारणीय लेख ✍️ 👉इस संपूर्ण लेख को अपने समाज के संदर्भ में लेकर देखिए कि हम अपने समाज के लिए क्या कर सकते हैं ताकि हमारी आगामी पीढ़ियों को वैचारिक और मानसिक गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलने का रास्ता मिल पाए
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